प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देश की लगभग छियासी प्रतिशत नकदी को रातों रात बंद करने की घोषणा किए हुए अब दस वर्ष पूरे हो चुके हैं। इस दीपावली के अवसर पर विमुद्रीकरण के लक्ष्यों और उनके परिणामों का विश्लेषण किया जा रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इस बड़े आर्थिक निर्णय के कई घोषित उद्देश्य अभी भी अधूरे दिखाई देते हैं।

नकदी के चलन और आर्थिक प्रभाव का विस्तृत अवलोकन
विमुद्रीकरण की प्रक्रिया को लागू हुए एक दशक का समय बीत चुका है, और इस अवधि के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति का मूल्यांकन करना आवश्यक हो गया है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी किए गए आंकड़ों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि जिस मुख्य उद्देश्य के साथ नकदी के प्रवाह को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया था, वह अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में काफी हद तक विफल रहा है। विमुद्रीकरण के समय यह तर्क दिया गया था कि अर्थव्यवस्था में नकदी की उपलब्धता को कम करने से डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा मिलेगा और काले धन पर अंकुश लगेगा। हालांकि, जमीनी स्तर पर स्थिति यह है कि प्रचलन में मौजूद नकदी की मात्रा में कोई विशेष कमी नहीं आई है। लोग आज भी अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नकदी पर ही निर्भर हैं। यह दर्शाता है कि अर्थव्यवस्था में नकदी का महत्व कम होने के बजाय निरंतर बना हुआ है, जो इस नीति के प्राथमिक उद्देश्यों के साथ विरोधाभास पैदा करता है।
नकली मुद्रा की चुनौती और सुरक्षा संबंधी चिंताएं
विमुद्रीकरण के दौरान यह दावा किया गया था कि इससे नकली मुद्रा के प्रसार को पूरी तरह से समाप्त कर दिया जाएगा। लेकिन पिछले दस वर्षों के आंकड़ों पर गौर करें तो स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। विशेष रूप से पांच सौ रुपये के नोटों की बरामदगी और उनकी पहचान के मामलों में वृद्धि दर्ज की गई है। यह तथ्य स्पष्ट करता है कि नकली नोटों का प्रचलन अर्थव्यवस्था के लिए एक निरंतर चुनौती बना हुआ है। केंद्रीय बैंक के आंकड़ों के अनुसार, नकली मुद्रा की समस्या का समाधान अभी भी दूर है और यह न केवल आर्थिक सुरक्षा के लिए खतरा है बल्कि आम नागरिकों के विश्वास को भी प्रभावित करता है। विमुद्रीकरण के बाद नकली नोटों का बढ़ता हुआ प्रसार यह सिद्ध करता है कि इस समस्या से निपटने के लिए अपनाए गए उपाय पूर्णतः प्रभावी नहीं रहे हैं।
डिजिटल भुगतान और यूपीआई की प्रगति
विमुद्रीकरण के बाद के वर्षों में यदि किसी क्षेत्र में सबसे अधिक सकारात्मक बदलाव देखा गया है, तो वह डिजिटल भुगतान का विस्तार है। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई के माध्यम से होने वाले लेनदेन का मूल्य हर वर्ष लगातार बढ़ रहा है। डिजिटल भुगतान की यह गति केवल संख्यात्मक रूप से ही नहीं, बल्कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के प्रतिशत के रूप में भी अत्यंत प्रभावशाली रही है। यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि देश में भुगतान के आधुनिक तरीकों को अपनाने की गति तेज हुई है। हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि डिजिटल लेनदेन में हुई यह वृद्धि नकदी के उपयोग को पूरी तरह से प्रतिस्थापित करने में सक्षम नहीं हो पाई है। डिजिटल और नकद लेनदेन दोनों ही अर्थव्यवस्था में समानांतर रूप से अपनी भूमिका निभा रहे हैं।
निष्कर्ष और भविष्य की आर्थिक दिशा
विमुद्रीकरण के एक दशक बाद यह स्पष्ट है कि इस बड़े आर्थिक निर्णय के परिणाम काफी मिश्रित रहे हैं। एक ओर जहां डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई है और लोग तकनीक के प्रति जागरूक हुए हैं, वहीं दूसरी ओर नकदी की निर्भरता और नकली नोटों की समस्या अभी भी यथावत बनी हुई है। नीति निर्माताओं के लिए यह समय है कि वे इन आंकड़ों का सूक्ष्मता से विश्लेषण करें और भविष्य की आर्थिक नीतियों को अधिक प्रभावी बनाएं। विमुद्रीकरण के उद्देश्यों की पूर्ण प्राप्ति के लिए केवल घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि निरंतर प्रयासों और जमीनी स्तर पर सुधार की आवश्यकता है। आने वाले समय में आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए सरकार को उन चुनौतियों का समाधान करना होगा जो दस साल बाद भी अर्थव्यवस्था के लिए बाधा बनी हुई हैं।
स्रोत: The Hindu





