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मोहम्मद रफी: कोटला सुल्तान सिंह से बंबई तक, आवाज के जादूगर का सफर और उनके यादगार गीत

24 दिसंबर को मोहम्मद रफी की जयंती है। जानिए हिंदी फिल्म संगीत के इस महान गायक का सफर और विरासत।

पुराने माइक्रोफोन और ग्रामोफोन रिकॉर्ड का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

सारांश

  • हिंदी फिल्म संगीत का कोई भी दौर याद किया जाए, मोहम्मद रफी की आवाज उसमें जरूर गूंजती है।
  • रफी की सबसे बड़ी खूबी उनकी आवाज की विविधता थी। वे दिलीप कुमार, देव आनंद, शम्मी कपूर, राजेंद्र कुमार, धर्मेंद्र से लेकर ऋषि कपूर तक अलग-अलग अभिनेताओं के लिए गाते थे और हर बार उनकी आवाज…
  • रफी को उनके साथ काम करने वाले लोग बेहद विनम्र और सादे इंसान के रूप में याद करते हैं।
  • रफी की आवाज में गाए देशभक्ति गीत आज भी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर बजते हैं।

हिंदी फिल्म संगीत का कोई भी दौर याद किया जाए, मोहम्मद रफी की आवाज उसमें जरूर गूंजती है। रोमांटिक गीत हों, भजन हों, देशभक्ति के गाने हों, कव्वाली हो या शरारती गीत, रफी हर रंग में ढल जाते थे। 24 दिसंबर को उनकी जयंती होती है। आइए जानते हैं पंजाब के एक छोटे से गांव से निकलकर हिंदी सिनेमा की सबसे पहचानी जाने वाली आवाजों में शामिल होने वाले इस गायक का सफर।

जन्म और बचपन

मोहम्मद रफी का जन्म 24 दिसंबर 1924 को अविभाजित पंजाब के अमृतसर के पास कोटला सुल्तान सिंह गांव में हुआ। बाद में उनका परिवार लाहौर चला गया। बताया जाता है कि बचपन में वे गांव में गाते एक फकीर की नकल करके गाया करते थे। संगीत के प्रति उनकी लगन देखकर परिवार ने उन्हें प्रशिक्षण दिलाया। उन्होंने उस्ताद अब्दुल वहीद खान, पंडित जीवन लाल मट्टू और फिरोज निजामी जैसे गुरुओं से संगीत सीखा।

मुख्य बातें: पुराने माइक्रोफोन और ग्रामोफोन रिकॉर्ड का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

बंबई का सफर

रफी ने अपने करियर की शुरुआत लाहौर में की और 1940 के दशक में बंबई पहुंचे। शुरुआती सालों में उन्हें छोटे-छोटे मौके मिले, लेकिन धीरे-धीरे संगीतकारों ने उनकी आवाज की खूबी पहचान ली। नौशाद के साथ उनकी जोड़ी ने कई यादगार गीत दिए। बैजू बावरा फिल्म के ओ दुनिया के रखवाले और मन तड़पत हरि दर्शन को आज जैसे गीत आज भी याद किए जाते हैं।

हर रंग की आवाज

रफी की सबसे बड़ी खूबी उनकी आवाज की विविधता थी। वे दिलीप कुमार, देव आनंद, शम्मी कपूर, राजेंद्र कुमार, धर्मेंद्र से लेकर ऋषि कपूर तक अलग-अलग अभिनेताओं के लिए गाते थे और हर बार उनकी आवाज अभिनेता के अंदाज में ढल जाती थी। शम्मी कपूर के मस्ती भरे गीतों में उनकी ऊर्जा और गुरु दत्त की फिल्मों के गंभीर गीतों में उनकी गहराई इसका उदाहरण है।

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कुछ यादगार गीत

  • ओ दुनिया के रखवाले (बैजू बावरा)
  • चौदहवीं का चांद हो (चौदहवीं का चांद)
  • ये दुनिया अगर मिल भी जाए (प्यासा)
  • बहारों फूल बरसाओ (सूरज)
  • क्या हुआ तेरा वादा (हम किसी से कम नहीं)
  • कर चले हम फिदा जानो तन साथियो (हकीकत)
  • याहू! चाहे कोई मुझे जंगली कहे (जंगली)

इसके अलावा उन्होंने कई भाषाओं में गीत गाए और गैर-फिल्मी भजन और गजलें भी रिकॉर्ड कीं।

सम्मान

भारत सरकार ने 1967 में मोहम्मद रफी को पद्मश्री से सम्मानित किया। 1977 में फिल्म हम किसी से कम नहीं के गीत क्या हुआ तेरा वादा के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इस गीत का संगीत आर.डी. बर्मन ने दिया था। इसी गीत के लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला। अपने करियर में उन्होंने कई फिल्मफेयर पुरस्कार जीते।

सादगी के किस्से

रफी को उनके साथ काम करने वाले लोग बेहद विनम्र और सादे इंसान के रूप में याद करते हैं। कहा जाता है कि वे नए संगीतकारों के लिए भी उतनी ही मेहनत से गाते थे, जितनी बड़े संगीतकारों के लिए। वे शोहरत के बावजूद विवादों और दिखावे से दूर रहना पसंद करते थे।

निधन

31 जुलाई 1980 को बंबई में दिल का दौरा पड़ने से मोहम्मद रफी का निधन हो गया। वे सिर्फ 55 साल के थे। उनके अंतिम संस्कार में भारी भीड़ उमड़ी थी। उनके निधन के बाद भी उनके गीत रेडियो, टीवी और अब इंटरनेट पर लगातार सुने जाते हैं।

संगीतकारों के साथ जोड़ियां

रफी ने लगभग हर बड़े संगीतकार के साथ काम किया। नौशाद, शंकर-जयकिशन, ओ.पी. नैयर, एस.डी. बर्मन, मदन मोहन, रवि, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और आर.डी. बर्मन जैसे संगीतकारों ने उनकी आवाज के अलग-अलग रंगों का इस्तेमाल किया। ओ.पी. नैयर के साथ उनके चुलबुले गीत और मदन मोहन के साथ गजलनुमा गीत अलग पहचान रखते हैं। लता मंगेशकर और आशा भोसले के साथ उनके युगल गीत भी बेहद लोकप्रिय हुए।

देशभक्ति और भजन

रफी की आवाज में गाए देशभक्ति गीत आज भी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर बजते हैं। कर चले हम फिदा और ऐसे कई गीत देशभक्ति कार्यक्रमों का हिस्सा बन चुके हैं। इसी तरह मन तड़पत हरि दर्शन को आज और सुख के सब साथी जैसे भजन भी उनकी पहचान हैं। उनकी आवाज की यही खासियत थी कि वह हर भावना को सहजता से व्यक्त कर देती थी।

विरासत

आज भी कई नए गायक रफी को अपना आदर्श मानते हैं। गायन प्रतियोगिताओं में उनके गीत सबसे ज्यादा गाए जाने वाले गीतों में शामिल रहते हैं। हर साल 24 दिसंबर और 31 जुलाई को देशभर में उनके गीतों की संगीत संध्याएं आयोजित की जाती हैं। उनकी आवाज हिंदी फिल्म संगीत के सुनहरे दौर की पहचान बन चुकी है।

मोहम्मद रफी का जन्म कब और कहां हुआ

24 दिसंबर 1924 को पंजाब के कोटला सुल्तान सिंह गांव में।

मोहम्मद रफी को राष्ट्रीय पुरस्कार किस गीत के लिए मिला

1977 में क्या हुआ तेरा वादा गीत के लिए।

स्रोत: Mohammed Rafi official website: Biography, Wikipedia: Mohammed Rafi

लेखक

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी डेमोक्रेटिक भारत लाइव के संस्थापक, मालिक और संपादक हैं। डिजिटल मीडिया में 6 साल से अधिक के अनुभव के साथ वे मुख्य रूप से राजनीति और चुनाव की खबरें कवर करते हैं, साथ ही देश, कारोबार और खेल से जुड़ी अहम खबरों का संपादन करते हैं। वेबसाइट की संपादकीय नीति, तथ्य-जांच और प्रकाशित सामग्री की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की है।

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