भोजपुरी संगीत जगत में जब भी त्योहारों की बात आती है, तो कुछ गाने ऐसे होते हैं जो समय के साथ और अधिक लोकप्रिय हो जाते हैं। ऐसा ही एक गाना ‘झड़ुइया लेले अईह’ है जो अपनी सादगी और पारिवारिक परिवेश के कारण दर्शकों के दिलों पर राज कर रहा है। एनडीटीवी इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार यह सात साल पुराना भोजपुरी गाना आज भी हर बिहारवासी का फेवरेट बना हुआ है। धनतेरस के खास अवसर पर जब बाजारों में खरीदारी का माहौल होता है, तब यह गाना हर घर में गूंजता सुनाई देता है। इस गाने के बोल और धुन लोगों को झूमने पर मजबूर कर देते हैं।

गाने के बोल और लोक जीवन का अनूठा मेल
इस भोजपुरी गाने के बोल बेहद अनोखे और आम गृहस्थ जीवन से जुड़े हुए हैं। गाने की शुरुआत जिस अंदाज में होती है, वह सीधे दिल को छू लेती है। ‘ए चिंटू के पापा झड़ुइया लेले अईह’ इन पंक्तियों में एक आम भारतीय परिवार की घरेलू बातचीत और त्योहार की तैयारियों की झलक मिलती है। धनतेरस के दिन झाड़ू खरीदने की परंपरा को इस गाने में बहुत ही खूबसूरती से पिरोया गया है। लोक संस्कृति और परंपराओं का यह मेल इस गाने को खास बनाता है। संगीत प्रेमियों के बीच इसके बोल हमेशा चर्चा का विषय रहते हैं क्योंकि यह सीधे जनता की भाषा और शैली से जुड़े हुए हैं।
सात साल पुराना होने के बावजूद बना हुआ है क्रेज
किसी भी गाने के लिए सात साल का समय लंबा होता है, लेकिन इस भोजपुरी गीत ने यह साबित कर दिया है कि अच्छी कला कभी पुरानी नहीं होती। रिलीज होने के इतने साल बाद भी इस गाने की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है। जब भी धनतेरस का त्योहार नजदीक आता है, लोग इस गाने को दोबारा सुनना पसंद करते हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी घरों तक में यह गाना त्योहार के दिनों में विशेष रूप से बजाया जाता है। इसकी धुन और लेयबद्धता लोगों के मन में बस जाती है, जिससे श्रोता इसके साथ जुड़ महसूस करते हैं।
धनतेरस के पावन अवसर पर गूंजता है यह गीत
धनतेरस का त्योहार खरीदारी और नए सामान घर लाने का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में इस दिन झाड़ू खरीदने का भी विशेष महत्व होता है। इसी परंपरा को केंद्र में रखकर बनाए गए इस गाने ने त्योहार के माहौल में चार चांद लगा दिए हैं। जब लोग बाजार में खरीदारी करने निकलते हैं या घर की सफाई में जुटे होते हैं, तब इस गाने के बोल अनायास ही जुबान पर आ जाते हैं। यह गाना सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह त्योहार के उल्लास को और अधिक बढ़ाने का काम करता है। यही कारण है कि आज भी लोग इसे बड़े चाव से सुनते हैं।
संगीत और विजुअल्स का प्रभाव
इस गाने का संगीत और विजुअल संयोजन बहुत ही सहज और पारंपरिक है। इसमें किसी तरह के बनावटीपन की बजाय ग्रामीण परिवेश और संस्कृति की असली खुशबू देखने को मिलती है। गाने की धुन इतनी कर्णप्रिय है कि एक बार सुनने के बाद लंबे समय तक याद रहती है। विजुअल्स में दिखाए गए दृश्य और कलाकारों का अभिनय आम जनता से सीधा संवाद स्थापित करता है। यही वजह है कि दर्शक इस गाने के साथ तुरंत जुड़ाव महसूस करते हैं और इसे बार-बार देखना पसंद करते हैं।
निष्कर्ष
अंत में यही कहा जा सकता है कि ‘झड़ुइया लेले अईह’ सिर्फ एक गाना नहीं, बल्कि बिहार की लोक संस्कृति और त्योहारों के उल्लास का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। सात साल पुराना होने के बावजूद इसकी ताजगी आज भी बरकरार है। धनतेरस के पावन पर्व पर जब लोग इस गाने को गुनगुनाते हैं, तो एक अलग ही ऊर्जा का संचार होता है। भोजपुरी संगीत प्रेमियों के लिए यह गीत हमेशा एक अनमोल धरोहर की तरह रहेगा जो हर साल त्योहार के दिनों में पुरानी यादों को ताजा कर देता है।
स्रोत: Google News Bhojpuri Song




