अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा बयान देते हुए दावा किया है कि उनके द्वारा ईरान के परमाणु कार्यक्रम के खिलाफ उठाए गए कदमों ने इजरायल और पूरे मध्य पूर्व को विनाश से बचा लिया है। ट्रंप के अनुसार, यदि उन्होंने ईरान को परमाणु हथियार बनाने की दिशा में आगे बढ़ने से नहीं रोका होता, तो आज यह पूरा क्षेत्र दुनिया के नक्शे पर मौजूद नहीं होता। वर्तमान में अमेरिकी प्रशासन ईरान के खिलाफ फिर से सैन्य कार्रवाई करने के संभावित विकल्पों पर गंभीरता से विचार कर रहा है और इस संबंध में उच्च स्तरीय बैठकें आयोजित की गई हैं।

ट्रंप का सोशल मीडिया पर बड़ा दावा
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल का उपयोग करते हुए ईरान के परमाणु खतरे पर अपनी बात रखी है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि उनके हस्तक्षेप की वजह से ही आज इजरायल और वास्तव में पूरा मध्य पूर्व सुरक्षित है। ट्रंप ने अपनी पोस्ट में लिखा कि अगर उन्होंने ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए कड़े कदम नहीं उठाए होते, तो आज स्थिति बहुत भयावह होती। उन्होंने यह भी कहा कि हालांकि इस विषय पर बहुत से लोग खुलकर बोलना नहीं चाहते, लेकिन हर कोई गहराई से जानता है कि यह बात पूरी तरह सच है। ट्रंप का यह बयान ऐसे समय में आया है जब ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर भविष्य में होने वाले हमलों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। वह लगातार ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपनी सरकार के लिए सबसे बड़ी सुरक्षा चिंता के रूप में पेश करते रहे हैं। उनका मानना है कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई ने ईरान की परमाणु क्षमताओं को काफी हद तक कमजोर कर दिया है, जिससे एक बड़े क्षेत्रीय संकट को टालने में मदद मिली है।
ईरान की परमाणु क्षमता और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट
ईरान के परमाणु कार्यक्रम की वर्तमान स्थिति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई रिपोर्ट सामने आई हैं। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी आईएईए का मानना है कि ईरान के पास 60 प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम का भंडार है। यह भंडार 200 किलोग्राम से ज्यादा होने की आशंका जताई गई है, जिसे इस्फहान में जमीन के नीचे बनी सुरक्षित सुरंगों में रखे जाने की बात कही गई है। आमतौर पर परमाणु हथियार बनाने के लिए यूरेनियम का संवर्धन स्तर करीब 90 प्रतिशत होना आवश्यक माना जाता है। हालांकि 60 प्रतिशत का स्तर इससे कम है, लेकिन इसे आगे और संवर्धित करना तकनीकी रूप से संभव है। अमेरिकी कांग्रेस की रिसर्च सर्विस ने भी अक्टूबर में एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें कहा गया था कि 2025 और 2026 में ईरान के ठिकानों पर किए गए हमलों का असर पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि पहले के खुफिया आकलनों में ईरान द्वारा परमाणु बम बनाने की कोशिशों की पुष्टि नहीं हुई थी। ईरान खुद भी लगातार यह कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और वह परमाणु हथियार बनाने की किसी भी कोशिश से इनकार करता रहा है।
सैन्य रणनीति और आगामी फैसले की संभावना
अमेरिकी प्रशासन अब ईरान के खिलाफ अगले कदमों पर विचार कर रहा है। ट्रंप ने गुरुवार को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा टीम के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक की, जिसमें ईरान पर संभावित सैन्य कार्रवाई के विकल्पों पर चर्चा की गई। अमेरिकी सेंट्रल कमांड भी हमलों की एक नई लहर के लिए अपनी तैयारियों को अंतिम रूप दे रहा है। हालांकि, व्हाइट हाउस की ओर से अभी तक किसी बड़े सैन्य अभियान को दोबारा शुरू करने का कोई औपचारिक आदेश जारी नहीं किया गया है। ट्रंप ने ओवल ऑफिस में मीडिया से बातचीत करते हुए संकेत दिया कि अमेरिका जल्द ही यह फैसला करेगा कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह रोकने के लिए और हमले किए जाने चाहिए या नहीं। एक विशेष रणनीतिक पहलू यह भी सामने आया है कि 9 नवंबर को मध्य पूर्व में अमावस्या होगी। सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार, रात का अंधेरा हवाई हमलों के लिए अनुकूल होता है, इसलिए इस तारीख को लेकर भी अटकलें लगाई जा रही हैं। ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि वह ईरान के अन्य हिस्सों को तबाह नहीं करना चाहते, लेकिन परमाणु खतरे को खत्म करने के लिए जरूरत पड़ने पर कड़े कदम उठाए जा सकते हैं।
इराक की प्रतिक्रिया और क्षेत्रीय संप्रभुता
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच पड़ोसी देश इराक ने भी अपना रुख स्पष्ट किया है। इराक के प्रधानमंत्री अली फलेह अल जैदी ने गुरुवार को राष्ट्रपति ट्रंप से फोन पर बात की। इस बातचीत के दौरान उन्होंने जोर देकर कहा कि इराक की जमीन का इस्तेमाल किसी भी पड़ोसी देश पर हमला करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री कार्यालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक बयान जारी कर कहा कि इराक सभी देशों की संप्रभुता का सम्मान करता है और वह अपनी सीमाओं के भीतर से किसी भी तरह की आक्रामक कार्रवाई की अनुमति नहीं देना चाहता। यह बयान क्षेत्रीय स्थिरता के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इराक की भौगोलिक स्थिति सैन्य अभियानों के लिए काफी संवेदनशील है। इराक का यह रुख दर्शाता है कि वह इस संघर्ष में खुद को शामिल होने से बचाना चाहता है और शांतिपूर्ण समाधान का पक्षधर है।
अमेरिकी प्रशासन में बदलाव और सुरक्षा बैठकें
ईरान के मुद्दे पर चल रही इन गतिविधियों के बीच अमेरिकी प्रशासन के भीतर भी कुछ बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। ट्रंप ने अपनी टीम में फेरबदल करते हुए स्टीफन मिलर को नया चीफ ऑफ स्टाफ नियुक्त किया है। मिलर ने सुसी वाइल्स की जगह ली है। यह बदलाव ऐसे समय में हुआ है जब व्हाइट हाउस में बुधवार और गुरुवार को ईरान की स्थिति को लेकर लगातार उच्च स्तरीय बैठकें आयोजित की गईं। इन बैठकों का मुख्य उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम से निपटने के लिए एक ठोस रणनीति तैयार करना था। अमेरिकी खुफिया आकलनों का हवाला देते हुए कांग्रेस की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि ईरान ने 2003 में अपना परमाणु हथियार कार्यक्रम रोक दिया था और इसके दोबारा शुरू होने के कोई ठोस सबूत नहीं मिले हैं। इसके बावजूद, ट्रंप प्रशासन ईरान की वर्तमान गतिविधियों को एक बड़े खतरे के रूप में देख रहा है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि अमेरिका सैन्य कार्रवाई का रास्ता चुनता है या कूटनीतिक दबाव के जरिए ईरान को नियंत्रित करने की कोशिश करता है। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें व्हाइट हाउस से आने वाले अगले आदेश पर टिकी हैं।
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स्रोत: Aaj Tak, Amar Ujala





