भारत विविधताओं का देश है और यहां मनाए जाने वाले त्योहारों के रंग भी हर क्षेत्र में अलग दिखाई देते हैं। दीपावली के पांच दिवसीय महापर्व में नरक चतुर्दशी का विशेष महत्व है। इसे छोटी दिवाली, रूप चौदस, काली चौदस या नरक निवारण चतुर्दशी जैसे कई नामों से जाना जाता है। वर्ष 2026 में धार्मिक गणनाओं के अनुसार, नरक चतुर्दशी और दीपावली लक्ष्मी पूजा का संयोग एक ही दिन यानी 8 नवंबर को बन रहा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान कृष्ण ने देवी सत्यभामा की सहायता से अत्याचारी राक्षस नरकासुर का वध किया था और 16,100 कन्याओं को उसके कारागार से मुक्त कराया था।
गोवा में नरकासुर दहन की अद्भुत परंपरा
गोवा में नरक चतुर्दशी का उत्सव उत्तर भारत की तुलना में बिल्कुल अलग और अत्यंत भव्य होता है। यहां दीपावली का मुख्य आकर्षण नरकासुर के विशाल पुतलों का दहन है। परंपरा के अनुसार, स्थानीय लोग और विभिन्न क्लब हफ्तों पहले से घास, कागज और बांस की मदद से नरकासुर के भयानक दिखने वाले पुतले तैयार करते हैं। चतुर्दशी की पूर्व संध्या पर इन पुतलों की झांकियां निकाली जाती हैं और प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं।
मान्यता है कि नरकासुर बुराई और अंधकार का प्रतीक है। सूर्योदय से पहले, यानी नरक चतुर्दशी की सुबह इन पुतलों का दहन किया जाता है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता है। पुतला दहन के बाद, लोग अपने घरों को लौटते हैं और पारंपरिक उबटन लगाकर स्नान करते हैं। गोवा में इस दिन को एक बड़े सामाजिक उत्सव के रूप में मनाया जाता है, जहां पूरा समुदाय एक साथ जुटता है।
तमिलनाडु की दीपावली और गंगा स्नान
दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में दीपावली का मुख्य उत्सव नरक चतुर्दशी के दिन ही मनाया जाता है। वर्ष 2026 में तमिलनाडु की दीपावली 8 नवंबर को मनाई जाएगी। उत्तर भारत में जहां अमावस्या की रात लक्ष्मी पूजन मुख्य होता है, वहीं तमिल परंपरा में चतुर्दशी की सुबह का विशेष महत्व है। इस दिन की शुरुआत ‘गंगा स्नानम्’ से होती है।
परंपरा के अनुसार, इस दिन सुबह जल्दी उठकर शरीर पर तिल का तेल लगाया जाता है और फिर औषधीय जड़ी-बूटियों से युक्त पानी से स्नान किया जाता है। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि इस दिन तेल में देवी लक्ष्मी और जल में मां गंगा का वास होता है। स्नान के बाद लोग नए वस्त्र धारण करते हैं और ‘दीपावली लेगियम’ नामक एक विशेष औषधीय मिश्रण का सेवन करते हैं, जो पाचन के लिए अच्छा माना जाता है। इसके बाद ही पटाखों और मिठाइयों का दौर शुरू होता है।
महाराष्ट्र का अभ्यंग स्नान और कारीट फल की रस्म
महाराष्ट्र में नरक चतुर्दशी का दिन ‘अभ्यंग स्नान’ के लिए प्रसिद्ध है। यह केवल एक स्नान नहीं, बल्कि एक पवित्र अनुष्ठान है। सुबह सूर्योदय से पहले उठकर परिवार के सभी सदस्य शरीर पर ‘उटणे’ (एक विशेष आयुर्वेदिक उबटन) लगाते हैं। यह उबटन चंदन, हल्दी और कई जड़ी-बूटियों से बना होता है, जो त्वचा की शुद्धि और कांति के लिए श्रेष्ठ माना जाता है।
अभ्यंग स्नान के बाद एक बहुत ही रोचक परंपरा निभाई जाती है, जिसे ‘कारीट’ फल फोड़ना कहा जाता है। कारीट एक छोटा और कड़वा फल होता है। परंपरा के अनुसार, स्नान के बाद लोग अपने बाएं पैर के अंगूठे से इस फल को कुचलते हैं। यह क्रिया नरकासुर के वध का प्रतीक मानी जाती है। फल से निकलने वाला कड़वा रस जीभ पर लगाया जाता है, जो इस बात का प्रतीक है कि जीवन के कड़वे अनुभवों को पीछे छोड़कर अब मिठास और खुशियों का स्वागत करना है। इसके बाद परिवार के साथ बैठकर ‘फराळ’ (दिवाली के विशेष व्यंजन) का आनंद लिया जाता है।

बंगाल की भूत चतुर्दशी और 14 दीपों का रहस्य
पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में नरक चतुर्दशी को ‘भूत चतुर्दशी’ के रूप में मनाया जाता है। यह परंपरा पूर्वजों और आत्माओं से जुड़ी है। मान्यता है कि इस रात को पूर्वजों की आत्माएं धरती पर आती हैं। उन्हें रास्ता दिखाने और घर को नकारात्मक शक्तियों से बचाने के लिए शाम को घर के कोनों में 14 मिट्टी के दीपक जलाए जाते हैं, जिन्हें ‘चोद्दो प्रदीप’ कहा जाता है।
इसके साथ ही, इस दिन 14 अलग-अलग प्रकार की पत्तेदार सब्जियां खाने की भी परंपरा है, जिसे ‘चोद्दो शाक’ कहा जाता है। माना जाता है कि ये 14 सब्जियां शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती हैं और बदलते मौसम में स्वास्थ्य की रक्षा करती हैं। बंगाल में इसी समय मां काली की पूजा का भी विधान है, जो शक्ति और अंधकार के विनाश की प्रतीक हैं।
नरक चतुर्दशी 2026: महत्वपूर्ण तिथियां और मुहूर्त
द्रिक पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में दीपोत्सव की तिथियां और मुहूर्त कुछ इस प्रकार रहेंगे। कृपया ध्यान दें कि ये समय नई दिल्ली के लिए हैं और स्थानीय पंचांग के अनुसार अन्य शहरों में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है।
| पर्व और तिथि | महत्वपूर्ण समय (नई दिल्ली) |
|---|---|
| काली चौदस (7 नवंबर 2026) | हनुमान पूजा मुहूर्त: रात 11:39 से 12:31 (8 नवंबर) |
| नरक चतुर्दशी स्नान (8 नवंबर 2026) | अभ्यंग स्नान मुहूर्त: सुबह 05:41 से 06:38 तक |
| लक्ष्मी पूजा (8 नवंबर 2026) | शाम 05:54 से 07:50 तक (प्रदोष काल) |
| तमिल दीपावली (8 नवंबर 2026) | सूर्योदय के समय स्नान की परंपरा |
| गोवर्धन पूजा (10 नवंबर 2026) | प्रातःकाल मुहूर्त: सुबह 06:40 से 08:50 तक |
| भाई दूज (11 नवंबर 2026) | अपराह्न मुहूर्त: दोपहर 01:10 से 03:20 तक |
पंचांग के अनुसार, चतुर्दशी तिथि 7 नवंबर को सुबह 10:47 बजे से शुरू होगी और 8 नवंबर को सुबह 11:27 बजे समाप्त होगी। इसके तुरंत बाद अमावस्या तिथि शुरू हो जाएगी। यही कारण है कि इस वर्ष अभ्यंग स्नान और लक्ष्मी पूजन दोनों एक ही दिन, 8 नवंबर को संपन्न होंगे।
प्रमुख शहरों में लक्ष्मी पूजा का समय (8 नवंबर 2026)
स्थानीय सूर्यास्त और लग्न के आधार पर विभिन्न शहरों में मुहूर्त में थोड़ा बदलाव होता है। 8 नवंबर 2026 को कुछ प्रमुख शहरों के लक्ष्मी पूजा मुहूर्त नीचे दिए गए हैं। सटीक समय के लिए अपने स्थानीय पुरोहित से संपर्क करें।
- नोएडा: शाम 05:54 से 07:49
- मुंबई: शाम 06:27 से 08:27
- बेंगलुरु: शाम 06:17 से 08:20
- कोलकाता: शाम 05:20 से 07:18
- जयपुर: शाम 06:03 से 07:59
- पुणे: शाम 06:24 से 08:24
- अहमदाबाद: शाम 06:22 से 08:20
- चेन्नई: शाम 06:07 से 08:09
निष्कर्ष: विविधता में एकता का संदेश
नरक चतुर्दशी की ये विविध परंपराएं हमें बताती हैं कि भारत के हर कोने में भले ही रीति-रिवाज अलग हों, लेकिन उनके पीछे का भाव एक ही है। चाहे वह गोवा का नरकासुर दहन हो या महाराष्ट्र का अभ्यंग स्नान, हर परंपरा हमें स्वच्छता, आत्म-शुद्धि और बुराई पर अच्छाई की जीत की याद दिलाती है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि दीपावली केवल दीये जलाने का नाम नहीं है, बल्कि अपने भीतर के अंधकार और आलस्य को मिटाकर प्रकाश की ओर बढ़ने का संकल्प है।
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स्रोत: द्रिक पंचांग (नई दिल्ली के लिए गणना), प्रचलित धार्मिक ग्रंथ और लोक परंपराएं। मुहूर्त स्थान के अनुसार बदलते हैं, अपने शहर के पंचांग से पुष्टि करें।





