ताज़ा खबर
छठ व्रत के नियम: नहाय-खाय से उषा अर्घ्य तक क्या करें, क्या न करें, शुद्धता और सात्विकता की पूरी सूची BREAKING: दिल्ली में जहरीली धुंध का कहर, कई इलाकों में AQI 400 के पार Decathlon and Heptathlon Explained: The Events, Order, Points System and India’s Stars अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि: 99.9% समय पालन से दुनिया भर में छाई नमो भारत संसद की संयुक्त बैठक क्या है: लोकसभा और राज्यसभा में गतिरोध कैसे सुलझता है, अनुच्छेद 108 और अब तक के तीन मौके UMANG App Guide: How to Use One App for EPF, Pension, Gas, Tax and Many Government Services टॉप 50 हेडलाइंस 8 नवंबर 2026 (सुबह): देश, प्रदेश और दुनिया की बड़ी खबरें एक नज़र में पेट्रोल डीजल के दाम 8 नवंबर 2026: दिल्ली में पेट्रोल ₹102.12, लखनऊ, पटना समेत बड़े शहरों के ताज़ा रेट
ट्रेंडिंग
राजनीति

संसद की संयुक्त बैठक क्या है: लोकसभा और राज्यसभा में गतिरोध कैसे सुलझता है, अनुच्छेद 108 और अब तक के तीन मौके

जब किसी विधेयक पर लोकसभा और राज्यसभा में सहमति नहीं बनती, तो संविधान संयुक्त बैठक का रास्ता देता है। जानिए यह कैसे काम करता है।

संसद भवन के भीतर दोनों सदनों के सदस्यों की बैठक का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

सारांश

  • भारत की संसद में दो सदन हैं, लोकसभा और राज्यसभा। आम तौर पर कोई भी विधेयक, धन विधेयक को छोड़कर, कानून बनने के लिए दोनों सदनों से पारित होना जरूरी है।
  • संयुक्त बैठक का प्रावधान हर विधेयक पर लागू नहीं होता।
  • संसद के इतिहास में अब तक सिर्फ तीन बार विधेयकों पर संयुक्त बैठक हुई है:
  • अनुच्छेद 108 में यह भी प्रावधान है कि राष्ट्रपति के संयुक्त बैठक बुलाने की मंशा की सूचना जारी करने के बाद अगर लोकसभा भंग हो जाए, तब भी संयुक्त बैठक हो सकती है।

भारत की संसद में दो सदन हैं, लोकसभा और राज्यसभा। आम तौर पर कोई भी विधेयक, धन विधेयक को छोड़कर, कानून बनने के लिए दोनों सदनों से पारित होना जरूरी है। लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है कि एक सदन किसी विधेयक को पारित कर दे और दूसरा उसे खारिज कर दे या उसमें ऐसे बदलाव कर दे जो पहले सदन को मंजूर न हों। ऐसी स्थिति में गतिरोध तोड़ने के लिए संविधान ने एक रास्ता दिया है, जिसे संसद की संयुक्त बैठक कहते हैं। आइए समझते हैं यह व्यवस्था कैसे काम करती है।

संवैधानिक आधार

संयुक्त बैठक का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 108 में है। इसके तहत राष्ट्रपति दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुला सकते हैं। व्यवहार में राष्ट्रपति यह फैसला केंद्र सरकार की सलाह पर लेते हैं।

मुख्य बातें: संसद भवन के भीतर दोनों सदनों के सदस्यों की बैठक का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

कब बुलाई जा सकती है

अनुच्छेद 108 के अनुसार किसी विधेयक के एक सदन से पारित होकर दूसरे सदन में भेजे जाने के बाद तीन स्थितियों में संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है:

  • दूसरा सदन विधेयक को खारिज कर दे।
  • दोनों सदन विधेयक में किए जाने वाले संशोधनों पर असहमत हों।
  • दूसरे सदन को विधेयक मिलने के बाद छह महीने से ज्यादा समय बीत जाए और वह उसे पारित न करे।

किन विधेयकों पर नहीं

संयुक्त बैठक का प्रावधान हर विधेयक पर लागू नहीं होता।

  • धन विधेयक: इस पर अंतिम अधिकार लोकसभा का है। राज्यसभा सिर्फ 14 दिन में सुझाव दे सकती है, जिन्हें मानना या न मानना लोकसभा पर निर्भर है। इसलिए गतिरोध की स्थिति ही नहीं बनती।
  • संविधान संशोधन विधेयक: अनुच्छेद 368 के तहत इसे दोनों सदनों से अलग-अलग विशेष बहुमत से पारित होना जरूरी है। इस पर संयुक्त बैठक नहीं हो सकती।

यह भी पढ़ें: भारत में कानून कैसे बनता है: विधेयक के तीन वाचन, संयुक्त बैठक, धन विधेयक और राष्ट्रपति की मंजूरी | लोकसभा चुनाव कैसे होता है: 543 सीटें, 272 का बहुमत, नामांकन से मतगणना और सरकार गठन तक पूरी प्रक्रिया

अध्यक्षता कौन करता है

संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष यानी स्पीकर करते हैं। उनकी अनुपस्थिति में लोकसभा उपाध्यक्ष और उनके भी न होने पर राज्यसभा के उपसभापति अध्यक्षता करते हैं। संयुक्त बैठक की प्रक्रिया के लिए अलग नियम बनाए गए हैं।

फैसला कैसे होता है

संयुक्त बैठक में विधेयक दोनों सदनों के उपस्थित और मतदान करने वाले कुल सदस्यों के साधारण बहुमत से पारित होता है। लोकसभा की सदस्य संख्या राज्यसभा से काफी ज्यादा है, इसलिए संयुक्त बैठक में आम तौर पर लोकसभा में बहुमत वाले पक्ष की स्थिति मजबूत रहती है। संयुक्त बैठक में विधेयक में नए संशोधन बहुत सीमित परिस्थितियों में ही प्रस्तावित किए जा सकते हैं, यानी वे संशोधन जो गतिरोध के कारण जरूरी हो गए हों।

अब तक के तीन मौके

संसद के इतिहास में अब तक सिर्फ तीन बार विधेयकों पर संयुक्त बैठक हुई है:

  • 1961: दहेज प्रतिषेध विधेयक।
  • 1978: बैंकिंग सेवा आयोग (निरसन) विधेयक।
  • 2002: आतंकवाद निवारण विधेयक, जिसे POTA के नाम से जाना गया।

इससे पता चलता है कि यह प्रावधान बहुत कम इस्तेमाल होता है और ज्यादातर मामलों में सदनों के बीच बातचीत और सहमति से ही रास्ता निकल जाता है।

संयुक्त अधिवेशन और संयुक्त बैठक में अंतर

अक्सर लोग राष्ट्रपति के अभिभाषण को भी संयुक्त बैठक समझ लेते हैं। अनुच्छेद 87 के तहत हर आम चुनाव के बाद पहले सत्र की शुरुआत में और हर साल के पहले सत्र की शुरुआत में राष्ट्रपति दोनों सदनों को एक साथ संबोधित करते हैं। यह विधेयक पर गतिरोध सुलझाने वाली अनुच्छेद 108 की बैठक से अलग है। इसमें किसी विधेयक पर मतदान नहीं होता।

विधेयक लंबित रहने का नियम

अनुच्छेद 108 में यह भी प्रावधान है कि राष्ट्रपति के संयुक्त बैठक बुलाने की मंशा की सूचना जारी करने के बाद अगर लोकसभा भंग हो जाए, तब भी संयुक्त बैठक हो सकती है। सामान्य स्थिति में लोकसभा भंग होने पर लोकसभा में लंबित विधेयक समाप्त हो जाते हैं, इसलिए यह प्रावधान खास है।

2002 की संयुक्त बैठक क्यों चर्चित रही

आतंकवाद निवारण विधेयक लोकसभा से पारित हो गया था, लेकिन राज्यसभा में यह गिर गया। इसके बाद मार्च 2002 में अनुच्छेद 108 के तहत संयुक्त बैठक बुलाई गई, जिसमें विधेयक पारित हुआ और यह आतंकवाद निवारण अधिनियम यानी POTA बना। इस कानून को 2004 में निरस्त कर दिया गया। यह उदाहरण दिखाता है कि संयुक्त बैठक में संख्या बल कैसे निर्णायक भूमिका निभाता है।

लोकतंत्र में महत्व

संयुक्त बैठक का प्रावधान यह सुनिश्चित करता है कि दो सदनों वाली व्यवस्था में कोई एक सदन अनिश्चितकाल तक कानून बनने की प्रक्रिया को रोक न सके। साथ ही राज्यसभा की भूमिका भी बनी रहती है, क्योंकि यह व्यवस्था अंतिम विकल्प के रूप में ही इस्तेमाल होती है।

परीक्षा के लिए याद रखें

  • अनुच्छेद 108: संयुक्त बैठक।
  • अध्यक्षता: लोकसभा अध्यक्ष।
  • धन विधेयक और संविधान संशोधन पर संयुक्त बैठक नहीं।
  • अब तक तीन बार: 1961, 1978, 2002।

संसद की संयुक्त बैठक कौन बुलाता है

राष्ट्रपति, संविधान के अनुच्छेद 108 के तहत।

क्या धन विधेयक पर संयुक्त बैठक हो सकती है

नहीं।

स्रोत: Constitution of India (Legislative Department), Lok Sabha: Joint Sittings of Parliament, Wikipedia: Joint session of the Parliament of India

लेखक

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी डेमोक्रेटिक भारत लाइव के संस्थापक, मालिक और संपादक हैं। डिजिटल मीडिया में 6 साल से अधिक के अनुभव के साथ वे मुख्य रूप से राजनीति और चुनाव की खबरें कवर करते हैं, साथ ही देश, कारोबार और खेल से जुड़ी अहम खबरों का संपादन करते हैं। वेबसाइट की संपादकीय नीति, तथ्य-जांच और प्रकाशित सामग्री की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की है।

अपनी राय लिखें

WhatsApp Facebook X