अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नाटो का नाम अक्सर सुनने को मिलता है, खासकर यूरोप की सुरक्षा, रूस यूक्रेन संघर्ष या अमेरिका और यूरोप के रिश्तों की खबरों में। नाटो यानी नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन उत्तर अमेरिका और यूरोप के देशों का सैन्य और राजनीतिक गठबंधन है। इसका मूल विचार यह है कि किसी एक सदस्य पर हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा। इस लेख में जानिए नाटो कब और क्यों बना, यह कैसे काम करता है और इसका सबसे अहम नियम क्या है।
नाटो कब और क्यों बना
दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप कमजोर था और पश्चिमी देशों को सोवियत संघ के बढ़ते असर की चिंता थी। इसी माहौल में 4 अप्रैल 1949 को वाशिंगटन में उत्तर अटलांटिक संधि पर हस्ताक्षर हुए। इस संधि से नाटो बना। शुरुआत में 12 देश इसके संस्थापक सदस्य थे: अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम, नीदरलैंड, लक्जमबर्ग, डेनमार्क, नॉर्वे, आइसलैंड, इटली और पुर्तगाल। संधि छोटी है और इसमें कुल 14 अनुच्छेद हैं।

अनुच्छेद 5: सामूहिक रक्षा
नाटो की सबसे अहम धारा अनुच्छेद 5 है। इसमें कहा गया है कि यूरोप या उत्तर अमेरिका में किसी एक या ज्यादा सदस्यों पर सशस्त्र हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा। ऐसे में हर सदस्य जरूरी समझी जाने वाली कार्रवाई करेगा, जिसमें सैन्य कार्रवाई भी शामिल हो सकती है। नाटो के इतिहास में अनुच्छेद 5 को अब तक एक बार लागू किया गया है, 11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर हुए आतंकी हमलों के बाद।
अनुच्छेद 4 क्या है
अनुच्छेद 4 के तहत कोई भी सदस्य देश यह महसूस करे कि उसकी क्षेत्रीय अखंडता, राजनीतिक आजादी या सुरक्षा खतरे में है, तो वह बाकी सदस्यों से औपचारिक बातचीत की मांग कर सकता है। यह सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि परामर्श की प्रक्रिया है।
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सदस्य कैसे बढ़े
शीत युद्ध के दौरान ग्रीस, तुर्किये, पश्चिम जर्मनी और स्पेन जैसे देश नाटो में शामिल हुए। सोवियत संघ के टूटने के बाद पूर्वी और मध्य यूरोप के कई देश भी सदस्य बने, जैसे पोलैंड, हंगरी, चेक गणराज्य और बाल्टिक देश। रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद लंबे समय से तटस्थ रहे फिनलैंड ने अप्रैल 2023 में और स्वीडन ने मार्च 2024 में सदस्यता ली। इनके साथ नाटो के सदस्यों की संख्या 32 हो गई। नए सदस्य को शामिल करने के लिए सभी मौजूदा सदस्यों की सहमति जरूरी होती है।
फैसले कैसे होते हैं
नाटो में फैसले सर्वसम्मति से होते हैं, यानी वोटिंग नहीं होती और हर सदस्य की सहमति चाहिए। सबसे अहम राजनीतिक संस्था नॉर्थ अटलांटिक काउंसिल है, जिसमें हर सदस्य देश का प्रतिनिधि होता है। संगठन का नेतृत्व महासचिव करता है। नाटो का मुख्यालय बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में है। सैन्य कमान की जिम्मेदारी सुप्रीम एलाइड कमांडर यूरोप के पास होती है।
रक्षा खर्च का लक्ष्य
सदस्य देशों ने अपने रक्षा खर्च के लिए जीडीपी के हिस्से का लक्ष्य तय किया है। लंबे समय तक यह लक्ष्य दो प्रतिशत रहा। अमेरिका लगातार यूरोपीय देशों पर ज्यादा खर्च करने का दबाव बनाता रहा है और हाल के सम्मेलनों में इस लक्ष्य को बढ़ाने पर सहमति बनी है। रक्षा खर्च नाटो की बैठकों में सबसे ज्यादा चर्चा वाले मुद्दों में रहता है।
भारत और नाटो
भारत नाटो का सदस्य नहीं है और न ही किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा है। भारत की विदेश नीति रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रही है। भारत के कई नाटो देशों के साथ अलग अलग रक्षा और रणनीतिक रिश्ते जरूर हैं, जैसे अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन।
आलोचना
रूस नाटो के पूर्व की ओर विस्तार का लगातार विरोध करता रहा है और इसे अपनी सुरक्षा के लिए खतरा बताता है। वहीं नाटो का कहना है कि हर देश को अपना सुरक्षा रास्ता चुनने का अधिकार है। यह मतभेद यूरोप की मौजूदा सुरक्षा बहस का केंद्र है।
नाटो के अभियान
शीत युद्ध के दौरान नाटो ने कोई बड़ी जंग नहीं लड़ी, लेकिन उसके बाद कई सैन्य अभियान चलाए। 1990 के दशक में बोस्निया और कोसोवो में नाटो ने हवाई कार्रवाई की। 2001 के बाद अफगानिस्तान में नाटो के नेतृत्व वाला अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा सहायता बल यानी ISAF तैनात रहा। 2011 में लीबिया में भी नाटो ने कार्रवाई की। हाल के वर्षों में पूर्वी यूरोप के सदस्य देशों में नाटो ने अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई है।
साझेदार देश
नाटो के सदस्यों के अलावा कई साझेदार देश भी हैं, जिनके साथ वह सैन्य अभ्यास और बातचीत करता है। इनमें जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और न्यूजीलैंड जैसे देश शामिल हैं।
नाटो की स्थापना कब हुई
4 अप्रैल 1949 को।
नाटो का मुख्यालय कहां है
ब्रसेल्स, बेल्जियम में।
अनुच्छेद 5 कब लागू हुआ
अब तक एक बार, 11 सितंबर 2001 के हमलों के बाद।
क्या भारत नाटो का सदस्य है
नहीं।
स्रोत: NATO: Member countries, NATO: The North Atlantic Treaty, NATO: Collective defence and Article 5





