भाई दूज देश भर में भाई के तिलक के साथ मनाया जाता है, लेकिन बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस दिन एक अनोखी लोक परंपरा निभाई जाती है, जिसे गोधन कूटना कहते हैं। इसमें बहनें पहले भाइयों को श्राप देती हैं, फिर उसके प्रायश्चित में अपनी जीभ पर कांटा चुभाती हैं और भाई की लंबी उम्र की कामना करती हैं। इस बार भाई दूज 11 नवंबर 2026 को है। जानिए गोधन कूटना की परंपरा।
गोधन क्या है
भाई दूज की सुबह आंगन या गांव के किसी साझा स्थान पर गोबर से एक चौकोर या मानव आकृति बनाई जाती है, जिसे गोधन कहते हैं। इसके अंदर गोबर से ही यमराज, यमुना और अन्य आकृतियां बनाई जाती हैं। आसपास रेंगनी या भटकटैया जैसे कांटेदार पौधे के कांटे रखे जाते हैं।

श्राप देने की रस्म
सबसे अनोखी रस्म यह है कि बहनें अपने भाइयों को श्राप देती हैं, जैसे मर जाने का। लोक मान्यता है कि ऐसा करने से भाई पर आने वाला यम का संकट टल जाता है। इसके बाद बहनें प्रायश्चित के रूप में कांटे को अपनी जीभ पर हल्के से चुभाती हैं और भाई की लंबी उम्र और सुख की कामना करती हैं।
कथा क्या कहती है
इस परंपरा से जुड़ी कई लोक कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार एक बहन को पता चला कि उसके भाई की मृत्यु यम के दूतों के हाथों तय है। उसने यम को धोखा देने के लिए भाई को गालियां और श्राप देने शुरू कर दिए, ताकि यम समझें कि उसकी कोई परवाह करने वाला नहीं। उसकी इस चतुराई से भाई बच गया। तभी से भाई दूज पर यह परंपरा चली आ रही है।
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मूसल से कूटना
इसके बाद महिलाएं गीत गाते हुए मूसल से गोधन की आकृति को कूटती हैं। माना जाता है कि यह भाई के शत्रुओं और संकट का नाश करने का प्रतीक है। गांव की महिलाएं एक साथ यह रस्म निभाती हैं और लोकगीत गाती हैं।
बजरी खिलाना
गोधन कूटने के बाद बहनें भाइयों को बजरी, यानी चने या अन्य अनाज के दाने, खिलाती हैं। कहा जाता है कि बजरी जितनी मजबूत होती है, भाई भी उतना ही मजबूत बने। इसके बाद तिलक, आरती और भोजन की बाकी रस्में होती हैं।
कहां मनाई जाती है
यह परंपरा मुख्य रूप से बिहार के भोजपुर, मगध और मिथिला इलाकों, और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में निभाई जाती है। अलग-अलग जगह इसकी रस्मों में थोड़ा अंतर होता है।
शहरों में
दिल्ली, मुंबई और दूसरे शहरों में रहने वाले पूर्वांचल के परिवार भी सोसायटी या मोहल्ले में मिलकर यह रस्म निभाते हैं। गोबर न मिलने पर मिट्टी से आकृति बनाई जाती है।
सावधानी
कांटा चुभाने की रस्म प्रतीकात्मक रखें और बच्चों को इससे दूर रखें। गोबर छूने के बाद हाथ अच्छी तरह धोएं।
क्या यह परंपरा अनिवार्य है?
नहीं। यह एक क्षेत्रीय लोक परंपरा है। जहां यह प्रचलित नहीं है, वहां भाई दूज तिलक और भोजन के साथ मनाया जाता है।
स्रोत: द्रिक पंचांग, बिहार पर्यटन। जानकारी अक्टूबर 2026 तक की।





