अमेरिका में हुए महत्वपूर्ण मध्यावधि चुनावों के परिणामों ने वहां की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर कर दिया है, जहां डेमोक्रेटिक पार्टी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए रिपब्लिकन पार्टी को पीछे छोड़ दिया है. इन चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी को प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों ही सदनों में अपनी सीटें गंवानी पड़ी हैं, जिससे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के लिए आने वाले समय में विधायी चुनौतियां बढ़ गई हैं. इस राजनीतिक बदलाव का असर न केवल अमेरिका के घरेलू फैसलों पर पड़ेगा, बल्कि भारत के साथ उसके द्विपक्षीय संबंधों और वैश्विक कूटनीति पर भी इसके गहरे प्रभाव पड़ने की संभावना जताई जा रही है.

अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में सत्ता का संतुलन बदला अमेरिकी मध्यावधि चुनाव 2026 के नतीजों ने रिपब्लिकन पार्टी के लिए एक कठिन स्थिति पैदा कर दी है. प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) और सीनेट, दोनों में ही पार्टी को महत्वपूर्ण नुकसान उठाना पड़ा है. डेमोक्रेटिक पार्टी की इस बड़ी जीत का सीधा मतलब यह है कि अब राष्ट्रपति ट्रंप के लिए संसद में अपने प्रस्तावित कानूनों, बजट और अन्य महत्वपूर्ण फैसलों को पारित कराना पहले की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण होगा. विपक्षी डेमोक्रेटिक सांसद अब सरकार की नीतियों पर अधिक मुखरता से सवाल उठा सकेंगे और प्रशासन के प्रस्तावों को रोकने या उनमें बदलाव करने की शक्ति रखेंगे. हालांकि, इन नतीजों के बावजूद डोनाल्ड ट्रंप जनवरी 2029 तक राष्ट्रपति के पद पर बने रहेंगे और उनके पास विदेश नीति से जुड़े बड़े निर्णय लेने का अधिकार सुरक्षित रहेगा. व्हाइट हाउस का रुख और ट्रंप की प्रतिक्रिया चुनाव में हार का सामना करने के बाद व्हाइट हाउस की ओर से एक कड़ा संदेश जारी किया गया है. व्हाइट हाउस ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एक तस्वीर साझा की है, जिसके साथ ‘नेवर सरेंडर’ यानी कभी हार न मानने का संदेश लिखा गया है. यह पोस्ट इस बात का संकेत है कि प्रशासनिक स्तर पर ट्रंप अपनी नीतियों और रुख पर अडिग रहने वाले हैं. खुद राष्ट्रपति ट्रंप ने इस चुनावी हार के पीछे ईरान के साथ चल रहे युद्ध को एक प्रमुख कारण माना है. उनका मानना है कि युद्ध की परिस्थितियों ने मतदाताओं के फैसले को प्रभावित किया, जिसके कारण रिपब्लिकन पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा. इस बीच, ईरान की राजधानी तेहरान और अमेरिका के विभिन्न हिस्सों में रिपब्लिकन पार्टी की हार पर जश्न का माहौल देखा गया. तेहरान में लोगों ने ट्रंप के पोस्टरों को जलाकर अपना विरोध और खुशी जाहिर की. भारत और अमेरिका के रिश्तों पर विशेषज्ञों की राय विदेश नीति के जानकार सी. राजा मोहन ने इन चुनाव परिणामों के संदर्भ में भारत और अमेरिका के भविष्य के संबंधों का विश्लेषण किया है. उनके अनुसार, अमेरिका में सत्ता के बदलते समीकरणों के बीच भारत के सामने तीन बड़ी चुनौतियां खड़ी हो गई हैं. भारत को अब अपनी कूटनीति में केवल अमेरिकी सरकार तक सीमित रहने के बजाय वहां के अन्य प्रभावशाली समूहों के साथ भी संवाद बढ़ाना होगा. इसमें अमेरिकी विपक्षी दल, बड़े कारोबारी घराने, विश्वविद्यालय और सामाजिक संगठन शामिल हैं. राजा मोहन का सुझाव है कि भारत की राजनीतिक पार्टियों को भी अमेरिकी समाज के विभिन्न वर्गों के साथ अपने संपर्क मजबूत करने चाहिए. उन्होंने उल्लेख किया कि जहां भाजपा और आरएसएस अपने स्तर पर अमेरिका में सक्रिय हैं, वहीं कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी वहां के दौरों के माध्यम से संपर्क बना रहे हैं, लेकिन कांग्रेस को अभी और व्यवस्थित तरीके से जुड़ने की आवश्यकता है. भारतीय मूल के उम्मीदवारों का शानदार प्रदर्शन इन चुनावों में भारतीय प्रवासियों के लिए भी उत्साहजनक खबरें सामने आई हैं. अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में भारतीय मूल के पांच उम्मीदवारों ने सांसद के रूप में जीत हासिल की है, जो अमेरिकी राजनीति में भारतीय समुदाय के बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है. इसके अलावा अरुणा मिलर ने भी अपनी जीत दर्ज की है. भारतीय मूल के इन नेताओं की सफलता भविष्य में भारत और अमेरिका के बीच एक सेतु का काम कर सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अब अपनी विदेश नीति को और अधिक लचीला बनाना होगा ताकि अमेरिका में बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के बावजूद दोनों देशों के रणनीतिक हित सुरक्षित रह सकें. अमेरिकी राजनीति में होने वाले ये बदलाव व्यापार, एच-1बी वीजा नीतियों और टैरिफ जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी असर डाल सकते हैं, जिनके लिए भारत को तैयार रहने की जरूरत है.
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स्रोत: Aaj Tak, Prabhat Khabar, India TV





