मध्य पूर्व में जारी भारी तनाव के बीच ईरान ने एक बड़ा कूटनीतिक और व्यापारिक निर्णय लेते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले भारतीय जहाजों को प्रतिबंधों से छूट देने का ऐलान किया है। ईरान की संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति समिति के उपाध्यक्ष अमीर हयात मुकद्दम ने स्पष्ट किया है कि भारत के साथ-साथ चीन, इराक और कतर को भी इन पाबंदियों से राहत दी गई है। यह फैसला भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि होर्मुज का मार्ग भारत के कच्चे तेल और एलपीजी आयात का एक बहुत बड़ा हिस्सा संभालता है।

ईरान का बड़ा फैसला और चार देशों को मिली छूट
ईरान ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार के सबसे महत्वपूर्ण रास्तों में से एक, होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही को लेकर अपनी नीति में बदलाव किया है। ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति समिति के उपाध्यक्ष अहमद हयात मोगद्दम ने एक आधिकारिक बैठक के दौरान इस निर्णय की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ईरान ने वर्तमान सुरक्षा और आर्थिक परिस्थितियों की समीक्षा करने के बाद भारत, चीन, इराक और कतर के जहाजों को ट्रांजिट पाबंदियों से पूरी तरह मुक्त कर दिया है। मोगद्दम के अनुसार, इन चारों देशों के जहाज अब इस समुद्री मार्ग से बिना किसी रोक-टोक के स्वतंत्र रूप से गुजर रहे हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि अमेरिकी सेना भी इन जहाजों को रोकने की कोशिश नहीं कर रही है। यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच संघर्ष के कारण इस क्षेत्र में समुद्री व्यापार पर गहरा संकट मंडरा रहा था।
भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक महत्व
होर्मुज जलडमरूमध्य भारत के लिए एक अनिवार्य एनर्जी लाइफलाइन की तरह काम करता है। केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, साल 2026 के संघर्ष की स्थितियों से पहले भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से पूरा करता था। भारत के कुल कच्चे तेल के आयात का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से होकर आता है। इसके अलावा, भारत की रसोई गैस यानी एलपीजी की आपूर्ति के लिए यह मार्ग और भी अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि लगभग 90 प्रतिशत एलपीजी आयात होर्मुज के रास्ते ही संपन्न होता है। केवल तेल और एलपीजी ही नहीं, बल्कि भारत अपनी एलएनजी सप्लाई का एक बड़ा हिस्सा भी कतर और संयुक्त अरब अमीरात से इसी समुद्री मार्ग के जरिए प्राप्त करता है। ईरान के इस फैसले से भारत को अपनी ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को निर्बाध बनाए रखने में बड़ी मदद मिलेगी।
भारत को छूट देने के पीछे दवाओं की जरूरत
ईरान द्वारा भारत को यह विशेष छूट देने के पीछे केवल कूटनीतिक संबंध ही नहीं, बल्कि उसकी अपनी अनिवार्य आवश्यकताएं भी जुड़ी हुई हैं। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स और आधिकारिक बयानों के अनुसार, ईरान वर्तमान में कड़े अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और क्षेत्रीय युद्ध की स्थिति के कारण जीवनरक्षक दवाओं की भारी कमी का सामना कर रहा है। वैश्विक बाजारों से दवाएं जुटाना ईरान के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। भारत का फार्मास्युटिकल क्षेत्र दुनिया भर में अपनी मजबूती के लिए जाना जाता है और वह ईरान के लिए दवाओं का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। भारतीय जहाजों को रास्ता देने से ईरान को भारत से जरूरी चिकित्सा सामग्री और दवाएं आसानी से प्राप्त करने में मदद मिलेगी। यह व्यवस्था दोनों देशों के बीच एक पारस्परिक लाभ के ढांचे पर आधारित है, जहां भारत को ऊर्जा सुरक्षा मिल रही है और ईरान को स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जरूरी सामान मिल रहा है।
चीन के लिए राजनीतिक समर्थन की रणनीति
ईरान ने चीन को भी इस छूट के दायरे में रखा है, जिसके पीछे उसकी एक अलग रणनीतिक सोच काम कर रही है। चीन वर्तमान में ऊर्जा और व्यापार के मोर्चे पर ईरान का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण साझेदार है। अमेरिकी दबाव के बीच ईरान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर राजनीतिक और राजनयिक समर्थन की सख्त जरूरत है, जो उसे बीजिंग से प्राप्त हो रहा है। चीन के साथ व्यापार जारी रखने से ईरान को न केवल आर्थिक लाभ मिलता है, बल्कि उसे वैश्विक कूटनीति में एक मजबूत साथी का साथ भी मिलता है। इसी तरह इराक और कतर को भी क्षेत्रीय संतुलन और आपसी हितों को ध्यान में रखते हुए इस छूट में शामिल किया गया है।
ईरान के भीतर राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व में मंथन
इस फैसले के साथ ही ईरान के आंतरिक राजनीतिक गलियारों में भी बड़ी हलचल देखी जा रही है। अमेरिका के साथ संभावित सैन्य टकराव की आशंकाओं के बीच ईरान का शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व अब कूटनीतिक समाधान की तलाश में है। रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन, संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ और विदेश मंत्री अब्बास अराघची सैन्य नेतृत्व पर इस बात के लिए दबाव बना रहे हैं कि वे कतर की मध्यस्थता वाले प्रस्तावों पर गंभीरता से विचार करें। कतर के प्रतिनिधि हाल ही में तेहरान पहुंचे थे ताकि वे प्रस्तावित समझौते पर ईरान का अंतिम रुख जान सकें। हालांकि, ईरान का सैन्य नेतृत्व अमेरिका के साथ शांति की संभावनाओं को लेकर अब भी आशंकित है, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व युद्ध को टालने और बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने की पैरवी कर रहा है।
अमेरिकी चुनाव और बदलती वैश्विक परिस्थितियां
ईरान के इस रुख में बदलाव के पीछे अमेरिका के हालिया मिडटर्म चुनाव परिणामों को भी एक बड़ी वजह माना जा रहा है। इन चुनावों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली और विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने संसद के दोनों सदनों में अपनी स्थिति को काफी मजबूत कर लिया है। अमेरिका में राजनीतिक शक्ति के इस संतुलन ने ईरान को अपनी रणनीतियों पर दोबारा विचार करने का अवसर दिया है। ईरान का आंतरिक आकलन यह कहता है कि अमेरिका के साथ सीधा युद्ध सबसे संभावित स्थिति हो सकती है, लेकिन वे इसे टालने के लिए हर संभव कूटनीतिक प्रयास करना चाहते हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य, जो ओमान और ईरान के बीच स्थित है और फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है, इस पूरी भू-राजनीतिक बिसात का केंद्र बना हुआ है।
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स्रोत: Aaj Tak, Prabhat Khabar





