भारत के उच्चतम न्यायालय ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों के अनिवार्य रोटेशन की मांग करने वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने स्पष्ट किया कि इस तरह के नीतिगत निर्णय विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आते हैं और अदालतों द्वारा इनका आदेश नहीं दिया जा सकता। न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले को बरकरार रखा जिसमें परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(सी) की वैधता की पुष्टि की गई थी।

उच्चतम न्यायालय ने बुधवार, 4 नवंबर, 2026 को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए सीटों के आरक्षण के संबंध में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने संसद और राज्य विधानसभाओं में आरक्षित सीटों की मौजूदा व्यवस्था में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया। यह निर्णय उस याचिका पर आया जिसमें पंचायतों और नगर पालिकाओं की तर्ज पर इन आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों के लिए एक अनिवार्य रोटेशन तंत्र की मांग की गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण और उनमें आरक्षण की प्रकृति तय करना संसद का कार्य है, न कि न्यायपालिका का।
कानूनी ढांचा और परिसीमन अधिनियम की धारा
यह कानूनी चुनौती मुख्य रूप से परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(सी) के खिलाफ दी गई थी। यह विशेष प्रावधान उन क्षेत्रों में आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों की पहचान करने के मानदंड निर्धारित करता है जहां अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति की आबादी का अनुपात तुलनात्मक रूप से अधिक है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि इस प्रावधान में रोटेशन प्रणाली को शामिल किया जाना चाहिए ताकि एक ही सीट लंबे समय तक आरक्षित न रहे। हालांकि, उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया जिसने इस धारा को संवैधानिक रूप से वैध माना था। पीठ ने नोट किया कि वर्तमान कानून जनसंख्या के अनुपात पर केंद्रित है, और किसी भी रोटेशन आधारित मॉडल के लिए विधायी संशोधन की आवश्यकता होगी।
कादीपुर निर्वाचन क्षेत्र और याचिकाकर्ता का तर्क
इस मामले में याचिकाकर्ता उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के 191-कादीपुर विधानसभा क्षेत्र के एक मतदाता जगदीश सिंह थे। उनकी मुख्य शिकायत इस बात पर केंद्रित थी कि कादीपुर निर्वाचन क्षेत्र अपने गठन के बाद से लगभग सात दशकों से अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित बना हुआ है। सिंह ने तर्क दिया कि बिना किसी रोटेशन के इस लंबे समय तक चले आ रहे आरक्षण ने कई संवैधानिक चिंताओं को जन्म दिया है। याचिका के अनुसार, रोटेशन तंत्र की अनुपस्थिति भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 19 के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है। उन्होंने तर्क दिया कि वर्तमान व्यवस्था मतदाताओं के विकल्पों को प्रतिबंधित करती है, क्योंकि वे पीढ़ियों से केवल अनुसूचित जाति समुदाय के उम्मीदवारों को चुनने के लिए मजबूर हैं।
राजनीतिक परिवारों और स्थानीय निकायों से तुलना
याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि इन आरक्षित सीटों की स्थिर प्रकृति ने अनजाने में सीमित संख्या में राजनीतिक परिवारों को लाभ पहुंचाया है। उन्होंने सुझाव दिया कि व्यापक समुदाय के हितों को आगे बढ़ाने के बजाय, वर्तमान प्रणाली कुछ परिवारों को इन निर्वाचन क्षेत्रों में राजनीतिक शक्ति पर पकड़ बनाए रखने की अनुमति देती है। इसे सुधारने के लिए, याचिका ने अदालत से समय-समय पर रोटेशन प्रणाली लागू करने का निर्देश देने का आग्रह किया। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 243डी और 243टी का उदाहरण दिया, जो क्रमशः पंचायतों और नगर निगमों में आरक्षित सीटों के रोटेशन का प्रावधान करते हैं। याचिकाकर्ता का मानना था कि यही सिद्धांत उच्च विधायी निकायों पर भी लागू होना चाहिए।
विचारधारा और प्रतिनिधित्व पर न्यायिक टिप्पणी
सुनवाई के दौरान, न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची ने बहुदलीय लोकतंत्र में चुनावी विकल्पों की प्रकृति पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि ऐसी प्रणाली में मतदाताओं से उम्मीद की जाती है कि वे किसी उम्मीदवार की जाति या धर्म के बजाय राजनीतिक विचारधाराओं के आधार पर अपना निर्णय लें। न्यायमूर्ति बागची ने उल्लेख किया कि चूंकि विभिन्न विचारधाराओं वाले कई राजनीतिक दल चुनावों में भाग लेते हैं, इसलिए किसी विशेष विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति की पहचान उस विचारधारा की तुलना में गौण होनी चाहिए। उन्होंने टिप्पणी की कि यदि कोई मतदाता किसी विशेष पार्टी के मंच का समर्थन करता है, तो उम्मीदवार की जाति कम प्रासंगिक हो जाती है, जो याचिकाकर्ता के इस तर्क को कमजोर करता है कि मतदाता विकल्प प्रतिबंधित हैं।
संसद का अधिकार क्षेत्र और भविष्य का मार्ग
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस बात पर जोर दिया कि याचिकाकर्ता ने मांगे गए समाधान के लिए गलत मंच का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने कहा कि आरक्षित सीटों के रोटेशन के संबंध में नीति में बदलाव की किसी भी मांग को संसद के समक्ष रखा जाना चाहिए। सीजेआई ने उल्लेख किया कि विधायिका ऐसे जटिल नीतिगत मामलों पर विचार-विमर्श करने के लिए उपयुक्त निकाय है। सुनवाई के दौरान एक हल्की टिप्पणी में, मुख्य न्यायाधीश ने सुझाव दिया कि याचिकाकर्ता इस मुद्दे पर ध्यान आकर्षित करने के लिए सार्वजनिक विरोध या प्रदर्शनों के माध्यम से अपनी चिंताएं व्यक्त कर सकते हैं। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि हालांकि रोटेशन एक आदर्श विचार हो सकता है, लेकिन न्यायपालिका इसे अनिवार्य नहीं कर सकती। याचिकाकर्ता को सलाह दी गई कि वह अपने जनप्रतिनिधियों के माध्यम से इस बदलाव के लिए प्रयास करें।
स्रोत: The Hindu





