भारत के उच्चतम न्यायालय ने चिदंबरम सबानायगर मंदिर के प्रशासन को लेकर मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए एक महत्वपूर्ण आदेश पर रोक लगा दी है। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पांचोली की पीठ ने तमिलनाडु सरकार को इस संबंध में नोटिस जारी किया है और उच्च न्यायालय के उस फैसले के कार्यान्वयन को फिलहाल फ्रीज कर दिया है जिसमें मंदिर के प्रबंधन के लिए एक विशेष बोर्ड के गठन का निर्देश दिया गया था। यह कानूनी विवाद तमिलनाडु के इस प्राचीन मंदिर के प्रबंधन और वहां के पुजारियों के समुदाय, जिन्हें पोधु दीक्षितर कहा जाता है, के अधिकारों से जुड़ा हुआ है।

मंदिर प्रशासन में उच्चतम न्यायालय का हस्तक्षेप
उच्चतम न्यायालय ने बुधवार, 4 नवंबर, 2026 को मद्रास उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगाने का निर्णय लिया जो 30 अक्टूबर को पारित किया गया था। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में चिदंबरम सबानायगर मंदिर के प्रशासन के लिए एक प्रबंधन बोर्ड (बीओएम) गठित करने का निर्देश दिया था। शीर्ष अदालत की पीठ ने इस मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार से कई महत्वपूर्ण सवाल पूछे। अदालत ने विशेष रूप से उस कानूनी क्षेत्राधिकार पर सवाल उठाया जिसके तहत उच्च न्यायालय ने यह आदेश दिया था। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार ने तमिलनाडु सरकार से पूछा कि क्या उच्च न्यायालयों के पास केवल सार्वजनिक मंदिरों पर ही पैरेंस पैट्रिए यानी अभिभावक के रूप में क्षेत्राधिकार है या यह अन्य धर्मों के पूजा स्थलों पर भी लागू होता है। इस सवाल ने मंदिर प्रशासन के कानूनी पहलुओं पर एक नई बहस छेड़ दी है।
प्रबंधन बोर्ड का गठन और उसके निर्धारित कार्य
मद्रास उच्च न्यायालय ने मंदिर के गौरव को वापस लाने के उद्देश्य से एक प्रबंधन बोर्ड की संरचना तैयार की थी। इस बोर्ड की अध्यक्षता के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीशों वी. भरतीदासन और आर. सुरेश कुमार को नियुक्त किया गया था। इसके अलावा, सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी सी. राजेंद्रन को बोर्ड का सदस्य नामित किया गया था। इस बोर्ड में पदेन सदस्यों के रूप में पोधु दीक्षितर एसोसिएशन के सचिव और हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त (एचआर एंड सीई) विभाग के सचिव को भी शामिल किया जाना था। उच्च न्यायालय ने इस बोर्ड को कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी थीं। बोर्ड को तमिलनाडु विरासत आयोग के साथ परामर्श करके मंदिर परिसर में किए गए उन अनधिकृत निर्माणों को हटाने का निर्देश दिया गया था जिनसे प्राचीन संरचना को नुकसान पहुंचा था। इसके साथ ही, बोर्ड को जिला प्रशासन की सहायता से मंदिर की उन संपत्तियों को वापस लेने के लिए कदम उठाने का कार्य सौंपा गया था जिन पर अतिक्रमण किया गया है।
कुप्रबंधन और वित्तीय पारदर्शिता पर कानूनी बहस
तमिलनाडु सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं शेखर नफाड़े और जयदीप गुप्ता ने अदालत में दलील दी कि मंदिर की संपत्ति को गंभीर नुकसान पहुंचाया गया है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पोधु दीक्षितर समुदाय ने पिछले 12 वर्षों में मंदिर से प्राप्त आय का पूरा विवरण साझा नहीं किया है। श्री नफाड़े ने तर्क दिया कि उच्च न्यायालय के पास पीठासीन देवता के हितों की रक्षा के लिए सार्वजनिक मंदिरों पर पैरेंस पैट्रिए क्षेत्राधिकार है, क्योंकि कानून के अनुसार देवता को एक कानूनी व्यक्ति माना जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान कानून केवल सार्वजनिक मंदिरों के लिए इस क्षेत्राधिकार को मान्यता देता है, न कि चर्चों या अन्य धर्मों के पूजा स्थलों के लिए। दूसरी ओर, विपक्षी पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता साई दीपक अय्यर ने प्रस्तुत किया कि अदालत को इस बात की जांच करनी चाहिए कि पैरेंस पैट्रिए का सिद्धांत केवल मंदिरों पर ही क्यों लागू होता है।
कानूनी विवाद की पृष्ठभूमि और वर्तमान स्थिति
यह मामला 2014 में उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित आदेशों के बाद की स्थितियों से जुड़ा है। उच्च न्यायालय का मानना था कि 2014 में मंदिर का संचालन वापस मिलने के बाद से पोधु दीक्षितर समुदाय ने मंदिर का कुप्रबंधन किया है। राज्य सरकार के वकीलों ने इसे कुप्रबंधन का एक प्रमुख उदाहरण बताया और कहा कि मंदिर को वापस सौंपने के बाद ऐसी स्थितियां उत्पन्न हुई हैं। हालांकि, उच्चतम न्यायालय ने अब इस पूरे मामले की गहराई से जांच करने का रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति कुमार ने सुनवाई के दौरान अधिवक्ताओं को कोई भी व्यापक बयान देने से बचने की सलाह दी। अब इस मामले में तमिलनाडु सरकार को अपना पक्ष रखना होगा। फिलहाल, उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त प्रबंधन बोर्ड के कार्य करने पर रोक लग गई है और मंदिर का प्रशासन पूर्व स्थिति में बना रहेगा जब तक कि शीर्ष अदालत इस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं ले लेती।
स्रोत: The Hindu





