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गाजर की खेती: देसी और यूरोपियन किस्मों की बुवाई का समय, मेड़ पर बुवाई, बीज भिगोने का तरीका, छंटाई और जड़ फटने से बचाव

सर्दियों में गाजर की मांग खूब रहती है। सही किस्म और मेड़ पर बुवाई से लंबी, चिकनी और रंगदार जड़ें मिलती हैं।

खेत से निकाली गई ताजी लाल गाजरों का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

सारांश

  • सर्दियां आते ही बाजार में लाल गाजर की भरमार हो जाती है। गाजर का हलवा, अचार, सलाद और सब्जी, हर रूप में इसकी मांग रहती है।
  • गाजर के लिए गहरी, भुरभुरी और अच्छी जल निकासी वाली बलुई दोमट मिट्टी सबसे अच्छी है।
  • शुरुआती दिनों में खरपतवार फसल को बहुत नुकसान करते हैं, इसलिए दो से तीन बार निराई करें।
  • देसी किस्मों के बीज उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में भी बन जाते हैं।

सर्दियां आते ही बाजार में लाल गाजर की भरमार हो जाती है। गाजर का हलवा, अचार, सलाद और सब्जी, हर रूप में इसकी मांग रहती है। कम समय में तैयार होने वाली यह फसल किसानों को अच्छी आमदनी दे सकती है, बशर्ते सही किस्म, सही समय और सही तरीके से बुवाई की जाए। इस लेख में जानिए गाजर की खेती का पूरा तरीका।

गाजर की दो तरह की किस्में

गाजर की किस्में मोटे तौर पर दो तरह की होती हैं। एशियाई या देसी किस्में गर्मी कुछ ज्यादा सह लेती हैं और इनकी जड़ें लाल या गहरी लाल होती हैं। इनमें बीज भी मैदानी इलाकों में बन जाते हैं। यूरोपियन किस्में ठंडे मौसम की होती हैं, इनकी जड़ें नारंगी रंग की और आकार में एक समान होती हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान यानी IARI, पूसा ने पूसा रुधिरा, पूसा केसर और काली गाजर वाली पूसा असिता जैसी किस्में विकसित की हैं।

मुख्य बातें: खेत से निकाली गई ताजी लाल गाजरों का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

बुवाई का सही समय

उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में देसी किस्मों की बुवाई अगस्त के आखिर से अक्टूबर तक की जाती है। यूरोपियन किस्मों की बुवाई अक्टूबर से नवंबर तक बेहतर रहती है, क्योंकि इन्हें ठंडा मौसम चाहिए। पहाड़ी इलाकों में गाजर की बुवाई गर्मियों में भी होती है। बहुत गर्मी में बोने पर जड़ों का रंग फीका और स्वाद खराब हो सकता है।

मिट्टी और खेत की तैयारी

गाजर के लिए गहरी, भुरभुरी और अच्छी जल निकासी वाली बलुई दोमट मिट्टी सबसे अच्छी है। मिट्टी में पत्थर या कड़े ढेले हों तो जड़ें टेढ़ी या दो शाखाओं वाली हो जाती हैं। इसलिए खेत की तीन से चार बार गहरी जुताई करें और पाटा लगाकर मिट्टी बारीक करें। ताजा गोबर की खाद डालने से भी जड़ें फट या शाखा वाली हो सकती हैं, इसलिए केवल अच्छी तरह सड़ी हुई खाद का इस्तेमाल करें।

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बीज और बुवाई

गाजर का बीज बहुत छोटा होता है। आम तौर पर 5 से 6 किलो बीज प्रति हेक्टेयर की जरूरत होती है। बुवाई से पहले बीज को 12 से 24 घंटे पानी में भिगोने से अंकुरण बेहतर होता है। बीज को बराबर फैलाने के लिए इसे बारीक रेत या राख में मिलाकर बोया जा सकता है। मेड़ बनाकर बुवाई करना अच्छा तरीका है, इससे जड़ें सीधी और लंबी बनती हैं और खुदाई आसान होती है। कतार से कतार की दूरी 30 से 45 सेंटीमीटर रखें और बीज 1 से 1.5 सेंटीमीटर से ज्यादा गहरा न डालें।

छंटाई

अंकुरण के बाद पौधे बहुत घने उग आते हैं। बुवाई के करीब 3 से 4 हफ्ते बाद फालतू पौधे निकाल दें और पौधे से पौधे की दूरी 5 से 8 सेंटीमीटर रखें। छंटाई न करने पर जड़ें पतली और छोटी रह जाती हैं।

सिंचाई

बुवाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करें। अंकुरण तक मिट्टी में नमी बनी रहनी चाहिए। इसके बाद मौसम के अनुसार 8 से 12 दिन के अंतर पर सिंचाई करें। ध्यान रहे कि खेत में कभी बहुत सूखा और फिर अचानक ज्यादा पानी न हो, क्योंकि इससे जड़ें फट जाती हैं। खुदाई से पहले हल्की सिंचाई करने से जड़ें आसानी से निकलती हैं।

निराई और मिट्टी चढ़ाना

शुरुआती दिनों में खरपतवार फसल को बहुत नुकसान करते हैं, इसलिए दो से तीन बार निराई करें। जड़ों का ऊपरी हिस्सा धूप में आने पर हरा पड़ जाता है, इसलिए निराई के साथ हल्की मिट्टी चढ़ा दें।

रोग और कीट

गाजर में जड़ फटना, पत्तियों पर झुलसा, जड़ गलन और नीमेटोड की समस्या आ सकती है। खेत में पानी जमा न होने दें और फसल चक्र अपनाएं। कीट या रोग दिखें तो कृषि विज्ञान केंद्र की सलाह से उपचार करें।

खुदाई और बिक्री

किस्म के अनुसार गाजर लगभग 80 से 100 दिन में तैयार हो जाती है। जड़ें पूरी तरह विकसित होकर अच्छे रंग में आ जाएं तो खुदाई करें। ज्यादा देर तक खेत में छोड़ने पर जड़ें कड़ी और रेशेदार हो जाती हैं। खुदाई के बाद गाजर को धोकर, छांटकर और आकार के हिसाब से ग्रेडिंग करके बेचने पर बेहतर दाम मिलता है। बेचने से पहले Agmarknet और e-NAM पर अपनी मंडी के ताजा भाव जरूर देखें।

गाजर के बीज उत्पादन

देसी किस्मों के बीज उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में भी बन जाते हैं। इसके लिए अच्छी जड़ें चुनकर उनके ऊपरी हिस्से और पत्तियों को थोड़ा काटकर दोबारा खेत में लगाया जाता है। इन पर फूल और फिर बीज बनते हैं। यूरोपियन किस्मों के बीज के लिए ठंडे पहाड़ी इलाकों की जरूरत होती है। बीज उत्पादन का काम करना हो तो कृषि विश्वविद्यालय से प्रशिक्षण लेना फायदेमंद है।

मूल्य संवर्धन

गाजर से अचार, कांजी, जूस और सूखे टुकड़े बनाकर भी बेचे जाते हैं। सर्दियों में गाजर की आवक ज्यादा होने पर दाम गिर जाते हैं, ऐसे में प्रोसेसिंग से अतिरिक्त आमदनी मिल सकती है।

गाजर की बुवाई कब करें

देसी किस्में अगस्त से अक्टूबर और यूरोपियन किस्में अक्टूबर से नवंबर।

गाजर का बीज दर कितना है

लगभग 5 से 6 किलो प्रति हेक्टेयर।

गाजर की जड़ें क्यों फटती हैं

सिंचाई में अनियमितता, ताजा गोबर खाद या ज्यादा देर तक खेत में छोड़ने से।

पूसा की प्रमुख किस्में कौन सी हैं

पूसा रुधिरा, पूसा केसर और पूसा असिता।

स्रोत: ICAR-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, ICAR, Agmarknet मंडी भाव

लेखक

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी डेमोक्रेटिक भारत लाइव के संस्थापक, मालिक और संपादक हैं। डिजिटल मीडिया में 6 साल से अधिक के अनुभव के साथ वे मुख्य रूप से राजनीति और चुनाव की खबरें कवर करते हैं, साथ ही देश, कारोबार और खेल से जुड़ी अहम खबरों का संपादन करते हैं। वेबसाइट की संपादकीय नीति, तथ्य-जांच और प्रकाशित सामग्री की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की है।

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