हिंदू धर्म में भगवान शिव के कई रूपों की पूजा होती है, जिनमें काल भैरव का स्वरूप सबसे उग्र और रक्षक माना जाता है। मान्यता है कि मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को भगवान शिव के काल भैरव स्वरूप का प्राकट्य हुआ था। इसी दिन को काल भैरव जयंती, भैरव अष्टमी या कालभैरव अष्टमी के रूप में मनाया जाता है। पंचांग गणनाओं के अनुसार नई दिल्ली के लिए 2026 में काल भैरव जयंती मंगलवार, 1 दिसंबर को है।
काल भैरव जयंती 2026: तिथि और समय
नई दिल्ली के लिए पंचांग गणनाओं के अनुसार:
- काल भैरव जयंती: मंगलवार, 1 दिसंबर 2026
- अष्टमी तिथि आरंभ: 1 दिसंबर 2026, रात लगभग 12:12 बजे
- अष्टमी तिथि समाप्त: 1 दिसंबर 2026, रात लगभग 11:14 बजे
द्रिक पंचांग के अनुसार काल भैरव जयंती के व्रत के लिए रात्रि व्यापिनी अष्टमी, यानी रात के समय मौजूद अष्टमी तिथि, को महत्व दिया जाता है। तिथि की गणना स्थान के अनुसार बदलती है, इसलिए दूसरे शहरों और विदेशों में तारीख एक दिन आगे-पीछे हो सकती है। अपने शहर का सटीक समय स्थानीय पंचांग से जरूर देखें।

पूर्णिमांत और अमांत का फर्क
उत्तर भारत में प्रचलित पूर्णिमांत पंचांग में महीना पूर्णिमा को खत्म होता है, जबकि दक्षिण और पश्चिम भारत में प्रचलित अमांत पंचांग में महीना अमावस्या को खत्म होता है। इसी कारण यह तिथि पूर्णिमांत में मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी और अमांत में कार्तिक कृष्ण अष्टमी कहलाती है। तारीख वही रहती है, सिर्फ महीने का नाम अलग होता है।
कौन हैं काल भैरव
धार्मिक मान्यताओं में काल भैरव को भगवान शिव का उग्र स्वरूप माना जाता है, जो समय यानी काल के भी स्वामी हैं। उन्हें दंड देने वाले और भक्तों की रक्षा करने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है। काल भैरव को काशी का कोतवाल कहा जाता है। मान्यता है कि वाराणसी में काल भैरव की अनुमति के बिना कोई नहीं रह सकता, इसलिए काशी विश्वनाथ के दर्शन से पहले या बाद में काल भैरव मंदिर में दर्शन की परंपरा है।
पौराणिक कथाओं में काल भैरव के प्राकट्य से जुड़ी कथा ब्रह्मा और शिव के प्रसंग से जुड़ी बताई जाती है। काल भैरव का वाहन कुत्ता माना जाता है, इसलिए इस दिन कुत्तों को भोजन कराने की परंपरा भी कई जगह निभाई जाती है।
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कालाष्टमी और काल भैरव जयंती में अंतर
हर महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कालाष्टमी कहा जाता है और इस दिन भी काल भैरव की पूजा होती है। लेकिन मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी की कालाष्टमी को सबसे खास माना जाता है, क्योंकि इसे काल भैरव का प्राकट्य दिवस माना जाता है। इसलिए साल की बारह कालाष्टमियों में से यही काल भैरव जयंती कहलाती है।
पूजा की परंपरा
परंपराओं के अनुसार इस दिन भक्त इस तरह पूजा करते हैं:
- सुबह स्नान कर व्रत का संकल्प लिया जाता है।
- भगवान शिव और काल भैरव की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाया जाता है, कई जगह सरसों के तेल का दीपक जलाने की परंपरा है।
- काल भैरव को फूल, धूप और नैवेद्य अर्पित किया जाता है।
- काल भैरव अष्टक का पाठ किया जाता है, जिसे आदि शंकराचार्य की रचना माना जाता है।
- रात में जागरण और भजन-कीर्तन की परंपरा भी कई जगह है।
- कुत्तों को भोजन कराना और जरूरतमंदों को दान देना पुण्य माना जाता है।
प्रमुख काल भैरव मंदिर
वाराणसी का काल भैरव मंदिर इस पर्व का सबसे बड़ा केंद्र है, जहां इस दिन भारी भीड़ उमड़ती है। मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित काल भैरव मंदिर भी बहुत प्रसिद्ध है। इसके अलावा देश के कई हिस्सों में भैरव के मंदिर हैं, जहां इस दिन विशेष श्रृंगार, आरती और भंडारे होते हैं।
काल भैरव अष्टक का महत्व
काल भैरव अष्टक आठ श्लोकों का स्तोत्र है, जिसमें काल भैरव के स्वरूप, उनके आभूषणों और उनकी कृपा का वर्णन है। परंपरा में इसे आदि शंकराचार्य की रचना माना जाता है। हर श्लोक के अंत में काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे की पंक्ति आती है, जिसका अर्थ है कि मैं काशी नगरी के स्वामी काल भैरव का भजन करता हूं। भक्त मानते हैं कि श्रद्धा से इसका पाठ करने से भय दूर होता है और मन को बल मिलता है। जो लोग पूरा अष्टक नहीं पढ़ पाते, वे भगवान शिव और काल भैरव के नाम का जप भी करते हैं।
घर पर कैसे मनाएं
जो लोग मंदिर नहीं जा पाते, वे घर पर ही सरल तरीके से यह पर्व मना सकते हैं। पूजा स्थान पर भगवान शिव का चित्र रखें, दीपक जलाएं, फूल और प्रसाद अर्पित करें और काल भैरव अष्टक या शिव स्तुति का पाठ करें। परिवार के साथ बैठकर बच्चों को काशी के कोतवाल की कथा सुनाएं। गली के कुत्तों और पक्षियों के लिए भोजन-पानी की व्यवस्था करना भी इस दिन की परंपरा से जुड़ा माना जाता है।
श्रद्धालुओं के लिए सुझाव
भीड़ वाले मंदिरों में जाने से पहले दर्शन के समय की जानकारी लें, बुजुर्गों और बच्चों का ध्यान रखें और भीड़ प्रबंधन के निर्देशों का पालन करें। व्रत रखने वाले लोग अपनी सेहत के अनुसार ही उपवास का स्वरूप तय करें।
काल भैरव जयंती 2026 कब है
पंचांग गणनाओं के अनुसार नई दिल्ली के लिए मंगलवार, 1 दिसंबर 2026 को।
काल भैरव को काशी का कोतवाल क्यों कहते हैं
मान्यता है कि काल भैरव काशी की रक्षा करते हैं और उनकी अनुमति के बिना कोई काशी में नहीं रह सकता, इसलिए उन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है।
यह लेख धार्मिक मान्यताओं और लोक परंपराओं पर आधारित है। डेमोक्रेटिक भारत लाइव इनकी पुष्टि नहीं करता।
स्रोत: Drik Panchang: Kalabhairav Jayanti, Muhurat Choghadiya: Kalbhairav Jayanti Delhi 2026





