मटर रबी मौसम की एक अहम दलहन फसल है, जिसकी खेती दाने यानी सूखी मटर और हरी फलियों दोनों के लिए की जाती है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, बिहार, झारखंड और असम जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर मटर उगाई जाती है। हरी मटर की बाजार में अच्छी मांग रहती है, इसलिए कई किसानों के लिए यह नकदी फसल भी है। दलहन होने के कारण मटर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में भी मदद करती है। आइए जानते हैं मटर की बुवाई से जुड़ी जरूरी बातें।
बुवाई का सही समय
कृषि विश्वविद्यालयों के पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज के अनुसार मटर की बुवाई का सामान्य समय मध्य अक्टूबर से मध्य नवंबर तक माना जाता है। जिन खेतों में उकठा यानी विल्ट रोग की समस्या रहती है, वहां बहुत जल्दी बुवाई से बचने की सलाह दी जाती है, क्योंकि ज्यादा तापमान में यह रोग ज्यादा फैलता है। बहुत देर से बुवाई करने पर फसल को चूर्णिल आसिता रोग और फली बनने के समय बढ़ती गर्मी का सामना करना पड़ सकता है। अलग-अलग इलाकों के लिए उपयुक्त समय में थोड़ा अंतर हो सकता है, इसलिए अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र की सलाह जरूर लें।

बीज दर और दूरी
मटर की बीज दर किस्म और दाने के आकार पर निर्भर करती है:
- बौनी किस्में: लगभग 80 से 100 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर
- लंबी किस्में: लगभग 70 से 80 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर
कतार से कतार की दूरी लगभग 30 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी लगभग 10 सेंटीमीटर रखी जाती है। बीज को लगभग 4 से 5 सेंटीमीटर गहराई पर बोया जाता है। लंबी किस्मों में बेल को सहारा देने की जरूरत पड़ सकती है, इसलिए खेत की योजना पहले से बना लें।
बीज उपचार
मटर के बीज को बुवाई से पहले राइजोबियम कल्चर से उपचारित करने की सलाह दी जाती है। इससे जड़ों में गांठें अच्छी बनती हैं, जो वातावरण की नाइट्रोजन को पौधे तक पहुंचाती हैं। जिन खेतों में बीज और मिट्टी से फैलने वाले रोगों की समस्या हो, वहां जरूरत के अनुसार अनुशंसित फफूंदनाशक से भी बीज उपचार किया जाता है। ध्यान रखें कि पहले फफूंदनाशक और उसके बाद जीवाणु कल्चर लगाया जाता है। दवा की मात्रा के लिए पैकेट के निर्देश और कृषि विशेषज्ञ की सलाह मानें।
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खेत की तैयारी और खाद
मटर के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है। खेत में पानी रुकने से जड़ें सड़ सकती हैं। बुवाई से पहले खेत को अच्छी तरह तैयार करें और खरपतवार हटा दें। दलहन होने के कारण मटर को नाइट्रोजन की कम मात्रा की जरूरत होती है, लेकिन फास्फोरस जड़ों के विकास और गांठें बनने के लिए जरूरी है। खाद की सही मात्रा मिट्टी की जांच के आधार पर तय करना सबसे अच्छा है।
सिंचाई
मटर को बहुत ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती। बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। आमतौर पर फूल आने से पहले और फलियां बनते समय हल्की सिंचाई फायदेमंद मानी जाती है। भारी सिंचाई और जलभराव से बचें, क्योंकि इससे पौधे पीले पड़ सकते हैं और जड़ सड़न का खतरा बढ़ता है।
निराई-गुड़ाई
शुरुआती 30 से 45 दिनों में खरपतवार मटर की बढ़वार पर सबसे ज्यादा असर डालते हैं। इस दौरान एक या दो बार निराई-गुड़ाई करने से फसल को अच्छी शुरुआत मिलती है। रासायनिक खरपतवारनाशी का इस्तेमाल करना हो तो कृषि विशेषज्ञ की सलाह से ही करें।
चूर्णिल आसिता रोग से बचाव
मटर की फसल में चूर्णिल आसिता यानी पाउडरी मिल्ड्यू एक बड़ा रोग है। इसमें पत्तियों, तनों और फलियों पर सफेद पाउडर जैसी परत दिखाई देती है, जिससे पौधे कमजोर हो जाते हैं और उपज घटती है। असम कृषि विश्वविद्यालय की सलाह के अनुसार इससे बचाव के लिए:
- रोग प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव करें।
- पिछली फसल के संक्रमित अवशेष खेत से हटा दें।
- पहले लक्षण दिखते ही विशेषज्ञ की सलाह से अनुशंसित दवा का छिड़काव करें और जरूरत होने पर तय अंतराल पर दोहराएं।
हरी फलियों की तुड़ाई
हरी मटर के लिए उगाई गई फसल में फलियां जब दानों से भर जाएं, लेकिन हरी और मुलायम हों, तब तुड़ाई करनी चाहिए। तुड़ाई कई बार में की जाती है। सुबह के समय तोड़ी गई फलियां ज्यादा देर ताजा रहती हैं। सूखे दाने के लिए फसल तब काटी जाती है जब ज्यादातर फलियां सूखकर पीली-भूरी हो जाएं।
मटर की बुवाई कब करें
सामान्य तौर पर मध्य अक्टूबर से मध्य नवंबर तक। उकठा वाले खेतों में बहुत जल्दी बुवाई से बचें।
एक हेक्टेयर में कितना मटर बीज लगता है
बौनी किस्मों में लगभग 80-100 किलोग्राम और लंबी किस्मों में लगभग 70-80 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर।
स्रोत: Assam Agricultural University (RKB): Field Pea, ICAR: Rabi Agro-Advisory





