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लोकसभा और राज्यसभा में अंतर: सदस्य संख्या, चुनाव, कार्यकाल, धन विधेयक और विशेष शक्तियां, एक जगह पूरी तुलना

संसद के दोनों सदनों की बनावट और ताकत अलग-अलग है। जानिए लोकसभा और राज्यसभा में मुख्य अंतर।

संसद भवन के दो सदनों का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

सारांश

  • भारत की संसद में राष्ट्रपति, लोकसभा और राज्यसभा शामिल हैं। लोकसभा को निचला सदन या जनता का सदन और राज्यसभा को उच्च सदन या राज्यों की परिषद कहा जाता है।
  • धन विधेयक सिर्फ लोकसभा में पेश हो सकता है। राज्यसभा इसे न खारिज कर सकती है, न संशोधित कर सकती है।
  • सामान्य विधेयक, संविधान संशोधन विधेयक, राष्ट्रपति के चुनाव और महाभियोग, उपराष्ट्रपति के चुनाव और आपातकाल की मंजूरी जैसे कई मामलों में दोनों सदनों की भूमिका बराबर या जरूरी है।
  • दोनों सदनों के सत्र राष्ट्रपति बुलाते हैं और दो सत्रों के बीच छह महीने से ज्यादा का अंतर नहीं हो सकता।

भारत की संसद में राष्ट्रपति, लोकसभा और राज्यसभा शामिल हैं। लोकसभा को निचला सदन या जनता का सदन और राज्यसभा को उच्च सदन या राज्यों की परिषद कहा जाता है। दोनों सदन मिलकर कानून बनाते हैं, लेकिन उनकी बनावट, चुनाव के तरीके और शक्तियों में कई अहम अंतर हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में भी यह विषय अक्सर पूछा जाता है। आइए एक-एक करके दोनों सदनों की तुलना करते हैं।

सदस्य संख्या

  • लोकसभा: संविधान के अनुच्छेद 81 के अनुसार राज्यों से अधिकतम 530 और केंद्र शासित प्रदेशों से अधिकतम 20 सदस्य हो सकते हैं, यानी अधिकतम 550। अभी लोकसभा में 543 निर्वाचित सीटें हैं। पहले राष्ट्रपति एंग्लो-इंडियन समुदाय से दो सदस्य मनोनीत कर सकते थे, लेकिन 2020 से यह प्रावधान खत्म हो गया।
  • राज्यसभा: अनुच्छेद 80 के अनुसार अधिकतम 250 सदस्य, जिनमें 238 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधि और 12 राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत सदस्य हो सकते हैं। अभी राज्यसभा में 245 सीटें हैं, यानी 233 निर्वाचित और 12 मनोनीत।
मुख्य बातें: संसद भवन के दो सदनों का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

चुनाव का तरीका

  • लोकसभा: सदस्य सीधे जनता के वोट से चुने जाते हैं। हर निर्वाचन क्षेत्र में सबसे ज्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार जीतता है।
  • राज्यसभा: सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं। राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य आनुपातिक प्रतिनिधित्व की एकल संक्रमणीय मत पद्धति से उन्हें चुनते हैं। हर राज्य की सीटें उसकी आबादी के आधार पर तय हैं, इसलिए उत्तर प्रदेश की सीटें सबसे ज्यादा हैं।
  • मनोनीत सदस्य: राज्यसभा के 12 सदस्य साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या अनुभव रखने वाले लोग होते हैं।

कार्यकाल

  • लोकसभा: पहली बैठक से 5 साल तक, लेकिन इससे पहले भी भंग हो सकती है। राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान संसद इसे एक बार में एक साल तक बढ़ा सकती है।
  • राज्यसभा: यह स्थायी सदन है और कभी भंग नहीं होता। हर सदस्य का कार्यकाल 6 साल का होता है और हर दो साल में लगभग एक तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं।

यह भी पढ़ें: लोकसभा चुनाव कैसे होता है: 543 सीटें, 272 का बहुमत, नामांकन से मतगणना और सरकार गठन तक पूरी प्रक्रिया | राज्यसभा चुनाव कैसे होता है: विधायकों की वोटिंग, कोटा फॉर्मूला और खुला मतदान, पूरी प्रक्रिया समझें

न्यूनतम उम्र

  • लोकसभा सदस्य बनने के लिए न्यूनतम उम्र 25 साल है।
  • राज्यसभा सदस्य बनने के लिए न्यूनतम उम्र 30 साल है।

पीठासीन अधिकारी

  • लोकसभा: अध्यक्ष यानी स्पीकर, जिसे लोकसभा के सदस्य अपने बीच से चुनते हैं।
  • राज्यसभा: भारत के उपराष्ट्रपति राज्यसभा के पदेन सभापति होते हैं। उपसभापति को राज्यसभा अपने सदस्यों में से चुनती है।

धन विधेयक

धन विधेयक सिर्फ लोकसभा में पेश हो सकता है। राज्यसभा इसे न खारिज कर सकती है, न संशोधित कर सकती है। वह 14 दिन के भीतर सिर्फ सिफारिशें दे सकती है, जिन्हें मानना या न मानना लोकसभा पर निर्भर है। कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, इस पर लोकसभा अध्यक्ष का फैसला अंतिम माना जाता है।

सरकार की जवाबदेही

मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है। अविश्वास प्रस्ताव सिर्फ लोकसभा में लाया जा सकता है और अगर लोकसभा में सरकार बहुमत खो दे, तो उसे इस्तीफा देना होता है। राज्यसभा सवाल पूछ सकती है और बहस कर सकती है, लेकिन सरकार गिरा नहीं सकती।

राज्यसभा की विशेष शक्तियां

  • अनुच्छेद 249: राज्यसभा दो तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित करके संसद को राज्य सूची के किसी विषय पर राष्ट्रीय हित में कानून बनाने का अधिकार दे सकती है।
  • अनुच्छेद 312: राज्यसभा दो तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित करके नई अखिल भारतीय सेवा बनाने का रास्ता खोल सकती है।
  • लोकसभा भंग होने की स्थिति में आपातकाल की घोषणा को मंजूरी देने में राज्यसभा की भूमिका अहम हो जाती है।

जहां दोनों बराबर हैं

सामान्य विधेयक, संविधान संशोधन विधेयक, राष्ट्रपति के चुनाव और महाभियोग, उपराष्ट्रपति के चुनाव और आपातकाल की मंजूरी जैसे कई मामलों में दोनों सदनों की भूमिका बराबर या जरूरी है। संविधान संशोधन विधेयक पर दोनों सदनों का अलग-अलग विशेष बहुमत से पारित करना जरूरी है।

राज्यों का प्रतिनिधित्व

राज्यसभा को राज्यों की परिषद इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसके सदस्य राज्यों की विधानसभाओं से चुने जाते हैं और संघीय ढांचे में राज्यों की आवाज संसद तक पहुंचाते हैं। अमेरिका की सीनेट में हर राज्य को बराबर सीटें मिलती हैं, लेकिन भारत में राज्यसभा की सीटें आबादी के हिसाब से बंटी हैं। इसलिए उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे बड़े राज्यों की सीटें ज्यादा हैं, जबकि छोटे राज्यों के पास एक-एक सीट है।

सत्र और कोरम

दोनों सदनों के सत्र राष्ट्रपति बुलाते हैं और दो सत्रों के बीच छह महीने से ज्यादा का अंतर नहीं हो सकता। आम तौर पर साल में तीन सत्र होते हैं: बजट सत्र, मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र। किसी भी सदन की बैठक के लिए कोरम कुल सदस्य संख्या का दसवां हिस्सा होता है। लोकसभा के सत्रों का सीधा प्रसारण संसद टीवी पर होता है, जिससे आम लोग दोनों सदनों की कार्यवाही देख सकते हैं।

गतिरोध की स्थिति

सामान्य विधेयक पर दोनों सदनों में असहमति हो, तो राष्ट्रपति अनुच्छेद 108 के तहत संयुक्त बैठक बुला सकते हैं, जिसकी अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करते हैं।

लोकसभा और राज्यसभा में कौन सा सदन स्थायी है

राज्यसभा स्थायी सदन है और भंग नहीं होता।

राज्यसभा का सभापति कौन होता है

भारत के उपराष्ट्रपति।

स्रोत: Constitution of India (Legislative Department), Rajya Sabha: Council of States, Lok Sabha: House of the People

लेखक

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी डेमोक्रेटिक भारत लाइव के संस्थापक, मालिक और संपादक हैं। डिजिटल मीडिया में 6 साल से अधिक के अनुभव के साथ वे मुख्य रूप से राजनीति और चुनाव की खबरें कवर करते हैं, साथ ही देश, कारोबार और खेल से जुड़ी अहम खबरों का संपादन करते हैं। वेबसाइट की संपादकीय नीति, तथ्य-जांच और प्रकाशित सामग्री की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की है।

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