संक्षेप में: राज्यसभा चुनाव में आम मतदाता सीधे वोट नहीं डालते। राज्यों की विधानसभाओं के चुने हुए विधायक आनुपातिक प्रतिनिधित्व और एकल संक्रमणीय मत (STV) प्रणाली से राज्यसभा सदस्य चुनते हैं। इस लेख में जानिए कि सीटें कैसे तय होती हैं, जीत के लिए कितने वोट चाहिए और खुली मतदान व्यवस्था क्या है।
राज्यसभा क्या है और इसमें कितनी सीटें हैं
राज्यसभा संसद का उच्च सदन है, जिसे राज्यों की परिषद (Council of States) भी कहा जाता है। संविधान के अनुच्छेद 80 के अनुसार इसकी अधिकतम सदस्य संख्या 250 हो सकती है। इनमें 238 सदस्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधि होते हैं और 12 सदस्य राष्ट्रपति मनोनीत करते हैं। अक्टूबर 2026 तक राज्यसभा की वास्तविक सदस्य संख्या 245 है: 233 निर्वाचित और 12 मनोनीत। किस राज्य को कितनी सीटें मिलेंगी, यह संविधान की चौथी अनुसूची में लिखा है, जो मोटे तौर पर आबादी पर आधारित है। उत्तर प्रदेश के पास सबसे ज्यादा 31 सीटें हैं।
राज्यसभा कभी भंग नहीं होती। हर सदस्य का कार्यकाल 6 साल का होता है और हर दो साल में लगभग एक तिहाई सदस्य रिटायर होते हैं। इसी वजह से राज्यसभा चुनाव अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग समय पर होते रहते हैं।
राज्यसभा चुनाव में वोट कौन डालता है
राज्यसभा चुनाव अप्रत्यक्ष होता है। किसी राज्य की सीटों के लिए उस राज्य की विधानसभा के निर्वाचित विधायक ही मतदाता होते हैं। मनोनीत विधायक और विधान परिषद के सदस्य इसमें वोट नहीं डालते। दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर के लिए वहां की विधानसभा के निर्वाचित सदस्य वोट करते हैं। उम्मीदवार की न्यूनतम उम्र 30 साल होनी चाहिए (अनुच्छेद 84)।
जीत के लिए कितने वोट चाहिए: कोटा फॉर्मूला
राज्यसभा चुनाव में हर विधायक उम्मीदवारों को अपनी पसंद के क्रम में 1, 2, 3 लिखकर वरीयता देता है। गिनती आसान बनाने के लिए हर वोट का मूल्य 100 माना जाता है। जीतने के लिए जरूरी वोट (कोटा) इस फॉर्मूले से निकलता है:
कोटा = [(कुल वैध वोट × 100) ÷ (खाली सीटें + 1)] + 1
उदाहरण के लिए, अगर किसी राज्य में 400 विधायक वोट डालें और 10 सीटें खाली हों, तो कोटा = (400 × 100 ÷ 11) + 1 = 3,637 होगा। यानी एक उम्मीदवार को जीत के लिए लगभग 37 विधायकों की पहली वरीयता चाहिए। जिस उम्मीदवार को कोटे से ज्यादा वोट मिलते हैं, उसके अतिरिक्त वोट दूसरी वरीयता के हिसाब से बाकी उम्मीदवारों में बांटे जाते हैं। सबसे कम वोट वाले उम्मीदवार को बाहर कर उसके वोट भी आगे ट्रांसफर होते हैं। यह प्रक्रिया तब तक चलती है जब तक सभी सीटें भर न जाएं।
खुला मतदान और क्रॉस वोटिंग
राज्यसभा चुनाव में मतदान खुले मतपत्र (open ballot) से होता है। किसी राजनीतिक दल का विधायक अपना भरा हुआ मतपत्र डालने से पहले पार्टी के अधिकृत एजेंट को दिखाता है। यह व्यवस्था 2003 में जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन के बाद आई, ताकि खरीद-फरोख्त रोकी जा सके। निर्दलीय विधायकों को मतपत्र किसी को नहीं दिखाना होता। इस चुनाव में NOTA का विकल्प नहीं होता; सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में यह स्पष्ट किया था।
पार्टी लाइन के खिलाफ वोट देने को क्रॉस वोटिंग कहा जाता है। ऐसा करने पर विधायक की सदस्यता अपने आप खत्म नहीं होती, लेकिन पार्टी उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकती है। अगर उम्मीदवारों की संख्या खाली सीटों के बराबर हो, तो मतदान नहीं होता और सभी निर्विरोध चुन लिए जाते हैं। हाल के उदाहरण के लिए पढ़ें: यूपी राज्यसभा की 10वीं सीट का गणित और सपा के तीसरे उम्मीदवार पर हमारी रिपोर्ट।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या आम जनता राज्यसभा चुनाव में वोट डालती है?
नहीं। राज्य की विधानसभा के निर्वाचित विधायक ही राज्यसभा सदस्य चुनते हैं।
राज्यसभा सदस्य का कार्यकाल कितना होता है?
6 साल। हर दो साल में लगभग एक तिहाई सदस्य रिटायर होते हैं, इसलिए सदन भंग नहीं होता।
मनोनीत सदस्य कौन होते हैं?
राष्ट्रपति साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों के 12 लोगों को मनोनीत करते हैं।
क्या राज्यसभा चुनाव में NOTA होता है?
नहीं। अप्रत्यक्ष चुनाव होने के कारण इसमें NOTA का विकल्प नहीं है।
स्रोत: राज्यसभा की आधिकारिक वेबसाइट, भारत का संविधान (अनुच्छेद 80, 83, 84 और चौथी अनुसूची), जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (India Code)। जानकारी अक्टूबर 2026 तक की।





