रूस की प्रसिद्ध हथियार निर्माता कंपनी कलाश्निकोव कंसर्न ने भारत में अपनी एमपी 155 शॉटगन के स्थानीय उत्पादन के लिए एक महत्वपूर्ण लाइसेंसिंग समझौता किया है। यह सेमी ऑटोमैटिक शॉटगन मूल रूप से शिकार के उद्देश्यों के लिए विकसित की गई थी, लेकिन आधुनिक युद्धक्षेत्रों में यह कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोनों के खिलाफ एक अत्यंत प्रभावी हथियार के रूप में उभरी है। इस समझौते की पुष्टि कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एलन लुशनिकोव ने की है, जो भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग को एक नए स्तर पर ले जाने का संकेत देता है।

भारत और रूस के बीच नया रक्षा समझौता
रूस की दिग्गज हथियार निर्माता कंपनी कलाश्निकोव कंसर्न, जो दुनिया भर में अपनी एके 47 राइफलों के लिए जानी जाती है, अब भारत में अपनी तकनीक का विस्तार कर रही है। कंपनी ने एक भारतीय साझेदार के साथ एमपी 155 शॉटगन के स्थानीय निर्माण के लिए एक लाइसेंसिंग समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। कलाश्निकोव के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एलन लुशनिकोव ने इस विकास की आधिकारिक तौर पर पुष्टि की है। यह कदम भारत की अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने और विदेशी सैन्य तकनीक के स्थानीयकरण की दिशा में एक बड़ी प्रगति माना जा रहा है। हालांकि अभी तक उस भारतीय कंपनी के नाम का खुलासा नहीं किया गया है जिसके साथ यह समझौता हुआ है, लेकिन यह स्पष्ट है कि उत्पादन रूसी तकनीकी सहायता और मार्गदर्शन के तहत किया जाएगा। इस साझेदारी का उद्देश्य धीरे धीरे शॉटगन के निर्माण में उपयोग होने वाली स्थानीय सामग्री के अनुपात को बढ़ाना है, जिससे भारत की विनिर्माण क्षमताओं को बढ़ावा मिले।
एमपी 155 शॉटगन की तकनीकी विशेषताएं
एमपी 155 एक गैस संचालित सेमी ऑटोमैटिक शॉटगन है जिसे इज़ेव्स्क मैकेनिकल प्लांट में तैयार किया गया था। इस हथियार का बड़े पैमाने पर उत्पादन वर्ष 2012 में शुरू हुआ था और तब से इसने अपनी विश्वसनीयता साबित की है। यह शॉटगन 12 गेज की है और यह 12/76 और 12/89 कैलिबर के कारतूसों को फायर करने में सक्षम है। इसकी बनावट में एल्युमिनियम मिश्र धातु का व्यापक उपयोग किया गया है, जिसके कारण यह वजन में काफी हल्की और संतुलित रहती है। एक मानक एमपी 155 शॉटगन का वजन लगभग 3.15 किलोग्राम से लेकर 3.8 किलोग्राम के बीच होता है, जो इसे लंबे समय तक ले जाने और उपयोग करने के लिए सुविधाजनक बनाता है। इसकी डिजाइन इसे विभिन्न प्रकार के कारतूसों के साथ काम करने की अनुमति देती है, जो इसे शिकार और सुरक्षा दोनों कार्यों के लिए एक बहुमुखी विकल्प बनाती है। भारत में इसका उत्पादन शुरू होने से सुरक्षा बलों को एक ऐसा हथियार मिलेगा जो आधुनिक जरूरतों के हिसाब से ढाला जा सकता है।
ड्रोन विरोधी क्षमताओं का विस्तार
आधुनिक युद्ध के बदलते स्वरूप में एफपीवी और कामिकेज़ ड्रोन एक बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं। पारंपरिक असॉल्ट राइफलें इन छोटे और तेजी से चलने वाले लक्ष्यों को निशाना बनाने में अक्सर कम प्रभावी साबित होती हैं। इसके विपरीत, एमपी 155 जैसी शॉटगन के छर्रे एक बड़े क्षेत्र को कवर करते हैं, जिससे उड़ते हुए ड्रोन को मार गिराने की संभावना काफी बढ़ जाती है। कलाश्निकोव ने इस शॉटगन का एक विशेष एंटी ड्रोन संस्करण भी विकसित किया है। इस संस्करण में पिकाटिनी रेल, रेड डॉट साइट और नाइट विजन डिवाइस जैसी आधुनिक सुविधाएं जोड़ी गई हैं। इसके अलावा, इसमें एक विस्तारित मैगजीन भी होती है ताकि अधिक राउंड फायर किए जा सकें। विशेष रूप से डिजाइन किए गए कारतूसों के साथ, यह शॉटगन 50 से 100 मीटर की दूरी तक छोटे ड्रोनों को प्रभावी ढंग से नष्ट कर सकती है। यूक्रेन संघर्ष के दौरान सैनिकों ने यह अनुभव किया है कि शॉटगन ड्रोन के रोटर या शरीर को नुकसान पहुंचाकर उन्हें गिराने का एक व्यावहारिक और सस्ता समाधान है।
भारत में कलाश्निकोव की मौजूदा उपस्थिति
भारत और कलाश्निकोव के बीच यह पहला सहयोग नहीं है। यह कंपनी पहले से ही भारत में इंडो रशियन राइफल्स प्राइवेट लिमिटेड के माध्यम से सक्रिय है। उत्तर प्रदेश के अमेठी में स्थित एक संयंत्र में एके 203 असॉल्ट राइफलों का उत्पादन पहले से ही चल रहा है। अमेठी का यह प्रोजेक्ट पूर्ण प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के मॉडल पर आधारित है, जहां रूसी विशेषज्ञ भारतीय कर्मियों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। एमपी 155 शॉटगन के लिए नया लाइसेंसिंग समझौता इसी सफल साझेदारी का एक और विस्तार है। हालांकि एमपी 155 के उत्पादन स्थल, मात्रा और समय सीमा के बारे में विवरण अभी सार्वजनिक नहीं किए गए हैं, लेकिन यह माना जा रहा है कि यह परियोजना भी अमेठी मॉडल की तरह ही तकनीक हस्तांतरण पर केंद्रित होगी। इससे न केवल भारत को आधुनिक हथियार मिलेंगे, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार और कौशल विकास के अवसर भी पैदा होंगे।
सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की ओर कदम
भारत वर्तमान में अपनी सीमाओं और आंतरिक सुरक्षा के लिए ड्रोन के बढ़ते खतरे का सामना कर रहा है। ऐसे में एमपी 155 जैसे प्रभावी और कम लागत वाले एंटी ड्रोन समाधानों की आवश्यकता बढ़ गई है। भारत सरकार की आत्मनिर्भरता की नीति के तहत, विदेशी हथियारों के स्थानीय उत्पादन को प्राथमिकता दी जा रही है। यह शॉटगन न केवल सैन्य बलों के लिए बल्कि अर्धसैनिक बलों और अन्य सुरक्षा एजेंसियों के लिए भी अत्यंत उपयोगी साबित हो सकती है। कलाश्निकोव द्वारा एमपी 155 को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी बढ़ावा दिया जा रहा है, और भारत में इसका उत्पादन इसे क्षेत्रीय सुरक्षा जरूरतों के लिए एक प्रमुख केंद्र बना सकता है। छर्रे वाले कारतूसों का उपयोग करके ड्रोन को निष्क्रिय करने की तकनीक सरल और प्रभावी है, जो इसे जटिल इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग प्रणालियों का एक अच्छा पूरक बनाती है। आने वाले समय में, यह समझौता भारत की रक्षा तैयारियों को और अधिक लचीला और आधुनिक बनाने में मदद करेगा।
स्रोत: Aaj Tak

