क्रिकेट में अंपायर का फैसला कभी अंतिम और अटल माना जाता था। लेकिन तेज होते खेल और टीवी रिप्ले के दौर में साफ दिखने लगा कि कई बार मैदानी अंपायर से भी चूक हो जाती है। ऐसी गलतियों को सुधारने के लिए डिसीजन रिव्यू सिस्टम यानी DRS लाया गया। आज अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट और बड़ी लीगों में DRS खेल का अहम हिस्सा है। इस लेख में आसान भाषा में समझते हैं कि DRS कैसे काम करता है।
DRS क्या है
DRS वह व्यवस्था है जिसमें कोई टीम मैदानी अंपायर के फैसले को चुनौती देकर थर्ड अंपायर से उसकी समीक्षा करवा सकती है। थर्ड अंपायर टीवी रिप्ले और तकनीक की मदद से देखता है और मैदानी अंपायर को सलाह देता है। इसके बाद मैदानी अंपायर अपना फैसला बरकरार रखता है या बदलता है।

DRS का इतिहास
ESPNcricinfo के अनुसार अंपायरिंग फैसलों की समीक्षा की व्यवस्था का पहला ट्रायल 2008 में टेस्ट क्रिकेट में हुआ। शुरुआत में हर पारी में तीन असफल रिव्यू की अनुमति थी। ICC के अनुसार बाद में इसे घटाकर दो असफल रिव्यू प्रति पारी किया गया। समय के साथ नियमों में कई बदलाव हुए और यह व्यवस्था टेस्ट के साथ वनडे और टी20 अंतरराष्ट्रीय मैचों में भी लागू हुई।
रिव्यू कैसे लिया जाता है
- बल्लेबाजी करने वाली टीम में आउट दिया गया बल्लेबाज रिव्यू मांग सकता है।
- गेंदबाजी करने वाली टीम में कप्तान रिव्यू मांगता है।
- रिव्यू मांगने के लिए खिलाड़ी हाथों से T का निशान बनाता है।
- फैसले के बाद रिव्यू मांगने का समय सीमित होता है, आमतौर पर 15 सेकंड।
- हर टीम को हर पारी में सीमित संख्या में असफल रिव्यू मिलते हैं। सफल रिव्यू पर टीम का रिव्यू नहीं घटता।
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किन फैसलों पर लगता है DRS
DRS का इस्तेमाल मुख्य रूप से आउट या नॉट आउट से जुड़े फैसलों पर होता है, जैसे LBW, कैच, बल्ले का किनारा लगा या नहीं, और गेंद पैड या दस्ताने से लगी या नहीं। रन आउट और स्टंपिंग जैसे फैसले आमतौर पर मैदानी अंपायर खुद थर्ड अंपायर को भेज देते हैं, उनके लिए टीम को रिव्यू लेने की जरूरत नहीं होती।
DRS में इस्तेमाल होने वाली तकनीक
बॉल ट्रैकिंग
यह तकनीक कई कैमरों की मदद से गेंद का रास्ता दिखाती है और अनुमान लगाती है कि अगर पैड बीच में न आता तो गेंद विकेट से टकराती या नहीं। LBW के फैसलों में इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है।
अल्ट्राएज या स्निको
यह आवाज की तरंगों को दिखाती है। अगर गेंद बल्ले के पास से गुजरते समय आवाज की लहर दिखती है, तो माना जाता है कि गेंद बल्ले से लगी।
हॉट स्पॉट
कुछ सीरीज में इन्फ्रारेड कैमरों वाली यह तकनीक इस्तेमाल हुई है, जो दिखाती है कि गेंद बल्ले या पैड पर कहां लगी।
अंपायर्स कॉल क्या है
अंपायर्स कॉल DRS का सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाला हिस्सा है। LBW के मामले में अगर बॉल ट्रैकिंग दिखाती है कि गेंद विकेट को बहुत कम हिस्से से छू रही है, या पिच होने या टकराने की जगह को लेकर मामूली अंतर है, तो मैदानी अंपायर का मूल फैसला ही बना रहता है। यानी अगर अंपायर ने आउट दिया था तो आउट रहेगा, और नॉट आउट दिया था तो नॉट आउट। इसके पीछे विचार यह है कि तकनीक का अनुमान भी पूरी तरह सटीक नहीं होता, इसलिए करीबी मामलों में अंपायर को संदेह का लाभ मिले।
अंपायर्स कॉल पर रिव्यू
cricket.com.au के अनुसार अक्टूबर 2017 से लागू नियमों में LBW पर अंपायर्स कॉल आने से टीम का रिव्यू नहीं घटता। इससे पहले ऐसी स्थिति में रिव्यू खत्म हो जाता था।
DRS को लेकर बहस
DRS ने बड़ी गलतियों को काफी हद तक कम किया है, लेकिन इस पर बहस भी होती रहती है। कुछ लोगों का मानना है कि अंपायर्स कॉल की व्यवस्था उलझन पैदा करती है, क्योंकि एक जैसी गेंद पर अंपायर के मूल फैसले के हिसाब से नतीजा अलग हो सकता है। तकनीक के खर्च के कारण हर स्तर के मैच में DRS उपलब्ध नहीं होता। इसके बावजूद आज ज्यादातर खिलाड़ी और विशेषज्ञ मानते हैं कि DRS ने खेल को ज्यादा निष्पक्ष बनाया है।
रिव्यू लेने की रणनीति
DRS अब रणनीति का भी हिस्सा है। कप्तान को विकेटकीपर और गेंदबाज की राय पर कुछ सेकंड में तय करना होता है कि रिव्यू लें या नहीं। गलत रिव्यू से टीम अहम मौके पर रिव्यू गंवा सकती है। बल्लेबाज भी अक्सर दूसरे छोर पर खड़े साथी से सलाह लेकर फैसला करते हैं।
DRS का पूरा नाम क्या है
डिसीजन रिव्यू सिस्टम।
क्या अंपायर्स कॉल पर रिव्यू घटता है
नहीं। 2017 से LBW पर अंपायर्स कॉल आने पर टीम का रिव्यू नहीं घटता।
स्रोत: ESPNcricinfo: Trial playing condition, Review of umpiring decisions, ICC: Number of appeals in UDRS trial reduced, cricket.com.au: New ICC rules in place for the Ashes





