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आलम आरा: भारत की पहली बोलती फिल्म की कहानी, जब 1931 में पर्दे पर पहली बार गूंजी आवाज

मूक फिल्मों के दौर में एक फिल्म ने भारतीय सिनेमा को आवाज दी। जानिए आलम आरा कैसे बनी और क्यों आज भी याद की जाती है।

पुराने फिल्म प्रोजेक्टर और रील का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

सारांश

  • आज भारतीय फिल्में गानों, संवादों और संगीत के बिना अधूरी लगती हैं, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब पर्दे पर किरदार बोलते नहीं थे।
  • अर्देशिर ईरानी भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर के प्रमुख फिल्मकारों में थे।
  • आलम आरा एक राजकुमार और एक युवती आलम आरा की प्रेम कहानी थी, जिसमें राजमहल की साजिशें और रोमांच का तड़का था।
  • फिल्म का प्रिंट भले न बचा हो, लेकिन इससे जुड़ी कुछ चीजें आज भी सहेजी गई हैं।

आज भारतीय फिल्में गानों, संवादों और संगीत के बिना अधूरी लगती हैं, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब पर्दे पर किरदार बोलते नहीं थे। 1913 में दादासाहेब फाल्के की राजा हरिश्चंद्र से शुरू हुआ भारतीय सिनेमा करीब दो दशक तक मूक रहा। फिर 1931 में आई आलम आरा, जिसने भारतीय सिनेमा को आवाज दी। यह भारत की पहली बोलती फिल्म यानी टॉकी मानी जाती है। आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक फिल्म की कहानी।

कब और कहां रिलीज हुई

The Hindu और BBC हिंदी की रिपोर्टों के अनुसार आलम आरा 14 मार्च 1931 को बॉम्बे (अब मुंबई) के मैजेस्टिक सिनेमा में रिलीज हुई। इसके निर्देशक और निर्माता अर्देशिर ईरानी थे। उस समय दर्शकों के लिए पर्दे पर किरदारों को बोलते और गाते सुनना बिल्कुल नया अनुभव था। फिल्म को देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ने की बात इतिहास में दर्ज है।

मुख्य बातें: पुराने फिल्म प्रोजेक्टर और रील का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

मूक फिल्मों का दौर

आलम आरा से पहले भारत में मूक फिल्में बनती थीं। इनमें संवाद पर्दे पर लिखकर दिखाए जाते थे और कई सिनेमाघरों में फिल्म के साथ लाइव संगीत बजाया जाता था। कहानियां ज्यादातर पौराणिक और ऐतिहासिक होती थीं। मूक फिल्मों की एक सुविधा यह थी कि एक ही फिल्म अलग-अलग भाषा वाले इलाकों में दिखाई जा सकती थी, क्योंकि लिखे हुए संवाद बदले जा सकते थे।

अर्देशिर ईरानी कौन थे

अर्देशिर ईरानी भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर के प्रमुख फिल्मकारों में थे। उन्होंने मूक फिल्मों के दौर में भी कई फिल्में बनाईं। विदेश में बोलती फिल्मों के आने के बाद उन्होंने भारत में भी ऐसी फिल्म बनाने का फैसला किया। आलम आरा ने उन्हें भारतीय सिनेमा के इतिहास में खास जगह दिलाई।

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पहला फिल्मी गाना

आलम आरा का गाना “दे दे खुदा के नाम पे” भारतीय सिनेमा का पहला फिल्मी गाना माना जाता है। इसे वजीर मोहम्मद खान ने गाया था। उस समय प्लेबैक सिंगिंग की तकनीक नहीं थी, इसलिए कलाकारों को शूटिंग के दौरान ही गाना पड़ता था। संगीत बजाने वाले भी कैमरे की नजर से बचकर पास ही बैठते थे। इसी फिल्म से भारतीय फिल्मों में गानों की वह परंपरा शुरू हुई जो आज तक कायम है।

फिल्म बनाने की चुनौतियां

बोलती फिल्म बनाना उस समय बेहद मुश्किल काम था। आवाज रिकॉर्ड करने की तकनीक नई थी और साउंडप्रूफ स्टूडियो नहीं थे। Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार स्टूडियो रेलवे लाइन के पास था और ट्रेनों का शोर आवाज की रिकॉर्डिंग में बाधा डालता था, इसलिए शूटिंग ज्यादातर रात में, खासकर देर रात से तड़के तक की गई। माइक्रोफोन छिपाकर लगाने पड़ते थे और कलाकारों को उनके आसपास रहकर अभिनय करना होता था। ऐसे कलाकारों की जरूरत भी बढ़ी जो हिंदुस्तानी भाषा अच्छी तरह बोल सकें।

फिल्म की कहानी

आलम आरा एक राजकुमार और एक युवती आलम आरा की प्रेम कहानी थी, जिसमें राजमहल की साजिशें और रोमांच का तड़का था। यह कहानी जोसेफ डेविड के इसी नाम के पारसी नाटक पर आधारित थी। उस दौर के दर्शकों को ऐसी नाटकीय कहानियां खूब पसंद आती थीं।

क्यों नहीं बची फिल्म की कॉपी

आलम आरा भारतीय सिनेमा के इतिहास की सबसे अहम फिल्मों में है, लेकिन यह दुखद है कि इसका कोई प्रिंट आज उपलब्ध नहीं माना जाता। पुराने दौर की फिल्में नाइट्रेट आधारित रील पर बनती थीं, जो आसानी से खराब होती थीं और आग पकड़ सकती थीं। संरक्षण की व्यवस्था न होने से उस दौर की बहुत सी फिल्में खो गईं। आज इस फिल्म की जानकारी मुख्य रूप से तस्वीरों, लेखों और यादों से मिलती है।

भारतीय सिनेमा पर असर

आलम आरा की सफलता के बाद भारत में बोलती फिल्मों का दौर तेजी से शुरू हुआ। कुछ ही सालों में मूक फिल्मों का निर्माण लगभग बंद हो गया। इसी साल अलग-अलग भारतीय भाषाओं में भी बोलती फिल्में आने लगीं। आवाज आने से भाषा फिल्मों की पहचान बन गई और क्षेत्रीय सिनेमा का विकास हुआ। गीत-संगीत भारतीय फिल्मों की पहचान बन गए, जिसने आगे चलकर फिल्मी संगीत उद्योग को जन्म दिया।

फिल्म से जुड़ी बची हुई धरोहर

फिल्म का प्रिंट भले न बचा हो, लेकिन इससे जुड़ी कुछ चीजें आज भी सहेजी गई हैं। इनमें फिल्म की तस्वीरें, पोस्टर और प्रचार सामग्री शामिल हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन ने वह प्रिंटिंग मशीन भी हासिल की, जिसका इस्तेमाल आलम आरा के प्रिंट बनाने में हुआ था। ऐसी कोशिशें बताती हैं कि पुरानी फिल्मों का संरक्षण कितना जरूरी है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपने सिनेमा के इतिहास को देख और समझ सकें।

आज क्यों याद की जाती है

भारतीय सिनेमा के इतिहास की बात हो तो दो फिल्मों का नाम सबसे पहले आता है: पहली फीचर फिल्म राजा हरिश्चंद्र और पहली बोलती फिल्म आलम आरा। फिल्म की रिलीज की वर्षगांठ पर अक्सर इसे याद किया जाता है। फिल्म इतिहास पढ़ने वाले छात्रों और सिनेमा प्रेमियों के लिए यह फिल्म भारतीय सिनेमा के बदलाव का प्रतीक है।

आलम आरा कब रिलीज हुई थी

आलम आरा 14 मार्च 1931 को बॉम्बे के मैजेस्टिक सिनेमा में रिलीज हुई थी।

आलम आरा के निर्देशक कौन थे

इसके निर्देशक और निर्माता अर्देशिर ईरानी थे।

स्रोत: The Hindu: Making screen history, BBC Hindi: आलम आरा, Times of India: Film Heritage Foundation recovers printing machine, Indian Express: 90 years of Alam Ara

लेखक

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी डेमोक्रेटिक भारत लाइव के संस्थापक, मालिक और संपादक हैं। डिजिटल मीडिया में 6 साल से अधिक के अनुभव के साथ वे मुख्य रूप से राजनीति और चुनाव की खबरें कवर करते हैं, साथ ही देश, कारोबार और खेल से जुड़ी अहम खबरों का संपादन करते हैं। वेबसाइट की संपादकीय नीति, तथ्य-जांच और प्रकाशित सामग्री की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की है।

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