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स्थगन, सत्रावसान और विघटन में क्या अंतर है: संसद का सत्र कैसे खत्म होता है और लंबित विधेयकों का क्या होता है

संसद की खबरों में स्थगन, सत्रावसान और विघटन जैसे शब्द अक्सर आते हैं। जानिए इनका मतलब और लंबित विधेयकों पर इनका असर।

संसद भवन का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

सारांश

  • संसद के हर सत्र के अंत में खबरें आती हैं कि सदन अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया, फिर कुछ दिन बाद सत्रावसान की अधिसूचना आती है।
  • स्थगन का मतलब है किसी बैठक की कार्यवाही को तय समय के लिए रोक देना।
  • अनुच्छेद 107(3) साफ कहता है कि संसद में लंबित कोई विधेयक सदनों के सत्रावसान के कारण समाप्त नहीं होता।
  • राज्यों में भी यही व्यवस्था लागू होती है। वहां सत्र बुलाने, सत्रावसान और विधानसभा भंग करने का अधिकार राज्यपाल के पास होता है, जबकि स्थगन का अधिकार विधानसभा अध्यक्ष के पास।

संसद के हर सत्र के अंत में खबरें आती हैं कि सदन अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया, फिर कुछ दिन बाद सत्रावसान की अधिसूचना आती है। चुनाव से पहले लोकसभा के विघटन की बात होती है। ये तीनों शब्द सुनने में मिलते-जुलते लगते हैं, लेकिन संविधान और संसदीय प्रक्रिया में इनका मतलब और असर अलग-अलग है। इस लेख में आसान भाषा में समझते हैं कि स्थगन, सत्रावसान और विघटन में क्या अंतर है।

पहले समझें: सत्र और बैठक

संसद का सत्र वह अवधि है जिसमें सदन लगातार काम करता है, जैसे बजट सत्र, मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र। एक सत्र में कई बैठकें होती हैं। आमतौर पर हर कामकाजी दिन की कार्यवाही को एक बैठक माना जाता है। अनुच्छेद 85 के तहत राष्ट्रपति समय-समय पर संसद के सदनों को बैठक के लिए बुलाते हैं और दो सत्रों के बीच छह महीने से ज्यादा का अंतर नहीं हो सकता।

मुख्य बातें: संसद भवन का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

स्थगन क्या है

स्थगन का मतलब है किसी बैठक की कार्यवाही को तय समय के लिए रोक देना। यह कुछ घंटों, दिनों या हफ्तों के लिए हो सकता है और दोबारा बैठने का समय तय होता है। स्थगन से सिर्फ बैठक खत्म होती है, सत्र नहीं। स्थगन का अधिकार सदन के पीठासीन अधिकारी के पास होता है, यानी लोकसभा में अध्यक्ष और राज्यसभा में सभापति। हंगामे की वजह से कार्यवाही स्थगित होने की खबरें इसी श्रेणी में आती हैं।

अनिश्चितकाल के लिए स्थगन

जब सदन को अगली बैठक की तारीख तय किए बिना स्थगित किया जाता है, तो इसे अनिश्चितकाल के लिए स्थगन या एडजर्नमेंट साइने डाई कहते हैं। आमतौर पर सत्र का कामकाज पूरा होने पर ऐसा किया जाता है। यह अधिकार भी पीठासीन अधिकारी के पास है। जरूरत पड़ने पर पीठासीन अधिकारी तय तारीख से पहले भी सदन की बैठक बुला सकते हैं।

यह भी पढ़ें: भारत में कानून कैसे बनता है: विधेयक के तीन वाचन, संयुक्त बैठक, धन विधेयक और राष्ट्रपति की मंजूरी | राष्ट्रपति की शक्तियां: चुनाव कैसे होता है, अध्यादेश, क्षमादान, आपातकाल और संविधान की सीमाएं

सत्रावसान क्या है

सत्रावसान यानी प्रोरोगेशन का मतलब है सत्र का औपचारिक अंत। यह राष्ट्रपति के आदेश से अनुच्छेद 85(2)(a) के तहत होता है। सत्रावसान से बैठक और सत्र दोनों खत्म हो जाते हैं, लेकिन सदन बना रहता है। आमतौर पर पीठासीन अधिकारी के अनिश्चितकाल स्थगन के कुछ दिन बाद राष्ट्रपति सत्रावसान की अधिसूचना जारी करते हैं। राष्ट्रपति चल रहे सत्र के दौरान भी सत्रावसान कर सकते हैं। सत्रावसान और अगली बैठक के बीच के समय को अवकाश कहा जाता है।

सत्रावसान का विधेयकों पर असर

अनुच्छेद 107(3) साफ कहता है कि संसद में लंबित कोई विधेयक सदनों के सत्रावसान के कारण समाप्त नहीं होता। हालांकि आम तौर पर विधेयक पेश करने के नोटिस को छोड़कर बाकी लंबित नोटिस सत्रावसान पर समाप्त हो जाते हैं और अगले सत्र के लिए नए नोटिस देने होते हैं।

विघटन क्या है

विघटन का मतलब है सदन के कार्यकाल का अंत। इसके बाद आम चुनाव होते हैं और नया सदन बनता है। विघटन सिर्फ लोकसभा का होता है, क्योंकि राज्यसभा स्थायी सदन है और उसके एक-तिहाई सदस्य हर दो साल में सेवानिवृत्त होते हैं। लोकसभा का विघटन अनुच्छेद 85(2)(b) के तहत राष्ट्रपति करते हैं। यह दो तरह से होता है: पांच साल का कार्यकाल पूरा होने पर अपने आप, या कार्यकाल पूरा होने से पहले राष्ट्रपति के आदेश से।

विघटन का विधेयकों पर असर

अनुच्छेद 107 के अनुसार:

  • लोकसभा में लंबित विधेयक विघटन पर समाप्त हो जाता है।
  • लोकसभा से पारित होकर राज्यसभा में लंबित विधेयक भी समाप्त हो जाता है।
  • राज्यसभा में लंबित ऐसा विधेयक जो लोकसभा से पारित नहीं हुआ है, विघटन पर समाप्त नहीं होता।
  • अनुच्छेद 108 के तहत संयुक्त बैठक बुलाने की अधिसूचना जारी हो चुकी हो, तो विधेयक समाप्त नहीं होता।

उदाहरण: 17वीं लोकसभा

PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार 17वीं लोकसभा (2019-2024) के अंत में 20 विधेयक राज्यसभा में लंबित थे, जो विघटन के बाद भी बने रहे, जबकि चार विधेयक लोकसभा के विघटन के साथ समाप्त होने वाले थे। इससे अनुच्छेद 107 का व्यावहारिक असर समझ आता है।

तीनों में अंतर एक नजर में

  • किसका फैसला: स्थगन पीठासीन अधिकारी करते हैं, सत्रावसान और विघटन राष्ट्रपति।
  • क्या खत्म होता है: स्थगन से बैठक, सत्रावसान से सत्र, विघटन से सदन का कार्यकाल।
  • किस पर लागू: स्थगन और सत्रावसान दोनों सदनों पर, विघटन सिर्फ लोकसभा पर।
  • विधेयक: स्थगन और सत्रावसान से विधेयक खत्म नहीं होते, विघटन से कुछ विधेयक खत्म होते हैं।

राज्यों की विधानसभा में भी यही व्यवस्था

राज्यों में भी यही व्यवस्था लागू होती है। वहां सत्र बुलाने, सत्रावसान और विधानसभा भंग करने का अधिकार राज्यपाल के पास होता है, जबकि स्थगन का अधिकार विधानसभा अध्यक्ष के पास। जिन राज्यों में विधान परिषद है, वह भी राज्यसभा की तरह स्थायी सदन होती है।

क्या राज्यसभा का विघटन हो सकता है

नहीं। राज्यसभा स्थायी सदन है, इसका विघटन नहीं होता।

क्या सत्रावसान से लंबित विधेयक खत्म हो जाते हैं

नहीं। अनुच्छेद 107(3) के अनुसार सत्रावसान से लंबित विधेयक समाप्त नहीं होते।

स्रोत: Constitution of India: Article 107, ClearIAS: Adjournment, Prorogation and Dissolution, PRS: Legislative Wrap, 17th Lok Sabha

लेखक

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी डेमोक्रेटिक भारत लाइव के संस्थापक, मालिक और संपादक हैं। डिजिटल मीडिया में 6 साल से अधिक के अनुभव के साथ वे मुख्य रूप से राजनीति और चुनाव की खबरें कवर करते हैं, साथ ही देश, कारोबार और खेल से जुड़ी अहम खबरों का संपादन करते हैं। वेबसाइट की संपादकीय नीति, तथ्य-जांच और प्रकाशित सामग्री की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की है।

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