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सशस्त्र सेना झंडा दिवस 7 दिसंबर: 1949 से क्यों मनाया जाता है, झंडा दिवस कोष में दान कैसे करें

हर साल 7 दिसंबर को देश सैनिकों, पूर्व सैनिकों और शहीदों के परिवारों के प्रति अपना दायित्व याद करता है। जानिए इस दिन का इतिहास।

तिरंगे के साथ सेना, नौसेना और वायुसेना के प्रतीक रंगों वाले टोकन झंडे का चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

सारांश

  • देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले सैनिकों के प्रति आभार जताने के कई मौके आते हैं, लेकिन 7 दिसंबर का दिन खास है।
  • हरियाणा सरकार के एक दस्तावेज के अनुसार आजादी से पहले भी पूर्व सैनिकों की मदद के लिए 11 नवंबर को एक दिन जनता से चंदा इकट्ठा किया जाता था, जिसे पॉपी डे या रिमेंबरेंस डे कहा जाता था।
  • पूर्व सैनिक कल्याण विभाग की वेबसाइट के अनुसार केंद्रीय सैनिक बोर्ड रक्षा मंत्रालय के पूर्व सैनिक कल्याण विभाग के तहत काम करता है।
  • PIB के दस्तावेज में कहा गया है कि केंद्र और राज्य सरकारों के प्रयासों के अलावा शहीदों और दिव्यांग सैनिकों के आश्रितों के पुनर्वास और कल्याण में योगदान देना हर नागरिक का सामूहिक कर्तव्य है।

देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले सैनिकों के प्रति आभार जताने के कई मौके आते हैं, लेकिन 7 दिसंबर का दिन खास है। इस दिन पूरे भारत में सशस्त्र सेना झंडा दिवस मनाया जाता है। यह दिन सिर्फ सम्मान जताने का नहीं, बल्कि शहीदों के परिवारों, युद्ध में घायल हुए सैनिकों और पूर्व सैनिकों के कल्याण में आम नागरिकों की भागीदारी का भी दिन है। आइए जानते हैं कि यह दिन कब से और क्यों मनाया जाता है और आप इसमें कैसे योगदान दे सकते हैं।

झंडा दिवस का इतिहास

PIB के दस्तावेज के अनुसार आजादी के तुरंत बाद सरकार को रक्षाकर्मियों के कल्याण के इंतजाम की जरूरत महसूस हुई। 28 अगस्त 1949 को तत्कालीन रक्षा मंत्री के अधीन बनी एक समिति ने हर साल 7 दिसंबर को झंडा दिवस मनाने का फैसला किया। तब से 1949 से यह दिन पूरे देश में सशस्त्र सेना झंडा दिवस के रूप में मनाया जाता है। विचार यह था कि आम लोगों के बीच छोटे झंडे बांटे जाएं और बदले में दान इकट्ठा किया जाए।

मुख्य बातें: तिरंगे के साथ सेना, नौसेना और वायुसेना के प्रतीक रंगों वाले टोकन झंडे का चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

आजादी से पहले की परंपरा

हरियाणा सरकार के एक दस्तावेज के अनुसार आजादी से पहले भी पूर्व सैनिकों की मदद के लिए 11 नवंबर को एक दिन जनता से चंदा इकट्ठा किया जाता था, जिसे पॉपी डे या रिमेंबरेंस डे कहा जाता था। इसमें कागज के पॉपी फूल बांटे जाते थे। उस चंदे का बड़ा हिस्सा ब्रिटिश पूर्व सैनिकों के लिए इस्तेमाल होता था। आजादी के बाद भारतीय सैनिकों और उनके परिवारों के लिए अलग व्यवस्था की जरूरत थी, जिससे झंडा दिवस की नींव पड़ी।

झंडा दिवस के तीन मुख्य उद्देश्य

PIB के अनुसार यह दिन मुख्य रूप से तीन उद्देश्यों के लिए मनाया जाता है:

  1. युद्ध में हताहत हुए सैनिकों का पुनर्वास।
  2. सेवारत सैनिकों और उनके परिवारों का कल्याण।
  3. पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों का पुनर्वास और कल्याण।

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टोकन झंडे और कार स्टिकर

झंडा दिवस पर केंद्रीय सैनिक बोर्ड की ओर से देशभर में टोकन झंडे और कार स्टिकर बांटे जाते हैं। ये लाल, गहरे नीले और हल्के नीले रंग के होते हैं, जो तीनों सेनाओं का प्रतीक हैं। राज्य सैनिक बोर्ड और जिला सैनिक बोर्ड इन्हें आगे लोगों तक पहुंचाते हैं। लोग इन्हें लेकर अपनी इच्छा से दान देते हैं। कई जगहों पर सेना की इकाइयां इस मौके पर सांस्कृतिक कार्यक्रम, मेले और नाटक जैसे आयोजन भी करती हैं।

केंद्रीय सैनिक बोर्ड क्या है

पूर्व सैनिक कल्याण विभाग की वेबसाइट के अनुसार केंद्रीय सैनिक बोर्ड रक्षा मंत्रालय के पूर्व सैनिक कल्याण विभाग के तहत काम करता है। इसका इतिहास 1919 में बने भारतीय सैनिक बोर्ड से जुड़ा है। 1975 में इसका नाम केंद्रीय सैनिक बोर्ड रखा गया और राज्य व जिला स्तर पर राज्य सैनिक बोर्ड और जिला सैनिक बोर्ड बने। रक्षा मंत्री इस बोर्ड के अध्यक्ष होते हैं। सशस्त्र सेना झंडा दिवस कोष का प्रबंधन भी यही बोर्ड करता है।

दान का पैसा कहां जाता है

झंडा दिवस कोष से पूर्व सैनिकों, युद्ध विधवाओं, युद्ध में दिव्यांग हुए सैनिकों और उनके आश्रितों के लिए कई कल्याण योजनाएं चलाई जाती हैं। इनमें आर्थिक सहायता, बच्चों की पढ़ाई, इलाज और पुनर्वास से जुड़ी मदद शामिल है। यह कोष आम लोगों, संस्थाओं और कंपनियों के स्वैच्छिक योगदान से चलता है।

आप कैसे योगदान दे सकते हैं

  • अपने जिले के जिला सैनिक बोर्ड या सैनिक कल्याण कार्यालय से संपर्क करें।
  • झंडा दिवस पर टोकन झंडा या कार स्टिकर लेकर दान दें।
  • केंद्रीय सैनिक बोर्ड की आधिकारिक वेबसाइट पर ऑनलाइन दान का विकल्प देखें।
  • दान करते समय रसीद जरूर लें और सिर्फ आधिकारिक माध्यम का इस्तेमाल करें।

सावधानी जरूरी

झंडा दिवस या सैनिकों के नाम पर कई बार फर्जी लोग भी चंदा मांगते हैं। सोशल मीडिया पर आए किसी अनजान लिंक या फोन कॉल पर भरोसा न करें। दान हमेशा सरकारी वेबसाइट या जिला सैनिक बोर्ड जैसे आधिकारिक माध्यम से ही करें।

नागरिकों की भी जिम्मेदारी

PIB के दस्तावेज में कहा गया है कि केंद्र और राज्य सरकारों के प्रयासों के अलावा शहीदों और दिव्यांग सैनिकों के आश्रितों के पुनर्वास और कल्याण में योगदान देना हर नागरिक का सामूहिक कर्तव्य है। झंडा दिवस हमें याद दिलाता है कि सैनिक हमारी सुरक्षा के लिए जो त्याग करते हैं, उसके बदले में उनके परिवारों का ख्याल रखना समाज की जिम्मेदारी है। स्कूलों और कॉलेजों में इस दिन बच्चों को सैनिकों के योगदान के बारे में बताया जाता है, जिससे नई पीढ़ी में भी यह भावना बनी रहे।

सशस्त्र सेना झंडा दिवस कब मनाया जाता है

हर साल 7 दिसंबर को।

झंडा दिवस कब से मनाया जा रहा है

1949 से। 28 अगस्त 1949 को इसे हर साल 7 दिसंबर को मनाने का फैसला हुआ था।

टोकन झंडों के तीन रंग किसके प्रतीक हैं

लाल, गहरा नीला और हल्का नीला रंग तीनों सेनाओं का प्रतीक हैं।

स्रोत: PIB: Armed Forces Flag Day (2021), PIB: Armed Forces Flag Day (2022), DESW: About Kendriya Sainik Board

लेखक

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी डेमोक्रेटिक भारत लाइव के संस्थापक, मालिक और संपादक हैं। डिजिटल मीडिया में 6 साल से अधिक के अनुभव के साथ वे मुख्य रूप से राजनीति और चुनाव की खबरें कवर करते हैं, साथ ही देश, कारोबार और खेल से जुड़ी अहम खबरों का संपादन करते हैं। वेबसाइट की संपादकीय नीति, तथ्य-जांच और प्रकाशित सामग्री की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की है।

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