बीसवीं सदी के इतिहास में बर्लिन की दीवार शीत युद्ध का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती है। 28 साल तक इस दीवार ने जर्मनी के बर्लिन शहर को दो हिस्सों में बांटे रखा। परिवार बिछड़ गए, दोस्त अलग हो गए और दीवार पार करने की कोशिश में कई लोगों की जान गई। 9 नवंबर 1989 को जब यह दीवार खुली, तो पूरी दुनिया ने इसे शीत युद्ध के अंत की शुरुआत के रूप में देखा। इस लेख में जानिए दीवार क्यों बनी, कैसी थी और कैसे गिरी।
जर्मनी का बंटवारा
दूसरे विश्व युद्ध में हार के बाद जर्मनी को चार हिस्सों में बांटा गया, जिन पर अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और सोवियत संघ का नियंत्रण था। राजधानी बर्लिन सोवियत क्षेत्र के अंदर थी, लेकिन शहर को भी इसी तरह चार हिस्सों में बांटा गया। 1949 में पश्चिमी तीन हिस्सों को मिला कर पश्चिम जर्मनी बना और सोवियत हिस्से में पूर्वी जर्मनी बना। बर्लिन का पश्चिमी हिस्सा पश्चिम जर्मनी से जुड़ा रहा, जबकि पूर्वी बर्लिन पूर्वी जर्मनी की राजधानी बना।

दीवार क्यों बनी
1950 के दशक में पूर्वी जर्मनी से लाखों लोग बेहतर जिंदगी और आजादी की तलाश में पश्चिम चले गए। इनमें बड़ी संख्या में पढ़े लिखे युवा, डॉक्टर और इंजीनियर थे। पश्चिम बर्लिन इस पलायन का सबसे आसान रास्ता था। पूर्वी जर्मनी की सरकार इसे रोकना चाहती थी। 13 अगस्त 1961 की रात को अचानक कंटीले तारों से सीमा बंद कर दी गई और फिर कंक्रीट की दीवार बनाई गई। पूर्वी जर्मनी की सरकार ने इसे फासीवाद विरोधी सुरक्षा दीवार बताया।
दीवार कैसी थी
समय के साथ दीवार को और मजबूत किया गया। पश्चिम बर्लिन को घेरने वाली पूरी सीमा करीब 155 किलोमीटर लंबी थी। इसमें कंक्रीट की ऊंची दीवारें, बीच में खाली पट्टी, निगरानी टावर, सर्चलाइट, कुत्ते और हथियारबंद गार्ड होते थे। इस खाली पट्टी को डेथ स्ट्रिप कहा जाता था। सीमा पार करने के लिए कुछ तय चौकियां थीं, जिनमें चेकपॉइंट चार्ली सबसे प्रसिद्ध है।
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दीवार पार करने की कोशिशें
28 साल में हजारों लोगों ने दीवार पार करने की कोशिश की। कुछ ने सुरंगें खोदीं, कुछ ने गाड़ियों में छिप कर, तो कुछ ने गुब्बारे और रस्सियों के सहारे भागने की कोशिश की। बर्लिन वॉल मेमोरियल के शोध के अनुसार दीवार से जुड़ी घटनाओं में कम से कम 140 लोगों की मौत हुई। कई लोगों को गिरफ्तार करके जेल भेजा गया।
दुनिया के नेताओं के भाषण
26 जून 1963 को अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ने पश्चिम बर्लिन में भाषण दिया और जर्मन भाषा में कहा कि मैं एक बर्लिनवासी हूं। 12 जून 1987 को राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने ब्रांडेनबर्ग गेट के पास सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचेव से अपील की कि इस दीवार को गिरा दीजिए। ये दोनों भाषण शीत युद्ध के इतिहास में यादगार माने जाते हैं।
दीवार कैसे गिरी
1980 के दशक के आखिर में सोवियत संघ में गोर्बाचेव के सुधारों और पूर्वी यूरोप में बदलाव की लहर से हालात बदलने लगे। हंगरी ने ऑस्ट्रिया से लगी अपनी सीमा खोल दी और पूर्वी जर्मनी के लोग उस रास्ते से भागने लगे। पूर्वी जर्मनी में बड़े प्रदर्शन हुए। 9 नवंबर 1989 की शाम एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूर्वी जर्मनी के अधिकारी गुंटर शाबोवस्की ने यात्रा के नए नियमों की घोषणा करते हुए गलती से कह दिया कि ये तुरंत लागू हैं। यह सुनकर हजारों लोग सीमा चौकियों पर पहुंच गए। भीड़ के दबाव में रात को चौकियां खोल दी गईं। लोग दीवार पर चढ़ गए, हथौड़ों से उसे तोड़ने लगे और पूरा शहर जश्न में डूब गया।
जर्मनी का एकीकरण
दीवार गिरने के करीब 11 महीने बाद 3 अक्टूबर 1990 को पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी फिर एक हो गए। इस दिन को जर्मनी में एकता दिवस के रूप में मनाया जाता है। 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ शीत युद्ध पूरी तरह खत्म हो गया।
आज क्या बचा है
आज बर्लिन में दीवार के कुछ हिस्से स्मारक के रूप में बचाए गए हैं। बर्नाउअर स्ट्रासे पर बर्लिन वॉल मेमोरियल है, जहां दीवार और डेथ स्ट्रिप का एक हिस्सा मूल रूप में देखा जा सकता है। ईस्ट साइड गैलरी में दीवार के लंबे हिस्से पर दुनिया भर के कलाकारों की पेंटिंग बनी हैं। दुनिया के कई देशों में दीवार के टुकड़े प्रतीक के तौर पर रखे गए हैं।
भारत और जर्मनी का एकीकरण
भारत ने जर्मनी के एकीकरण का स्वागत किया था। आज एकीकृत जर्मनी यूरोप में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार देशों में गिना जाता है।
बर्लिन की दीवार कब बनी
13 अगस्त 1961 से बनना शुरू हुई।
दीवार कब गिरी
9 नवंबर 1989 को।
जर्मनी का एकीकरण कब हुआ
3 अक्टूबर 1990 को।
स्रोत: Berlin Wall Memorial (Gedenkstätte Berliner Mauer), Berlin.de: The Berlin Wall, Britannica: Berlin Wall





