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कुसुम MSP 2027-28: रबी फसलों में सबसे ज्यादा 675 रुपये की बढ़ोतरी, 7215 रुपये प्रति क्विंटल पर तिलहन किसानों के लिए क्या मायने

तिलहन फसल कुसुम यानी सैफ्लावर के MSP में इस बार रबी फसलों में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। जानिए किसानों के लिए इसका मतलब।

खेत में खिले पीले-नारंगी कुसुम के फूलों का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

सारांश

  • कुसुम यानी सैफ्लावर एक रबी तिलहन फसल है, जिसके बीजों से खाने का तेल निकाला जाता है।
  • PIB के अनुसार बढ़ोतरी के लिहाज से कुसुम पहले, सरसों 413 रुपये के साथ दूसरे और मसूर 390 रुपये के साथ तीसरे स्थान पर है।
  • MSP तय होने का मतलब है कि सरकारी एजेंसियां मूल्य समर्थन योजना के तहत इस कीमत पर खरीद कर सकती हैं, जब बाजार भाव इससे नीचे हो।
  • भारत खाद्य तेल का बड़ा आयातक है। इसलिए सरसों, मूंगफली, सोयाबीन और कुसुम जैसी तिलहन फसलों का उत्पादन बढ़ाना सरकार की प्राथमिकता है।

कुसुम यानी सैफ्लावर एक रबी तिलहन फसल है, जिसके बीजों से खाने का तेल निकाला जाता है। यह फसल कम पानी में और सूखे इलाकों में भी हो जाती है, इसलिए महाराष्ट्र और कर्नाटक के सूखे इलाकों में किसान इसे उगाते रहे हैं। इस बार रबी फसलों के MSP में सबसे बड़ी बढ़ोतरी कुसुम में हुई है। आइए जानते हैं नया MSP क्या है और किसानों के लिए इसका क्या मतलब है।

कुसुम MSP 2027-28

PIB के अनुसार केंद्रीय मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति ने 30 सितंबर 2026 को रबी विपणन सीजन 2027-28 के लिए MSP तय किए। कुसुम का MSP 7215 रुपये प्रति क्विंटल तय हुआ है। रबी विपणन सीजन 2026-27 में यह 6540 रुपये था। यानी 675 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी हुई है, जो सभी रबी फसलों में सबसे ज्यादा है।

मुख्य बातें: खेत में खिले पीले-नारंगी कुसुम के फूलों का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

लागत और मार्जिन

PIB के अनुसार कुसुम की अखिल भारतीय भारित औसत उत्पादन लागत 4810 रुपये प्रति क्विंटल आंकी गई है। नया MSP इस लागत पर लगभग 50 प्रतिशत मार्जिन देता है। यह रबी फसलों में सबसे कम मार्जिन है, लेकिन सरकार के उत्पादन लागत के कम से कम डेढ़ गुना के फॉर्मूले के बराबर है।

रबी फसलों में तुलना

PIB के अनुसार बढ़ोतरी के लिहाज से कुसुम पहले, सरसों 413 रुपये के साथ दूसरे और मसूर 390 रुपये के साथ तीसरे स्थान पर है। जौ में 136 रुपये, चने में 83 रुपये और गेहूं में 25 रुपये की बढ़ोतरी हुई है। सरकार ने कहा है कि दलहन और तिलहन को ज्यादा MSP देकर फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है।

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कुसुम की खेती कहां होती है

भारत में कुसुम की खेती मुख्य रूप से महाराष्ट्र और कर्नाटक में होती है। तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों में भी इसकी खेती होती है। यह आम तौर पर काली मिट्टी में बची हुई नमी पर उगाई जाती है। इसकी जड़ें गहरी होती हैं, इसलिए यह मिट्टी की निचली परतों से नमी ले लेती है।

फसल की खासियत

  • कम पानी में होने वाली फसल, सूखा सहन करने की क्षमता।
  • पौधों में कांटे होते हैं, जिससे जानवरों से कुछ हद तक बचाव होता है। बिना कांटे वाली किस्में भी विकसित की गई हैं।
  • बीजों से निकलने वाला तेल खाना पकाने में इस्तेमाल होता है।
  • पंखुड़ियों से पारंपरिक रूप से प्राकृतिक रंग बनाए जाते रहे हैं।

खेती में ध्यान दें

कुसुम की बुआई आम तौर पर रबी सीजन में अक्टूबर के आसपास की जाती है, लेकिन सही समय क्षेत्र के अनुसार बदलता है। ICAR के भारतीय तिलहन अनुसंधान संस्थान यानी IIOR और राज्य कृषि विश्वविद्यालय अलग-अलग क्षेत्रों के लिए किस्मों की सिफारिश करते हैं। एफिड यानी माहू कीट कुसुम की बड़ी समस्या है, जिसके लिए कृषि विज्ञान केंद्र की सलाह पर समय पर उपाय करें। कटाई के समय कांटों से बचने के लिए दस्ताने और उचित कपड़े पहनें।

MSP पर खरीद

MSP तय होने का मतलब है कि सरकारी एजेंसियां मूल्य समर्थन योजना के तहत इस कीमत पर खरीद कर सकती हैं, जब बाजार भाव इससे नीचे हो। लेकिन कुसुम की सरकारी खरीद कितनी होगी, यह राज्यों के प्रस्ताव और केंद्र की मंजूरी पर निर्भर करता है। इसलिए बुआई से पहले अपने राज्य के कृषि विभाग से खरीद व्यवस्था की जानकारी लें।

बिक्री की तैयारी

  • कटाई के बाद बीजों को अच्छी तरह सुखाएं।
  • बीजों से कांटे, पत्तियां और मिट्टी साफ करें।
  • मंडी का ताजा भाव e-NAM या Agmarknet पोर्टल पर देखें।
  • तेल मिलों और किसान उत्पादक संगठनों से सीधे बिक्री के विकल्प भी तलाशें।

कुसुम का तेल

कुसुम के बीजों से निकलने वाला तेल हल्के स्वाद वाला होता है और खाना पकाने में इस्तेमाल किया जाता है। बीज से तेल निकालने के बाद बची खली पशु आहार में काम आती है। तेल मिलें अक्सर बीजों में तेल की मात्रा और साफ-सफाई के आधार पर भाव तय करती हैं, इसलिए अच्छी गुणवत्ता के साफ बीज बेहतर दाम दिला सकते हैं।

फसल चक्र में जगह

कुसुम को सोयाबीन, ज्वार या दूसरी खरीफ फसलों के बाद रबी में बोया जा सकता है। चने के साथ अंतरफसल के रूप में भी कुछ इलाकों में इसकी खेती होती है। गहरी जड़ों के कारण यह मिट्टी की निचली परत की नमी का इस्तेमाल करती है, जिससे सूखे इलाकों में किसानों को एक अतिरिक्त फसल का विकल्प मिलता है।

तिलहन में आत्मनिर्भरता

भारत खाद्य तेल का बड़ा आयातक है। इसलिए सरसों, मूंगफली, सोयाबीन और कुसुम जैसी तिलहन फसलों का उत्पादन बढ़ाना सरकार की प्राथमिकता है। MSP में बढ़ोतरी को इसी दिशा में एक प्रोत्साहन के रूप में देखा जा रहा है।

कुसुम MSP 2027-28 कितना है

7215 रुपये प्रति क्विंटल।

कुसुम के MSP में कितनी बढ़ोतरी हुई

675 रुपये प्रति क्विंटल, जो रबी फसलों में सबसे ज्यादा है।

सलाह लें: बुआई या बिक्री का फैसला लेने से पहले अपने जिले के कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लें और मंडी का ताजा भाव जरूर जांचें।

स्रोत: PIB: Cabinet approves MSP for Rabi Crops for Marketing Season 2027-28, ICAR-Indian Institute of Oilseeds Research, Wikipedia: Safflower

लेखक

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी डेमोक्रेटिक भारत लाइव के संस्थापक, मालिक और संपादक हैं। डिजिटल मीडिया में 6 साल से अधिक के अनुभव के साथ वे मुख्य रूप से राजनीति और चुनाव की खबरें कवर करते हैं, साथ ही देश, कारोबार और खेल से जुड़ी अहम खबरों का संपादन करते हैं। वेबसाइट की संपादकीय नीति, तथ्य-जांच और प्रकाशित सामग्री की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की है।

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