झारखंड हाईकोर्ट ने जेएसएससी सीजीएल विज्ञापन संख्या 10/2023 के तहत पूरी परीक्षा को मास लेवल पर रद्द करने के राज्य सरकार के निर्णय को अवैध घोषित करते हुए खारिज कर दिया है। शुक्रवार को न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने रमेश उरांव, आकाश गौरव और निरोज खेस समेत अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। इस निर्णय के साथ ही लगभग 1932 से 2000 सफल अभ्यर्थियों की नौकरी पर मंडरा रहा खतरा टल गया है और वे अपनी सेवाएं जारी रख सकेंगे।

मास कैंसिलेशन के खिलाफ अदालत की सख्त टिप्पणी
झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस निर्णय को पूरी तरह से खारिज कर दिया है जिसके तहत पूरी भर्ती प्रक्रिया को सामूहिक रूप से रद्द करने का आदेश दिया गया था। अदालत ने इस प्रक्रिया की आलोचना करते हुए स्पष्ट किया कि मास लेवल पर किसी भी परीक्षा या भर्ती प्रक्रिया को रद्द करना अनुचित कदम है। सरकार का यह तर्क कि जांच के दौरान कुछ नई सामग्री प्राप्त हुई है या कुछ गिरफ्तारियां हुई हैं, किसी भी स्थिति में पूर्व के न्यायिक फैसलों को निष्प्रभावी करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अदालत ने अपने आदेश में इस बात पर विशेष जोर दिया कि कार्यपालिका का कोई भी निर्णय न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों के विपरीत नहीं हो सकता है। यह फैसला प्रशासनिक व्यवस्था में कानून के शासन की सर्वोच्चता को पुनः स्थापित करता है।
बिना दोष साबित हुए बर्खास्तगी संभव नहीं
न्यायालय ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया है कि जब तक किसी अभ्यर्थी के खिलाफ आपराधिक अभियोजन की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती या उसका दोष सिद्ध नहीं हो जाता, तब तक किसी भी सफल उम्मीदवार को उसकी नौकरी से बर्खास्त नहीं किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि निर्दोष अभ्यर्थियों के अधिकारों का हनन किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। इस सुनवाई के दौरान यह भी स्पष्ट किया गया कि सुप्रीम कोर्ट का इस मामले में जो निर्देश था, वह यथावत लागू रहेगा। इसका सीधा अर्थ यह है कि यदि जांच एजेंसी द्वारा किसी विशेष उम्मीदवार को भ्रष्टाचार या गड़बड़ी में संलिप्त पाया जाता है, तो उसे भविष्य में रोजगार से प्रतिबंधित करने की कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन सामूहिक रूप से सभी को दंडित करना न्यायसंगत नहीं है।
जांच प्रक्रिया की निरंतरता
हाईकोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि इस पूरे मामले की जांच पूरी निष्पक्षता और स्वतंत्र तरीके से तार्किक निष्कर्ष तक जारी रहनी चाहिए। अदालत ने उम्मीद जताई है कि जांच एजेंसी इस मामले में तेजी लाएगी और याचिकाकर्ता भी इसमें पूरा सहयोग करेंगे। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि हाईकोर्ट के इस आदेश का चल रही आपराधिक जांच पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। जांच एजेंसियां अपना कार्य जारी रख सकती हैं, लेकिन उनका दायरा केवल उन व्यक्तियों तक सीमित होना चाहिए जिनके खिलाफ ठोस सबूत मौजूद हैं। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि जांच की प्रक्रिया में निर्दोष अभ्यर्थियों के भविष्य के साथ कोई समझौता न हो।
कानूनी लड़ाई और भविष्य की राह
इस कानूनी प्रक्रिया में राज्य सरकार का पक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने रखा, जबकि सफल अभ्यर्थियों और याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव रंजन, गोपाल शंकर नारायण, इंद्रजीत सिन्हा और अमरीश वत्स ने दलीलें पेश कीं। झारखंड हाईकोर्ट का यह फैसला उन हजारों चयनित युवाओं के लिए एक बड़ी राहत बनकर आया है जो लंबे समय से अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे थे। अदालत ने यह साबित कर दिया है कि प्रशासनिक व्यवस्था में न्याय और कानून का शासन सर्वोपरि है। यह निर्णय उन सभी युवाओं के लिए महत्वपूर्ण है जो मेहनत के बल पर चयनित हुए थे और सामूहिक रद्दीकरण के कारण अपनी आजीविका खोने के डर में थे। अब इन अभ्यर्थियों के लिए अपनी सेवाएं शुरू करने का मार्ग प्रशस्त हो गया है और राज्य सरकार को अदालत के इन निर्देशों का पालन करना होगा।
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स्रोत: Aaj Tak, Amar Ujala





