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राजा हरिश्चंद्र 1913: भारत की पहली फीचर फिल्म कैसे बनी, जब पुरुष कलाकार ने निभाई रानी की भूमिका

1913 में दादासाहेब फाल्के की मूक फिल्म राजा हरिश्चंद्र से भारतीय सिनेमा का सफर शुरू हुआ। जानिए इस फिल्म के बनने की दिलचस्प कहानी।

पुराने मूक फिल्म दौर के कैमरे और फिल्म रील का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

सारांश

  • आज भारतीय फिल्म उद्योग हर साल बड़ी संख्या में फिल्में बनाता है, लेकिन इस सफर की शुरुआत एक मूक फिल्म से हुई थी।
  • फिल्म की कहानी सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की पौराणिक कथा पर आधारित थी, जो सत्य के लिए अपना राज्य, परिवार और सब कुछ त्याग देते हैं।
  • मूक फिल्मों के दौर में सिनेमाघर का माहौल आज से काफी अलग होता था।
  • भारतीय सिनेमा में दादासाहेब फाल्के के योगदान को सम्मान देने के लिए भारत सरकार ने उनके नाम पर दादासाहेब फाल्के पुरस्कार शुरू किया।

आज भारतीय फिल्म उद्योग हर साल बड़ी संख्या में फिल्में बनाता है, लेकिन इस सफर की शुरुआत एक मूक फिल्म से हुई थी। 1913 में दादासाहेब फाल्के की फिल्म राजा हरिश्चंद्र आई, जिसे भारत की पहली फुल-लेंथ फीचर फिल्म माना जाता है। इसी फिल्म की याद में भारतीय सिनेमा के जनक कहे जाने वाले फाल्के के नाम पर देश का सबसे बड़ा फिल्म सम्मान दिया जाता है। आइए जानते हैं इस फिल्म के बनने की कहानी।

कब और कहां रिलीज हुई

उपलब्ध स्रोतों के अनुसार राजा हरिश्चंद्र का प्रीमियर 21 अप्रैल 1913 को हुआ और 3 मई 1913 को इसे बॉम्बे के गिरगांव स्थित कोरोनेशन सिनेमैटोग्राफ एंड वैरायटी हॉल में आम दर्शकों के लिए रिलीज किया गया। यह एक मूक फिल्म थी, यानी इसमें संवाद नहीं सुनाई देते थे। कहानी समझाने के लिए पर्दे पर लिखे शीर्षक दिखाए जाते थे।

मुख्य बातें: पुराने मूक फिल्म दौर के कैमरे और फिल्म रील का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

दादासाहेब फाल्के कौन थे

दादासाहेब फाल्के का पूरा नाम धुंडीराज गोविंद फाल्के था। वे फोटोग्राफी, प्रिंटिंग और चित्रकला जैसे कई कामों से जुड़े रहे। कहा जाता है कि ईसा मसीह के जीवन पर बनी एक विदेशी फिल्म देखकर उनके मन में भारतीय पौराणिक कहानियों पर फिल्म बनाने का विचार आया। फिल्म बनाने की तकनीक सीखने के लिए वे इंग्लैंड भी गए और वहां से कैमरा और जरूरी उपकरण लेकर लौटे।

राजा हरिश्चंद्र की कहानी ही क्यों

फिल्म की कहानी सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की पौराणिक कथा पर आधारित थी, जो सत्य के लिए अपना राज्य, परिवार और सब कुछ त्याग देते हैं। यह कहानी उस समय के भारतीय दर्शकों में पहले से लोकप्रिय थी। जानी-पहचानी कहानी होने से दर्शक बिना संवाद के भी फिल्म आसानी से समझ सकते थे। आगे चलकर फाल्के ने कई और पौराणिक फिल्में भी बनाईं।

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जब पुरुष ने निभाई रानी की भूमिका

उस दौर में फिल्मों में काम करना महिलाओं के लिए सम्मानजनक नहीं माना जाता था। NDTV की रिपोर्ट के अनुसार फाल्के को रानी तारामती की भूमिका के लिए कोई महिला कलाकार नहीं मिली। आखिरकार यह भूमिका अन्ना सालुंके नाम के एक पुरुष कलाकार ने निभाई। इससे पता चलता है कि शुरुआती भारतीय सिनेमा को किन सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। बाद के वर्षों में धीरे-धीरे महिलाएं फिल्मों में आने लगीं।

फिल्म बनाने की मुश्किलें

आज की तरह तब न स्टूडियो थे, न प्रशिक्षित तकनीशियन। फाल्के ने कलाकार जुटाने से लेकर सेट तैयार करने, शूटिंग, डेवलपिंग और एडिटिंग तक का बड़ा हिस्सा खुद संभाला। उनके परिवार ने भी इस काम में साथ दिया। पैसे की कमी भी एक बड़ी चुनौती थी। इसके बावजूद उन्होंने फिल्म पूरी की और भारतीय सिनेमा की नींव रखी।

मूक फिल्म देखने का अनुभव

मूक फिल्मों के दौर में सिनेमाघर का माहौल आज से काफी अलग होता था। फिल्म के साथ कई जगह संगीतकार लाइव संगीत बजाते थे, ताकि दृश्यों का असर बढ़े। पर्दे पर दिखने वाले शीर्षक कहानी आगे बढ़ाते थे। कई दर्शक पढ़ना नहीं जानते थे, इसलिए जानी-पहचानी पौराणिक कहानियां उनके लिए समझने में आसान होती थीं। फिल्म की लंबाई भी आज की फिल्मों से काफी कम होती थी।

दर्शकों पर असर

फिल्म को दर्शकों ने खूब पसंद किया। पर्दे पर चलती-फिरती तस्वीरों में अपनी ही पौराणिक कहानी देखना लोगों के लिए नया अनुभव था। इस सफलता ने फाल्के को और फिल्में बनाने का हौसला दिया और भारत में फिल्म निर्माण एक उद्योग के रूप में आगे बढ़ा।

मूक सिनेमा से बोलती फिल्मों तक

राजा हरिश्चंद्र के बाद करीब दो दशक तक भारत में मूक फिल्में बनती रहीं। 1931 में अर्देशिर ईरानी की आलम आरा आई, जिसे भारत की पहली बोलती फिल्म माना जाता है। इसके बाद भारतीय सिनेमा में संवाद और गीत-संगीत का दौर शुरू हुआ। पहली फीचर फिल्म और पहली बोलती फिल्म, ये दोनों भारतीय सिनेमा के इतिहास के सबसे बड़े पड़ाव माने जाते हैं।

दादासाहेब फाल्के पुरस्कार

भारतीय सिनेमा में दादासाहेब फाल्के के योगदान को सम्मान देने के लिए भारत सरकार ने उनके नाम पर दादासाहेब फाल्के पुरस्कार शुरू किया। यह भारतीय सिनेमा में जीवनभर के योगदान के लिए दिया जाने वाला देश का सबसे बड़ा सम्मान है और राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में दिया जाता है।

पहली फिल्म को लेकर बहस

कुछ फिल्म इतिहासकार 1912 में आई श्री पुंडलीक को भी शुरुआती भारतीय फिल्मों में गिनते हैं। लेकिन आमतौर पर राजा हरिश्चंद्र को भारत की पहली पूरी लंबाई वाली फीचर फिल्म माना जाता है, क्योंकि इसे पूरी तरह भारतीय टीम ने बनाया था। यही वजह है कि 2013 में भारतीय सिनेमा के 100 साल का जश्न इसी फिल्म को आधार मानकर मनाया गया।

राजा हरिश्चंद्र फिल्म कब रिलीज हुई

सार्वजनिक रिलीज 3 मई 1913 को बॉम्बे के कोरोनेशन सिनेमा में हुई।

रानी तारामती की भूमिका किसने निभाई

अन्ना सालुंके ने, जो एक पुरुष कलाकार थे।

स्रोत: NDTV: How Dadasaheb Phalke made movie history with Raja Harishchandra, The Hindu: Cinema Quiz, Raja Harishchandra

लेखक

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी डेमोक्रेटिक भारत लाइव के संस्थापक, मालिक और संपादक हैं। डिजिटल मीडिया में 6 साल से अधिक के अनुभव के साथ वे मुख्य रूप से राजनीति और चुनाव की खबरें कवर करते हैं, साथ ही देश, कारोबार और खेल से जुड़ी अहम खबरों का संपादन करते हैं। वेबसाइट की संपादकीय नीति, तथ्य-जांच और प्रकाशित सामग्री की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की है।

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