भारत के त्योहारों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी विविधता और उनसे जुड़ी लोक परंपराएं हैं। दीपावली का पर्व केवल लक्ष्मी पूजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके अगले दिन उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में एक विशेष परंपरा निभाई जाती है, जिसे ‘परुआ’ या ‘परेवा’ कहा जाता है। इसे स्थानीय भाषा में ‘खाली दिन’ भी कहते हैं। साल 2026 में तिथियों के विशेष संयोग के कारण यह दिन और भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि इस बार अमावस्या का विस्तार और प्रतिपदा की शुरुआत एक अलग समय चक्र का निर्माण कर रही है।
क्या है परुआ या परेवा का अर्थ?
धार्मिक और भाषाई दृष्टि से देखें तो ‘परुआ’ शब्द संस्कृत के ‘प्रतिपदा’ शब्द का अपभ्रंश माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक माह के दो पक्षों (शुक्ल और कृष्ण) की पहली तिथि को प्रतिपदा कहा जाता है। दीपावली कार्तिक अमावस्या को मनाई जाती है और उसके अगले दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि होती है। उत्तर भारत के ग्रामीण अंचलों में इसी प्रतिपदा को परुआ या परेवा के नाम से पुकारा जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार, यह दिन विश्राम और आत्म-चिंतन का होता है, इसलिए इसे ‘खाली दिन’ की संज्ञा दी गई है।
साल 2026 में तिथियों का गणित: क्यों खास है इस बार का परुआ?
वर्ष 2026 में दीपावली और गोवर्धन पूजा के बीच तिथियों का एक विशेष अंतराल देखने को मिलेगा। द्रिक पंचांग नई दिल्ली के अनुसार, लक्ष्मी पूजा 8 नवंबर को संपन्न होगी। अमावस्या तिथि 8 नवंबर को सुबह 11:27 बजे से शुरू होकर 9 नवंबर को दोपहर 12:31 बजे तक रहेगी। इसके बाद प्रतिपदा तिथि का आरंभ होगा। इस कारण उत्तर प्रदेश और बिहार के कई इलाकों में 9 नवंबर का दिन ‘परुआ’ के रूप में मनाया जाएगा, जबकि गोवर्धन पूजा अगले दिन यानी 10 नवंबर को होगी।
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ये सभी समय नई दिल्ली के लिए प्रभावी हैं। स्थानीय पंचांग और भौगोलिक स्थिति के अनुसार अलग-अलग शहरों में समय में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है, इसलिए सटीक जानकारी के लिए अपने स्थानीय पुरोहित से परामर्श अवश्य लें।
सूप पीटना: घर से दरिद्र भगाने की अनूठी लोक प्रथा
परुआ की सुबह एक बहुत ही रोचक और प्राचीन परंपरा निभाई जाती है, जिसे ‘सूप पीटना’ कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि दिवाली की रात माता लक्ष्मी का घर में आगमन होता है, लेकिन उनके आगमन के साथ घर की पुरानी दरिद्रता और नकारात्मक ऊर्जा को बाहर निकालना भी जरूरी है। इसके लिए घर की महिलाएं सुबह ब्रह्म मुहूर्त में पुराने सूप (अनाज साफ करने वाला पात्र) को डंडे से पीटते हुए घर के कोने-कोने में जाती हैं और अंत में उसे घर की सीमा से बाहर फेंक आती हैं।
इस दौरान कुछ पारंपरिक गीत या मंत्र जैसे ‘ईश्वर पैठो, दरिद्र निकलो’ बोले जाते हैं। लोक परंपरा के अनुसार, यह क्रिया घर में सुख-समृद्धि के स्थायी निवास और दरिद्रता के विनाश का प्रतीक मानी जाती है। यह प्रथा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में इसे पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जाता है।
द्यूत क्रीड़ा: पौराणिक संदर्भ और आज की कानूनी स्थिति
परुआ के दिन ‘द्यूत क्रीड़ा’ यानी जुआ खेलने की भी एक पुरानी परंपरा रही है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव और माता पार्वती ने इस दिन द्यूत क्रीड़ा की थी, जिसमें माता पार्वती विजयी हुई थीं। इसी मान्यता के आधार पर कई लोग इस दिन को मनोरंजन के तौर पर जुआ खेलकर मनाते हैं। शास्त्रीय उल्लेखों में इसे एक प्रतीकात्मक खेल माना गया है जो भाग्य और कर्म के संतुलन को दर्शाता है।
हालांकि, यहाँ यह चेतावनी देना अत्यंत आवश्यक है कि वर्तमान समय में सार्वजनिक स्थानों पर जुआ खेलना गैरकानूनी है। कानून के अनुसार जुआ एक दंडनीय अपराध है, इसलिए धार्मिक परंपराओं के नाम पर किसी भी ऐसी गतिविधि में शामिल न हों जो कानून का उल्लंघन करती हो। परंपरा को केवल प्रतीकात्मक और पारिवारिक मनोरंजन तक ही सीमित रखना उचित है।
काम बंद रखने और मेल-मिलाप का दिन
परुआ को ‘खाली दिन’ इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन किसी भी प्रकार का व्यावसायिक कार्य या मेहनत वाला काम करना वर्जित माना जाता है। किसान अपने हल और बैलों को विश्राम देते हैं, व्यापारी अपनी दुकानों के शटर नहीं उठाते और महिलाएं भी भारी काम से बचती हैं। मान्यता है कि दिवाली की थकान के बाद यह दिन शरीर और मन को आराम देने के लिए है।
इस दिन लोग अपने रिश्तेदारों, मित्रों और पड़ोसियों के घर जाकर दिवाली की शुभकामनाएं देते हैं। यह सामाजिक एकता और आपसी भाईचारे को मजबूत करने का दिन है। लोग एक-दूसरे को मिठाई खिलाते हैं और बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेते हैं।
दीपोत्सव 2026 की महत्वपूर्ण तिथियां और मुहूर्त (नई दिल्ली)
नीचे दी गई तालिका में दीपोत्सव 2026 के मुख्य पर्वों और उनके शुभ समय का विवरण दिया गया है। कृपया ध्यान दें कि यह समय नई दिल्ली के आधार पर है।
| पर्व का नाम | तारीख (2026) | प्रमुख मुहूर्त / समय |
|---|---|---|
| धनतेरस पूजा | 6 नवंबर, शुक्रवार | शाम 6:02 से 7:57 तक |
| काली चौदस | 7 नवंबर, शनिवार | रात 11:39 से 12:31 (8 नवंबर) |
| लक्ष्मी पूजा (दिवाली) | 8 नवंबर, रविवार | शाम 5:54 से 7:50 तक |
| परुआ (खाली दिन) | 9 नवंबर, सोमवार | अमावस्या दोपहर 12:31 तक |
| गोवर्धन पूजा | 10 नवंबर, मंगलवार | सुबह 6:40 से 8:50 तक |
| भाई दूज | 11 नवंबर, बुधवार | दोपहर 1:10 से 3:20 तक |
स्थानीय परंपराओं का महत्व
भारत के हर क्षेत्र में परुआ मनाने का तरीका अलग हो सकता है। जहाँ यूपी-बिहार में सूप पीटने की प्रधानता है, वहीं कुछ अन्य क्षेत्रों में इस दिन नए अनाज की पूजा की जाती है। कुछ समुदायों में इस दिन गोवर्धन पूजा की तैयारी के रूप में आंगन को लीपने और सजाने का काम किया जाता है। परुआ का दिन हमें यह सिखाता है कि उत्सव केवल शोर-शराबे का नाम नहीं है, बल्कि यह शांति, विश्राम और अपने प्रियजनों के साथ समय बिताने का भी अवसर है।
परुआ के दिन की जाने वाली ये लोक परंपराएं हमें हमारी जड़ों से जोड़ती हैं। चाहे वह दरिद्र भगाने के लिए सूप पीटना हो या काम से छुट्टी लेकर अपनों से मिलना, ये सभी रीतियां हमारे जीवन में संतुलन बनाए रखने का संदेश देती हैं। 2026 के इस दीपोत्सव में आप भी इन परंपराओं का पालन करें और शांतिपूर्ण तरीके से इस ‘खाली दिन’ का आनंद लें।
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स्रोत: द्रिक पंचांग (नई दिल्ली के लिए गणना), प्रचलित धार्मिक ग्रंथ और लोक परंपराएं। मुहूर्त स्थान के अनुसार बदलते हैं, अपने शहर के पंचांग से पुष्टि करें।





