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दिलीप कुमार: यूसुफ खान से ट्रेजेडी किंग तक का सफर, देवदास से मुगल-ए-आजम तक यादगार किरदार और सम्मान

11 दिसंबर को हिंदी सिनेमा के ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार की जयंती है। जानिए उनका सफर और विरासत।

पुराने सिनेमा हॉल और फिल्म पोस्टर का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

सारांश

  • हिंदी सिनेमा में अभिनय की बात हो और दिलीप कुमार का नाम न आए, ऐसा मुश्किल है।
  • 1950 के दशक में दाग, देवदास और जोगन जैसी फिल्मों में गंभीर और दुखभरे किरदारों ने उन्हें ट्रेजेडी किंग की छवि दी।
  • दिलीप कुमार ने कई नए कलाकारों को सलाह और प्रोत्साहन दिया। फिल्म उद्योग के कई लोग उन्हें बड़े भाई और मार्गदर्शक के रूप में याद करते हैं।
  • लंबी बीमारी के बाद 7 जुलाई 2021 को मुंबई में 98 साल की उम्र में दिलीप कुमार का निधन हो गया।

हिंदी सिनेमा में अभिनय की बात हो और दिलीप कुमार का नाम न आए, ऐसा मुश्किल है। उन्हें ट्रेजेडी किंग कहा गया, लेकिन उन्होंने गंभीर, रोमांटिक और हल्के-फुल्के हर तरह के किरदार निभाए। कई अभिनेता उन्हें अभिनय का स्कूल मानते हैं। 11 दिसंबर को दिलीप कुमार की जयंती होती है। आइए जानते हैं उनके जीवन और सफर के बारे में।

जन्म और शुरुआती जीवन

दिलीप कुमार का जन्म 11 दिसंबर 1922 को अविभाजित भारत के पेशावर में हुआ। उनका असली नाम मोहम्मद यूसुफ खान था। उनका परिवार फलों के कारोबार से जुड़ा था और बाद में बंबई आकर बस गया। युवावस्था में उन्होंने पुणे में एक कैंटीन चलाने जैसे काम भी किए।

मुख्य बातें: पुराने सिनेमा हॉल और फिल्म पोस्टर का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

फिल्मों में प्रवेश

बॉम्बे टॉकीज की देविका रानी ने उन्हें फिल्मों में मौका दिया। स्क्रीन नाम दिलीप कुमार रखा गया। उनकी पहली फिल्म ज्वार भाटा 1944 में आई। शुरुआती फिल्मों के बाद जुगनू, शहीद और अंदाज जैसी फिल्मों से उन्हें पहचान मिली।

ट्रेजेडी किंग की छवि

1950 के दशक में दाग, देवदास और जोगन जैसी फिल्मों में गंभीर और दुखभरे किरदारों ने उन्हें ट्रेजेडी किंग की छवि दी। कहा जाता है कि लगातार ऐसे किरदार निभाने का असर उनके मन पर भी पड़ा और डॉक्टरों की सलाह पर उन्होंने हल्के किरदार भी चुनने शुरू किए। इसके बाद आजाद, कोहिनूर और राम और श्याम जैसी फिल्मों में उनका हल्का-फुल्का अंदाज भी लोगों को खूब पसंद आया।

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यादगार फिल्में

  • अंदाज (1949)
  • दाग (1952)
  • देवदास (1955)
  • नया दौर (1957)
  • मधुमती (1958)
  • मुगल-ए-आजम (1960)
  • गंगा जमुना (1961)
  • राम और श्याम (1967)
  • क्रांति (1981)
  • शक्ति (1982)
  • कर्मा (1986)
  • सौदागर (1991)

मुगल-ए-आजम में शहजादा सलीम का किरदार हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार किरदारों में गिना जाता है। गंगा जमुना का निर्माण भी उन्होंने खुद किया था।

अभिनय की शैली

दिलीप कुमार को स्वाभाविक अभिनय के लिए जाना जाता है। उस दौर में जब नाटकीय और ऊंची आवाज वाला अभिनय आम था, उन्होंने कम शब्दों, आंखों के भाव और ठहराव से किरदारों में जान डाली। उनकी संवाद अदायगी और उर्दू पर पकड़ भी मशहूर रही। बाद की पीढ़ियों के कई बड़े अभिनेताओं ने उन्हें अपनी प्रेरणा बताया है।

पुरस्कार और सम्मान

  • दाग के लिए उन्हें 1954 में पहला फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिला, जो इस श्रेणी का पहला पुरस्कार था।
  • उन्होंने सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के कुल आठ फिल्मफेयर पुरस्कार जीते।
  • भारत सरकार ने 1991 में पद्म भूषण और 2015 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया।
  • 1994 में उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिला।
  • पाकिस्तान सरकार ने 1998 में उन्हें निशान-ए-इम्तियाज से सम्मानित किया।

नए कलाकारों के मार्गदर्शक

दिलीप कुमार ने कई नए कलाकारों को सलाह और प्रोत्साहन दिया। फिल्म उद्योग के कई लोग उन्हें बड़े भाई और मार्गदर्शक के रूप में याद करते हैं।

राज्यसभा सदस्य

दिलीप कुमार 2000 से 2006 तक राज्यसभा सदस्य भी रहे। इस दौरान उन्होंने अपनी सांसद निधि से मुंबई में कई सामाजिक कामों के लिए धन दिया।

निजी जीवन

1966 में दिलीप कुमार ने अभिनेत्री सायरा बानो से शादी की। दोनों का साथ हिंदी फिल्म उद्योग की सबसे चर्चित जोड़ियों में गिना जाता है। उनकी आत्मकथा द सब्सटेंस एंड द शैडो 2014 में प्रकाशित हुई।

निधन

लंबी बीमारी के बाद 7 जुलाई 2021 को मुंबई में 98 साल की उम्र में दिलीप कुमार का निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ हुआ।

संगीत और गीत

दिलीप कुमार की फिल्मों का संगीत भी बेहद लोकप्रिय रहा। नौशाद के संगीत वाली मुगल-ए-आजम, गंगा जमुना और कोहिनूर जैसी फिल्मों के गीत आज भी सुने जाते हैं। मधुमती में सलिल चौधरी का संगीत और नया दौर में ओ.पी. नैयर के गीत भी यादगार हैं। मोहम्मद रफी और तलत महमूद जैसे गायकों ने उनके लिए कई अमर गीत गाए। एक दिलचस्प बात यह है कि दिलीप कुमार ने खुद भी फिल्म मुसाफिर में लता मंगेशकर के साथ एक गीत गाया था।

दूसरी पारी

1970 के दशक के आखिर में कुछ साल के अंतराल के बाद दिलीप कुमार ने क्रांति से वापसी की। इसके बाद वे शक्ति, मशाल, कर्मा, विधाता और सौदागर जैसी फिल्मों में परिपक्व और दमदार किरदारों में नजर आए। शक्ति में अमिताभ बच्चन के साथ उनका आमना-सामना हिंदी सिनेमा के यादगार दृश्यों में गिना जाता है। सौदागर में राज कुमार के साथ उनकी जोड़ी भी चर्चा में रही। उनकी आखिरी रिलीज फिल्म किला 1998 में आई।

विरासत

दिलीप कुमार को हिंदी सिनेमा में मेथड एक्टिंग के शुरुआती उदाहरणों में गिना जाता है, हालांकि उन्होंने किसी औपचारिक स्कूल से अभिनय नहीं सीखा था। उनकी फिल्में आज भी फिल्म संस्थानों में अभिनय के उदाहरण के तौर पर दिखाई जाती हैं।

दिलीप कुमार का असली नाम क्या था

मोहम्मद यूसुफ खान।

दिलीप कुमार को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार कब मिला

1994 में।

स्रोत: Wikipedia: Dilip Kumar, PIB: President confers Padma awards 2015, Directorate of Film Festivals: Dadasaheb Phalke Award

लेखक

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी डेमोक्रेटिक भारत लाइव के संस्थापक, मालिक और संपादक हैं। डिजिटल मीडिया में 6 साल से अधिक के अनुभव के साथ वे मुख्य रूप से राजनीति और चुनाव की खबरें कवर करते हैं, साथ ही देश, कारोबार और खेल से जुड़ी अहम खबरों का संपादन करते हैं। वेबसाइट की संपादकीय नीति, तथ्य-जांच और प्रकाशित सामग्री की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की है।

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