EC SIR Row: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की आंतरिक कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर देश में एक नया संवैधानिक व राजनीतिक विवाद छिड़ गया है। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाते हुए उनके खिलाफ दंडात्मक विधिक कार्रवाई और मुकदमा चलाने की मांग की है।
प्रशांत भूषण की यह तीखी प्रतिक्रिया मीडिया में आई उन खोजी रिपोर्टों के बाद सामने आई है, जिनमें दावा किया गया है कि निर्वाचन आयोग के दो अन्य चुनाव आयुक्तों ने बीते दस महीनों के दौरान आयोग के कई प्रशासनिक व नीतिगत फैसलों पर औपचारिक रूप से आपत्तियां दर्ज कराई थीं।
दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग ने इन दावों पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि बहुसदस्यीय आयोग में किसी भी विषय पर विचार-विमर्श के दौरान विभिन्न दृष्टिकोणों और टिप्पणियों का आना एक जीवंत व स्वस्थ संस्थागत प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा है। आयोग ने दृढ़ता से कहा है कि एसआईआर समेत सभी अंतिम नीतिगत निर्णय तीनों आयुक्तों की पूर्ण सर्वसम्मति से ही लिए गए हैं।
EC SIR Row: मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यशैली पर उठाए सवाल
सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि निर्वाचन आयोग के भीतर संस्थागत संतुलन प्रभावित हुआ है और मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका अत्यधिक प्रभावी हो गई है। उन्होंने दावा किया कि दो अन्य चुनाव आयुक्तों की असहमति को दरकिनार कर एकतरफा प्रक्रियाएं आगे बढ़ाई गईं, जो लोकतांत्रिक मर्यादाओं के प्रतिकूल हैं। इसी आधार पर उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर कानूनी मुकदमा चलाने की बात कही।
प्रशांत भूषण लंबे समय से चुनावी पारदर्शिता, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) और मतदाता सूची से जुड़े मामलों में शीर्ष अदालत में याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी करते रहे हैं। हालांकि, जानकारों का मानना है कि प्रशांत भूषण का यह बयान एक कानूनी और राजनीतिक टिप्पणी के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि किसी न्यायिक अथवा विनियामक संस्था के आधिकारिक निष्कर्ष के रूप में।
विवाद की पृष्ठभूमि: 10 महीनों में 14 औपचारिक आपत्तियों का दावा
इस समूचे घटनाक्रम की शुरुआत 23 सितंबर 2026 को प्रकाशित एक विस्तृत खोजी रिपोर्ट के बाद हुई। रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों के अंतराल में आयोग के विभिन्न आदेशों, प्रक्रियाओं और प्रस्तावों पर कम से कम 14 बार लिखित रूप से असहमति व आपत्तियां दर्ज कराई थीं।
उक्त रिपोर्ट के अनुसार, ये आपत्तियां मुख्य रूप से नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम विलोपन की शर्तें, फॉर्म-6 (Form 6) में किए गए संशोधन, डिजिटल चुनावी डेटा तक पहुंच और एसआईआर के तकनीकी व कानूनी क्रियान्वयन से जुड़ी थीं। रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया कि कुछ निर्णयों को बिना समुचित आंतरिक परामर्श के लागू किए जाने पर भी चुनाव आयुक्तों ने अपनी चिंताएं व्यक्त की थीं।
निर्वाचन आयोग का स्पष्टीकरण: आंतरिक विमर्श और अंतिम निर्णय में अंतर
इन रिपोर्टों के सार्वजनिक होने के पश्चात निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत स्थापित निर्वाचन आयोग एक बहुसदस्यीय स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है। आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों को समान विधिक गरिमा प्राप्त है।
आयोग के सूत्रों ने स्पष्ट किया कि जब भी कोई जटिल नीतिगत प्रस्ताव पटल पर आता है, तो उस पर विस्तृत नोटिंग, सवाल-जवाब और विभिन्न दृष्टिकोणों का दर्ज होना संस्थागत परिपक्वता का प्रमाण है। किसी मसौदे पर चर्चा के दौरान व्यक्त की गई टिप्पणियों को अंतिम आदेश में ‘असहमत विभाजन’ के रूप में प्रस्तुत करना भ्रामक है। निर्वाचन आयोग का कहना है कि एसआईआर की रूपरेखा से लेकर उसके धरातल पर क्रियान्वयन तक, सभी वैधानिक अधिसूचनाएं और दिशा-निर्देश तीनों आयुक्तों की साझा सहमति और दस्तखत के पश्चात ही जारी किए गए हैं।
फॉर्म-6 में संशोधन और चुनावी डेटा प्रबंधन पर क्यों है बहस?
इस विवाद का एक प्रमुख तकनीकी बिंदु नए मतदाताओं के पंजीकरण हेतु प्रयुक्त होने वाले फॉर्म-6 में किया गया कथित बदलाव है। रिपोर्टों के अनुसार, विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत फॉर्म-6 में एक नया प्रभाग जोड़कर आवेदकों से उनके माता-पिता अथवा दादा-दादी के पूर्व मतदाता विवरण की जानकारी मांगी गई थी।
आयोग के एक आयुक्त ने कथित तौर पर इस व्यवस्था पर यह तर्क देते हुए आपत्ति जताई थी कि इससे पहली बार मतदाता बनने जा रहे युवाओं के लिए पंजीकरण की प्रक्रिया अत्यधिक जटिल हो सकती है और अतिरिक्त दस्तावेजों की मांग से पात्र नागरिक अपने मताधिकार से वंचित हो सकते हैं।
इसके अतिरिक्त, मतदाता सूची के डिजिटल डेटाबेस, सूचना प्रौद्योगिकी (IT) संरचना के नियंत्रण और प्रशासनिक अधिकारों के केंद्रीकरण को लेकर भी आंतरिक पत्राचार में सवाल उठाए जाने की बात कही गई है।
सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक व्यवस्था: बिहार एसआईआर की वैधता पर मुहर
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर उपजे कानूनी विवाद को समझने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व आदेशों का संदर्भ अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्ष 2025 में बिहार में मतदाता सूची की शुद्धता, दोहरी प्रविष्टियों को हटाने और व्यापक पलायन व मौतों के कारण अद्यतन न हुई सूचियों को दुरुस्त करने के लिए एसआईआर शुरू किया गया था। इस प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विस्तृत सुनवाई के उपरांत मई 2026 में शीर्ष अदालत ने एसआईआर की संवैधानिक वैधता को पूरी तरह बरकरार रखा था।
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि संविधान के तहत मतदाता सूची की शुद्धता और सत्यनिष्ठा बनाए रखना निर्वाचन आयोग का वैधानिक कर्तव्य और अधिकार क्षेत्र है। हालांकि, न्यायालय ने यह भी अनिवार्य किया था कि किसी भी मतदाता का नाम हटाने से पूर्व प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए उसे उचित नोटिस, सुनवाई का अवसर और कारणयुक्त आदेश दिया जाना चाहिए।
EC SIR Row: निष्कर्ष
निर्वाचन आयोग और विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर उपजा यह ताजा विवाद देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं की आंतरिक पारदर्शिता और निर्णय प्रक्रिया पर एक नई बहस को जन्म दे रहा है। एक ओर जहां मीडिया रिपोर्टों और प्रशांत भूषण की टिप्पणियों ने निर्णय लेने की प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं, वहीं दूसरी ओर चुनाव आयोग का यह दृढ़ दावा कि ‘सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं’, संवैधानिक मर्यादाओं की रक्षा का संदेश देता है। आगामी दिनों में इस संवेदनशील विषय पर आयोग द्वारा जारी किए जाने वाले औपचारिक अभिलेख और प्रशासनिक स्पष्टीकरण ही इस गतिरोध की वास्तविक स्थिति को स्पष्ट करेंगे।
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