World Tribal Day:World Tribal Day:
World Tribal Day: विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर संपूर्ण देश और दुनिया में जनजातीय समाज की समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक परंपराओं और जल-जंगल-जमीन के संरक्षण के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता को नमन किया जा रहा है। यह खास दिन केवल गौरवशाली अतीत को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह उन अदम्य प्रतिभावान शख्सियतों के योगदान को रेखांकित करने का भी दिन है, जिन्होंने बेहद सीमित संसाधनों और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बीच वैश्विक पहचान बनाई है। पूर्वी भारत के खनिज और प्राकृतिक सौंदर्य से समृद्ध राज्य झारखंड की बात करें तो यहां की महिलाओं ने रूढ़िवादी सामाजिक मान्यताओं, आर्थिक विषमताओं और बुनियादी सुविधाओं के अभाव को पीछे छोड़ते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का मान बढ़ाया है। पर्यावरण संरक्षण के जन-आंदोलनों से लेकर अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं के चमकते मैदानों तक, इन जुझारू आदिवासी वीरांगनाओं ने साबित किया है कि अगर दृष्टि स्पष्ट हो और संकल्प दृढ़ हो, तो कोई भी मंजिल असंभव नहीं होती।
विश्व प्रसिद्ध पर्यावरण और मानवाधिकार आंदोलनों के साथ-साथ ओलंपिक तथा विश्व कप जैसे सर्वोच्च खेल मंचों पर झारखंड की बेटियों की धमक गूंज चुकी है। खूंटी के छोटे से गांव से निकलकर ओलंपिक के हॉकी मैदान तक पहुंचने वाली खिलाड़ी हों या जंगलों को लकड़ी माफियाओं से बचाने के लिए महिलाओं की सेना खड़ी करने वाली जुझारू नेत्री, इनकी जीवन यात्रा हर वर्ग के लिए प्रेरणा का स्रोत है। इन प्रतिभाशाली नायिकाओं ने न केवल अपने क्षेत्र का नाम रोशन किया है, बल्कि भावी पीढ़ी की लाखों युवा लड़कियों के लिए सफलता का एक मजबूत मार्ग भी प्रशस्त किया है। आइए जानते हैं झारखंड की उन पांच प्रमुख आदिवासी महिलाओं के बारे में, जिनकी ऐतिहासिक उपलब्धियों और वैश्विक पहचान ने भारत का मस्तक पूरी दुनिया में गर्व से ऊंचा कर दिया है।

World Tribal Day: दयामनी बारला: जल-जंगल-जमीन के अधिकार और सामाजिक न्याय की बुलंद आवाज

खूंटी और गुमला जिले के सघन वनों की पृष्ठभूमि से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मंचों तक अपनी गूंज पहुंचाने वाली दयामनी बारला आज जन-आंदोलन की एक सशक्त मिसाल बन चुकी हैं। जल-जंगल-जमीन के संरक्षण के लिए समर्पित दयामनी बारला ने स्थानीय आदिवासियों के विस्थापन और उनकी आजीविका के संकट के खिलाफ लगातार अहिंसक लड़ाई लड़ी है। जब दुनिया की दिग्गज इस्पात निर्माता कंपनी आर्सेलरमित्तल ने राज्य में अपने विशाल प्रोजेक्ट की योजना बनाई, तब स्थानीय निवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए दयामनी ने अभूतपूर्व जन-आंदोलन का नेतृत्व किया। उनकी अटूट निष्ठा और मजबूत नेतृत्व क्षमता के सामने अंततः औद्योगिक महाशक्ति को भी अपने कदम पीछे खींचने पड़े थे।
उनकी इसी निर्भीक पत्रकारिता, सामाजिक चेतना और मानवाधिकारों के प्रति निस्वार्थ सेवा को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्हें व्यापक सम्मान प्राप्त हुआ। वर्ष 2013 में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्था कल्चरल सर्वाइवल द्वारा उन्हें एलन लुट्ज़ इंडिजिनियस राइट्स पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ समेत दुनिया के कई प्रमुख जलवायु परिवर्तन और मानवाधिकार सम्मेलनों में स्वदेशी समुदायों के प्राकृतिक अधिकारों की बात पूरी बेबाकी से रखी है। दयामनी बारला का जीवन यह संदेश देता है कि अपनी माटी और समुदाय के प्रति गहरी निष्ठा व्यक्ति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिला सकती है।

निक्की प्रधान: ओलंपिक के हॉकी टर्फ पर झारखंड की ऐतिहासिक दस्तक

खूंटी जिले के एक बेहद छोटे और सुदूर गांव हेसेल की पगडंडियों पर कभी लकड़ी की फट्टी से हॉकी खेलने का अभ्यास करने वाली निक्की प्रधान ने जब रियो ओलंपिक 2016 के मैदान में कदम रखा, तो भारतीय खेल इतिहास में एक नया स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया। वे ओलंपिक खेलों में भारतीय महिला हॉकी टीम का प्रतिनिधित्व करने वाली झारखंड की पहली महिला आदिवासी एथलीट बनीं। इसके बाद उन्होंने वर्ष 2020 में आयोजित टोक्यो ओलंपिक में भी अपनी उत्कृष्ट खेल प्रतिभा का प्रदर्शन किया और टीम के प्रमुख स्तंभों में से एक के रूप में उभरीं।
निक्की प्रधान की ओलंपिक तक की इस ऐतिहासिक यात्रा ने झारखंड के ग्रामीण इलाकों की उन हजारों बच्चियों के सपनों को नई उड़ान दी, जो संसाधनों की कमी के कारण पीछे छूट जाती थीं। अंतरराष्ट्रीय विश्व कप प्रतियोगिताओं और एशियाई खेलों में उनके निरंतर शानदार प्रदर्शन ने यह स्थापित कर दिया कि दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर गांव के साधारण खेल मैदानों से निकलकर भी वैश्विक खेल जगत के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचा जा सकता है। उनकी यह उपलब्धि राज्य में खेल संस्कृति को नया प्रोत्साहन देने का काम कर रही है।

World Tribal Day: सलीमा टेटे: मैदान पर जादुई रफ्तार और भारतीय महिला हॉकी की नई कमान

सिमडेगा जिले के एक अत्यंत साधारण परिवार में पली-बढ़ी सलीमा टेटे आज भारतीय महिला हॉकी की सबसे चमकदार सितारा बन चुकी हैं। मैदान पर उनकी अद्भुत गति, सूझबूझ और आक्रामक ड्रिबलिंग शैली ने टोक्यो ओलंपिक के दौरान पूरी दुनिया के हॉकी विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था। विषम आर्थिक परिस्थितियों में पली-बढ़ीं सलीमा ने हर चुनौती को अपनी ताकत बनाया और बहुत कम उम्र में ही राष्ट्रीय टीम में अपनी जगह पक्की कर ली।
सलीमा टेटे की प्रतिभा और नेतृत्व क्षमता को स्वीकार करते हुए एशियाई हॉकी महासंघ ने उन्हें एशिया का एथलीट एंबेसडर नियुक्त किया, जो किसी भी भारतीय खिलाड़ी के लिए एक बहुत बड़ा सम्मान है। वर्तमान में वे भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तानी का दायित्व संभाल रही हैं और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश तथा राज्य का मान लगातार बढ़ा रही हैं। उनकी सफलता यह दर्शाती है कि प्रतिभा किसी बड़े शहर या आधुनिक सुविधाओं की मोहताज नहीं होती, बल्कि लगन से ही वैश्विक मुकाम हासिल होता है।

अष्टम उरांव: फीफा विश्व कप के मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली युवा कप्तान

गुमला जिले के बेहद छोटे से गांव बनासो की रहने वाली अष्टम उरांव ने अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल के मैदान पर वह कारनामा कर दिखाया, जिसका सपना देश का हर युवा खिलाड़ी देखता है। भारत में आयोजित फीफा अंडर-17 महिला विश्व कप 2022 में अष्टम उरांव को भारतीय राष्ट्रीय फुटबॉल टीम का कप्तान चुना गया। दुनिया के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित खेल संगठन फीफा के आधिकारिक मंच पर देश का नेतृत्व करना एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक उपलब्धि रही।
अष्टम उरांव का शुरुआती जीवन अत्यधिक गरीबी और अभावों के बीच बीता, लेकिन उनके माता-पिता के समर्थन और उनके अपने खेल के प्रति समर्पण ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया। विश्व कप जैसे बड़े आयोजन में अपनी कप्तानी से उन्होंने वैश्विक फुटबॉल बिरादरी में झारखंड की खेल प्रतिभा का लोहा मनवाया। अष्टम की यह उपलब्धि बताती है कि सही मार्गदर्शन और अवसर मिलने पर ग्रामीण क्षेत्रों की प्रतिभाएं किसी भी वैश्विक मंच पर देश की कप्तानी करने में पूरी तरह सक्षम हैं।

World Tribal Day: जमुना टुडू: ‘लेडी टार्जन’ जिन्होंने जंगलों की रक्षा के लिए बनाई महिलाओं की सेना

पूर्वी सिंहभूम जिले के जंगलों को अवैध कटाई और लकड़ी माफियाओं के चंगुल से बचाने के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाली जमुना टुडू को दुनिया सम्मान से लेडी टार्जन के नाम से जानती है। जब लकड़ी माफिया जंगलों को उजाड़ रहे थे, तब जमुना टुडू ने हार मानने के बजाय गांव की महिलाओं को एकजुट किया और ‘वन सुरक्षा समितियों’ का गठन किया। उन्होंने हजारों आदिवासी महिलाओं की एक समर्पित टीम तैयार की, जिसने दिन-रात जंगलों में गश्त लगाकर प्राकृतिक संपदा की रक्षा की।
जमुना टुडू के इस साहसी और सामुदायिक पर्यावरण संरक्षण मॉडल को देश-विदेश में बेहद सराहना मिली। वर्ष 2019 में भारत सरकार द्वारा उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से नवाजा गया। अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलनों और वनों के संरक्षण से जुड़े वैश्विक मंचों पर उनके इस स्थानीय संरक्षण मॉडल की मिसाल प्रमुखता से दी जाती है। उन्होंने यह साबित कर दिखाया कि यदि इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो आम नागरिक भी पर्यावरण रक्षा के क्षेत्र में वैश्विक स्तर का बदलाव ला सकते हैं।
झारखंड की इन पांच आदिवासी नायिकाओं की कहानियां केवल व्यक्तिगत सफलताओं का ब्योरा नहीं हैं, बल्कि यह उस सामाजिक परिवर्तन की कहानी है जो दूरदराज के गांवों से शुरू होकर अंतरराष्ट्रीय पटल तक पहुंच चुकी है। दयामनी बारला की वैचारिक क्रांति, निक्की प्रधान और सलीमा टेटे का हॉकी के मैदान में जलवा, अष्टम उरांव का फुटबॉल में नेतृत्व और जमुना टुडू का पर्यावरण संरक्षण के प्रति समर्पण यह सिद्ध करता है कि अवसर मिलने पर जनजातीय समाज की बेटियां दुनिया के हर क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा सकती हैं। विश्व आदिवासी दिवस का यह पावन अवसर हमें इन नायिकाओं के संघर्षों से प्रेरणा लेने और समाज में हर लड़की के सपनों को साकार करने के लिए एक अनुकूल वातावरण बनाने का संकल्प लेने का आह्वान करता है।

Read More Here

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *