Friday Santoshi Mata Puja Vidhi: सनातन धर्म में शुक्रवार का दिन ऐश्वर्य, सौभाग्य और शक्ति की अधिष्ठात्री देवियों की आराधना के लिए विशेष रूप से समर्पित माना जाता है। इस पावन दिन धन की देवी मां लक्ष्मी के साथ-साथ परम कल्याणकारी संतोषी माता की विधिवत पूजा और उपवास करने की एक सुदृढ़ और प्राचीन परंपरा रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, संतोषी माता भगवान श्री गणेश की पुत्री मानी जाती हैं, जिनका प्राकट्य ही भक्तों के जीवन में संतोष, धैर्य और आत्मिक शांति स्थापित करने के लिए हुआ था। जो भी भक्त सच्ची निष्ठा और पवित्र अंतःकरण से शुक्रवार के दिन माता का व्रत रखते हैं, उनके पारिवारिक जीवन के समस्त कलह, अशांति और आर्थिक संकट धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं।
संतोषी माता के व्रत की सबसे बड़ी विशेषता इसका अत्यंत सरल, आडंबरहीन और सात्विक स्वरूप है। इस पूजा में किसी अत्यंत दुर्लभ या बहुमूल्य सामग्री की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि मात्र गुड़ और भुने चने का सात्विक भोग अर्पित करके भी मां की असीम कृपा प्राप्त की जा सकती है। सामान्यतः भक्त अपनी किसी विशेष मनोकामना की पूर्ति या परिवार के कल्याण के लिए लगातार 16 शुक्रवार तक इस व्रत का पालन करने का संकल्प लेते हैं और अवधि पूर्ण होने पर विधिपूर्वक उद्यापन संपन्न करते हैं।
Friday Santoshi Mata Puja Vidhi: संतोषी माता व्रत की आवश्यक पूजा सामग्री
संतोषी माता की पूजा अत्यंत सात्विक और सुलभ सामग्री से संपन्न हो जाती है। व्रत आरंभ करने से पूर्व पूजा स्थल पर उपयोग की जाने वाली सभी सामग्रियों को स्वच्छ और शुद्ध रूप से एकत्रित कर लेना चाहिए।
पूजा के लिए एक साफ चौकी पर बिछाने के लिए लाल रंग का नया वस्त्र, संतोषी माता का चित्र या प्रतिमा, गंगाजल और शुद्ध जल से भरा एक कलश, तांबे या पीतल का दीपक, शुद्ध गाय का घी या तिल का तेल, धूपबत्ती, सुगंधित अगरबत्ती, ताजे लाल या पीले पुष्प, रोली, कुमकुम, अक्षत, रक्षासूत्र (मौली), माता के लिए लाल चुनरी, नारियल और ऋतु फल की आवश्यकता होती है। इसके साथ ही इस पूजा का सबसे मुख्य और अनिवार्य घटक शुद्ध देसी गुड़ और बिना छिलके या छिलके वाले भुने हुए चने हैं। पूजा के समय कलश के मुख पर रखने के लिए आम या अशोक के पत्ते और एक कटोरी में भरा अक्षत भी रखा जाता है।
शुक्रवार को संतोषी माता की चरणबद्ध पूजा विधि
शुक्रवार की सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर दैनिक नित्यकर्मों से निवृत्त हों और शुद्ध जल से स्नान करें। स्नान के पश्चात स्वच्छ अथवा लाल या पीले रंग के वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है। इसके उपरांत अपने घर के पूजा स्थल या ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में एक स्वच्छ चौकी स्थापित करें और उस पर लाल वस्त्र बिछाएं। चौकी पर संतोषी माता का चित्र अथवा प्रतिमा विधिवत स्थापित करें। माता की प्रतिमा के समक्ष एक जल से भरा कलश रखें, जिसके कंठ पर मौली बांधें और आम के पत्तों के ऊपर अक्षत से भरी कटोरी तथा नारियल रखें।
सर्वप्रथम दीप प्रज्वलित करें और विघ्नहर्ता भगवान गणेश का स्मरण करते हुए हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर 16 शुक्रवार के व्रत का संकल्प लें। इसके पश्चात माता संतोषी को रोली, अक्षत, कुमकुम और लाल पुष्प अर्पित करें। माता को लाल चुनरी ओढ़ाएं और धूप-दीप से उनका वंदन करें। इसके बाद एक साफ पात्र में भुने हुए चने और गुड़ का नैवेद्य माता के आगे समर्पित करें। कलश पर भी थोड़ा गुड़ और चना रखें।
भोग अर्पित करने के बाद हाथ में थोड़ा गुड़ और भुना चना लेकर श्रद्धापूर्वक संतोषी माता की संपूर्ण व्रत कथा का श्रवण अथवा पठन करें। कथा सुनते समय पूरा ध्यान माता के स्वरूप और उनके संदेश पर केंद्रित होना चाहिए। कथा संपन्न होने पर हाथ में लिए गए गुड़ और चने को कलश के जल में या गौमाता के लिए रख दें। अंत में कपूर या घी के दीपक से माता की आरती गाएं, अपनी मनोकामना के लिए प्रार्थना करें और साष्टांग प्रणाम करें। पूजा के पश्चात गुड़-चने का प्रसाद परिवार के सभी सदस्यों और भक्तों में वितरित करें तथा स्वयं भी प्रसाद ग्रहण कर दिन भर उपवास के नियमों का पालन करें।
खटाई का कड़ा निषेध: क्यों है यह व्रत का सबसे कठोर नियम?
संतोषी माता के व्रत का सबसे प्रमुख, अनिवार्य और कठोर नियम खट्टी चीजों से पूर्ण परहेज करना है। धार्मिक मान्यता और पौराणिक आख्यानों के अनुसार, शुक्रवार के दिन व्रत रखने वाले व्यक्ति को किसी भी प्रकार की खटाई जैसे नींबू, इमली, दही, छाछ, खट्टा अचार, सिरका, टमाटर, अमचूर या खट्टे फलों का सेवन भूलकर भी नहीं करना चाहिए।
परंपरागत नियमों में यहां तक कहा गया है कि व्रती को इस दिन खट्टी वस्तुओं को स्पर्श करने, उन्हें काटने या अपने हाथों से दूसरों को परोसने से भी बचना चाहिए। यदि परिवार का कोई अन्य सदस्य भी घर में भोजन कर रहा हो, तो प्रयास यह किया जाता है कि उस दिन घर की रसोई में किसी भी खट्टी वस्तु का निर्माण न हो ताकि व्रत की शुद्धता खंडित न हो सके। लोक मान्यताओं के अनुसार यदि अनजाने में भी खटाई का सेवन हो जाए, तो व्रत का फल निष्फल हो जाता है और माता कुपित हो सकती हैं। अतः इस दिन केवल मीठा या सात्विक नमकीन (बिना किसी खटास के) भोजन ही संध्या आरती के पश्चात एक समय ग्रहण करने का विधान है।
गुड़ और भुने हुए चने के भोग का आध्यात्मिक महत्व
संतोषी माता की पूजा में गुड़ और चने का भोग अर्पित करने के पीछे गहरा आध्यात्मिक और व्यावहारिक संदेश छिपा हुआ है। सनातन दर्शन में गुड़ को मिठास, सौम्यता और ऊर्जा का प्रतीक माना गया है, जबकि चना संघर्ष, पौष्टिकता और सादगी को दर्शाता है। यह प्रसाद इस बात की सीख देता है कि जीवन में जैसी भी परिस्थितियां आएं, व्यक्ति को सादगीपूर्ण जीवनशैली अपनाते हुए अपने मन में संतोष और वाणी में मिठास बनाए रखनी चाहिए।
धार्मिक कथाओं में उल्लेख मिलता है कि माता संतोषी ने स्वयं अपने भक्तों को केवल गुड़ और चने के अर्पण से प्रसन्न होकर वरदान दिया था। इससे यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए किसी आडंबर, धन-दौलत या दिखावे की आवश्यकता नहीं होती; केवल पवित्र भाव, अल्प साधन और सच्ची श्रद्धा ही सर्वोपरि है। यही कारण है कि धनी हो या निर्धन, हर वर्ग का साधक समान रूप से गुड़-चना चढ़ाकर माता का अनुग्रह प्राप्त कर सकता है।
Friday Santoshi Mata Puja Vidhi: 16 शुक्रवार के व्रत का संकल्प और उद्यापन की सही प्रक्रिया
संतोषी माता का व्रत आमतौर पर लगातार 16 शुक्रवार तक श्रद्धा और नियमपूर्वक किया जाता है। व्रत का आरंभ किसी भी शुक्ल पक्ष के पहले शुक्रवार से करना अत्यंत शुभ माना जाता है। पूरे 16 सप्ताह तक व्रती को निरंतर ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए, सत्य बोलते हुए और क्रोध से दूर रहते हुए उपवास रखना होता है। जब 16 शुक्रवार सफलतापूर्वक संपन्न हो जाते हैं, तब 17वें शुक्रवार को विधिवत उद्यापन किया जाता है।
उद्यापन के दिन सामान्य पूजा की तरह ही माता की चौकी सजाई जाती है, कलश स्थापना होती है और हवन किया जाता है। इस दिन विशेष रूप से कन्याओं और बालकों (लंगूरों) को आमंत्रित कर भोजन कराया जाता है। भोजन में खीर, पूरी, चने की मीठी सब्जी या हलवा परोसा जाता है। उद्यापन के भोजन में भी नमक या किसी प्रकार की खटाई का लेशमात्र अंश भी नहीं होना चाहिए। भोजन कराने के उपरांत बच्चों को दक्षिणा, फल और उपहार भेंट किए जाते हैं। बच्चों को यह सख्त हिदायत दी जाती है कि वे उस पूरे दिन घर जाकर भी कोई खट्टी वस्तु न खाएं। इसके पश्चात ही व्रती का 16 शुक्रवार का व्रत पूर्ण और सिद्ध माना जाता है।
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