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Ganesh Visarjan 2026: बप्पा को विदाई से पहले जानें पूजा विधि, भोग और जरूरी नियम

Ganesh Visarjan 2026

सारांश

  • Ganesh Visarjan 2026: 25 सितंबर 2026 को अनंत चतुर्दशी पर मुख्य गणेश विसर्जन होगा।
  • विसर्जन से पहले भगवान गणेश की अंतिम पूजा और आरती करें।
  • बप्पा को मोदक, लड्डू, फल और पंचमेवा का भोग अर्पित करने की परंपरा है।
  • दूर्वा और पुष्प अर्पित कर भगवान गणेश से क्षमा याचना करें।
  • ‘गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ’ के जयघोष के साथ विदाई दें।
  • विसर्जन के दौरान प्रतिमा को सम्मानपूर्वक और सावधानी से जल में प्रवाहित करें।
  • प्लास्टिक, थर्मोकोल और सिंथेटिक सजावट को जल में न डालें।
  • प्राकृतिक फूल-पत्तियों को अलग कर कम्पोस्ट किया जा सकता है।
  • स्थानीय प्रशासन द्वारा निर्धारित विसर्जन स्थल और सुरक्षा नियमों का पालन करें।
  • प्राकृतिक मिट्टी की प्रतिमा का घर पर इको-फ्रेंडली विसर्जन विकल्प भी अपनाया जा सकता है।

Ganesh Visarjan 2026: भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से प्रारंभ हुआ दस दिवसीय पावन गणेशोत्सव अब अपने चरमोत्कर्ष और भावुक विदाई की ओर अग्रसर है। वर्ष 2026 में अनंत चतुर्दशी का मुख्य पर्व शुक्रवार, 25 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा, जिस दिन देश भर में विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश की मूर्तियों का विशाल विसर्जन संपन्न होगा। हालांकि भारतीय लोक-परंपराओं और कुल-रीति के अनुसार कई श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य व संकल्प के आधार पर डेढ़ दिन, तीसरे दिन, पांचवें अथवा सातवें दिन भी बप्पा का विसर्जन संपन्न करते हैं।

सनातन धर्म में गणेश विसर्जन को केवल प्रतिमा को जल में प्रवाहित करने की बाह्य क्रिया नहीं माना गया है, बल्कि यह देवत्व के निराकार स्वरूप में लीन होने की एक अत्यंत सूक्ष्म आध्यात्मिक प्रक्रिया है। घर या पंडाल से विदा करने से पूर्व भगवान गणेश का षोडशोपचार पूजन, विशेष भोग, कर्पूर आरती, क्षमा याचना और विदाई संकल्प अनिवार्य माना गया है। इसके साथ ही वर्तमान समय में पर्यावरण संरक्षण और जलस्रोतों की पवित्रता बनाए रखने के लिए पूजा सामग्री व कृत्रिम सजावट के वैज्ञानिक व शास्त्रसम्मत निस्तारण पर विशेष बल दिया जा रहा है।

Ganesh Visarjan 2026: अनंत चतुर्दशी 25 सितंबर 2026

हिंदू पंचांग के अनुसार अनंत चतुर्दशी का पावन दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की उपासना के साथ-साथ गणपति विसर्जन का सर्वमान्य और सबसे बड़ा दिन माना जाता है। इस वर्ष 25 सितंबर को प्रात:काल से लेकर देर रात्रि तक विसर्जन के विभिन्न शुभ चौघड़िया मुहूर्त उपलब्ध रहेंगे।

धार्मिक परंपराओं के अनुसार जिन परिवारों में गणेश चतुर्थी के दिन प्रतिमा स्थापित की गई थी, वे दस दिनों तक आतिथ्य सत्कार करने के पश्चात इसी दिन अपने आराध्य को सजल नेत्रों से विदा करते हैं। विसर्जन की यह तिथि भक्तों को यह स्मरण कराती है कि जो साकार रूप में प्रकट हुआ है, उसे अंततः प्रकृति के पंचतत्वों में ही विलीन होना है।

विसर्जन से पूर्व अंतिम षोडशोपचार पूजा और भोग का विधान

भगवान गणेश को विसर्जन के लिए उठाने से पूर्व उनकी विधिवत और पूर्ण अंतिम पूजा संपन्न की जानी चाहिए। मान्यता है कि बिना पूजा और बिना भोग लगाए प्रतिमा को हिलाना अथवा स्थान से हटाना शास्त्रों में वर्जित माना गया है।

प्रातःकाल नित्यकर्म और स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर शुद्ध करें। इसके पश्चात भगवान गणेश के विग्रह पर चंदन, रोली, कुमकुम और अक्षत अर्पित करें। गणपति को अत्यंत प्रिय दूर्वा की 21 गांठें और लाल कनेर या गेंदे के ताजे पुष्प अर्पित करें।

भोग के रूप में भगवान को उनके प्रिय मोदक, बेसन या मोतीचूर के लड्डू, ऋतु फल और पंचमेवा समर्पित करें। विदाई की विशेष लोक-परंपरा के अनुसार कुछ क्षेत्रों में भगवान गणेश की हथेली पर थोड़ा दही और अक्षत (चावल) रखने की प्रथा है, जिसे यात्रा की शुभता और सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसके उपरांत संपूर्ण परिवार मिलकर धूप और कर्पूर से बप्पा की महाआरती उतारे।

क्षमा याचना और विदाई संकल्प: ‘अगले बरस तू जल्दी आ’ का जयघोष

आरती के पश्चात परिवार के सभी सदस्यों को हाथ जोड़कर भगवान श्री गणेश से पिछले दस दिनों की सेवा में जाने-अनजाने हुई किसी भी त्रुटि, भूल-चूक या सेवा में कमी के लिए क्षमा याचना करनी चाहिए। प्रार्थना करें कि विघ्नहर्ता घर के समस्त अमंगल, कष्ट और दरिद्रता को अपने साथ ले जाएं और परिवार में सुख, शांति, सद्बुद्धि व आरोग्य का वास छोड़ जाएं।

इसके बाद ‘गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ’ के श्रद्धापूर्ण उद्घोष के साथ प्रतिमा को उसके स्थान से कुछ इंच आगे की ओर खिसकाएं। इस सांकेतिक प्रक्रिया को ‘उत्थापन’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि अब देवत्व ने विसर्जन यात्रा के लिए प्रस्थान की अनुमति प्रदान कर दी है।

विसर्जन स्थल पर पालन करने योग्य शास्त्रीय नियम

प्रतिमा को विसर्जन स्थल तक पूरे सम्मान और गाजे-बाजे के साथ ले जाया जाता है। मार्ग में बप्पा के नाम का संकीर्तन होना चाहिए। विसर्जन स्थल पर पहुंचकर सीधे प्रतिमा को जल में नहीं डालना चाहिए।

जलाशय, नदी या कृत्रिम कुंड के किनारे पहुंचकर एक बार पुनः प्रतिमा को प्रणाम करें, अक्षत और सिंदूर चढ़ाएं। यदि साथ में नारियल लाया गया है, तो उसे साबुत ही विसर्जन के निमित्त प्रयोग करें। इसके उपरांत प्रतिमा को दोनों हाथों से सहारा देकर अत्यंत धीरे-धीरे, आदरपूर्वक और स्थिर जल में प्रवाहित करें। किसी भी परिस्थिति में प्रतिमा को दूर से फेंकना अथवा असावधानी से छोड़ना पूर्णतः अनुचित और अमर्यादित माना जाता है।

पर्यावरण सुरक्षा: पूजा सामग्री और प्लास्टिक सजावट का अलग निस्तारण

प्राकृतिक नदियों, झीलों और समुद्र की पारिस्थितिकी को सुरक्षित रखने के लिए विसर्जन प्रक्रिया में पर्यावरण जागरूकता का विशेष महत्व है। अक्सर देखा जाता है कि लोग प्रतिमा के साथ प्लास्टिक के फूल, थर्मोकोल, सिंथेटिक रिबन, चमकीले वस्त्र और धातु के फ्रेम भी जल में प्रवाहित कर देते हैं, जिससे जल प्रदूषण बढ़ता है और जलीय जीवों का जीवन संकट में पड़ जाता है।

शास्त्रों और आधुनिक नियमों के अनुसार विसर्जन से पूर्व प्रतिमा पर चढ़ी फूल-मालाएं, वस्त्र, मुकुट, बांस की खपच्चियां और सजावटी सामान अलग कर लेना चाहिए। प्राकृतिक फूलों और पत्तियों को एकत्र कर घर के बगीचे या गमलों में डालकर जैविक खाद (कम्पोस्ट) के रूप में परिवर्तित किया जा सकता है। प्लास्टिक, पॉलीथिन और थर्मोकोल जैसी गैर-बायोडिग्रेडेबल वस्तुओं को स्थानीय नगर निकाय के कचरा प्रबंधन तंत्र को सौंपा जाना चाहिए ताकि वे पवित्र जलस्रोतों को दूषित न करें।

घर पर इको-फ्रेंडली गणेश विसर्जन की विधि

शहरी क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों और मिट्टी की प्राकृतिक प्रतिमा (इको-फ्रेंडली गणपति) स्थापित करने वाले भक्तों के लिए घर पर विसर्जन करना सर्वोत्तम और सर्वाधिक पुण्यकारी विकल्प माना गया है। इसके लिए घर के आंगन, छत या बालकनी में एक बड़े, साफ और गहरे पात्र अथवा बाल्टी में शुद्ध जल भरें और उसमें थोड़ा सा गंगाजल व हल्दी मिला लें।

घर के मंदिर में अंतिम आरती और भोग के पश्चात प्रतिमा को ससम्मान उठाकर उस जलपात्र में धीरे से स्थापित कर दें। कुछ ही घंटों में मिट्टी की प्रतिमा पानी में पूरी तरह घुल जाएगी। इस घुली हुई पवित्र मिट्टी और जल को घर के तुलसी के पौधे को छोड़कर अन्य किसी भी फूल वाले पौधे, गमले या वृक्ष की जड़ों में विसर्जित कर दें। इस पद्धति से न तो भगवान की प्रतिमा का किसी सार्वजनिक स्थल पर अनादर होने का भय रहता है और न ही प्रकृति को कोई नुकसान पहुंचता है।

गणेश विसर्जन में इन प्रमुख गलतियों से बचें

विसर्जन के दिन कुछ विशेष सावधानियों का ध्यान रखना आवश्यक माना जाता है। सबसे प्रमुख नियम यह है कि बिना अंतिम भोग और आरती के विसर्जन यात्रा प्रारंभ न करें।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि विसर्जन के पश्चात तत्काल घर लौटकर स्नान करें और पूजा स्थल की विधिवत सफाई करें। जहां गणपति की स्थापना की गई थी, उस स्थान को रिक्त न छोड़ें; वहां एक घी का दीपक प्रज्वलित करें और कोई मांगलिक वस्तु जैसे शंख, सुपारी या कलश रखें।

इसके अतिरिक्त, स्थानीय प्रशासन और पुलिस द्वारा निर्धारित विसर्जन समय, रूट और सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन करें। नदी या समुद्र के गहरे जल में जाने का जोखिम कतई न उठाएं और केवल चिह्नित कृत्रिम विसर्जन कुंडों का ही उपयोग करें।

Ganesh Visarjan 2026: निष्कर्ष

गणेश विसर्जन का पर्व भारतीय संस्कृति की उस उदात्त भावना को प्रदर्शित करता है जहां उत्सव के चरम आनंद के बाद वैराग्य और विदाई का भाव समाहित होता है। दस दिनों तक घर के सदस्य की भांति पूजे गए मंगलमूर्ति को विदा करते समय आंखें अवश्य नम होती हैं, किंतु मन में यह अटूट विश्वास रहता है कि बप्पा अगले वर्ष पुनः नई उमंग और खुशियां लेकर पधारेंगे। वैदिक मर्यादाओं, शुद्ध अंतःकरण और पर्यावरण के प्रति सजग रहकर किया गया गणेश विसर्जन ही सच्चे अर्थों में भगवान श्री गणेश की सर्वोत्तम आराधना है।

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Netsha Singh Author at Democratic Bharat Live

लेखक

Netsha Singh

I am a Hindi News Content Writer with 1 year of experience in writing and publishing news content for digital platforms. I have previously worked with Khabar Nagari and Online Taza Khabar, along with internship experience in news content writing. I am also a YouTube Content Creator, creating content around current news, trending topics, and important developments.

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