ISF Court Symbol Case: पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम उपचुनाव से पहले चुनाव चिह्न का विवाद अब अदालत तक पहुंच गया है। इंडियन सेक्युलर फ्रंट यानी ISF ने कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका दायर कर भारतीय निर्वाचन आयोग से लिफाफा चुनाव चिह्न के आवंटन पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है। पार्टी का कहना है कि यही चिह्न उसने 2024 के लोकसभा चुनाव और अप्रैल 2026 के विधानसभा चुनाव में इस्तेमाल किया था। अब उसी चिह्न को तृणमूल कांग्रेस के बागी गुट डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस को दे दिया गया है।
नौशाद सिद्दीकी के नेतृत्व वाली ISF का तर्क है कि एक चिह्न को एक ही चुनाव में दो दलों के बीच बांटना मतदाताओं में भ्रम पैदा कर सकता है। नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर 2026 को उपचुनाव तय है। प्रचार 4 अक्टूबर को खत्म होगा। ISF ने नंदीग्राम से अपना उम्मीदवार उतारा है और वहीं बागी तृणमूल गुट भी मैदान में है। इसी वजह से लिफाफा चुनाव चिह्न का मामला दोनों पक्षों के लिए संवेदनशील बन गया है।
बुधवार को अदालत में इस याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई हुई। आयोग के वकील की ओर से समय मांगे जाने के बाद मामला गुरुवार यानी 24 सितंबर तक के लिए स्थगित कर दिया गया।
ISF Court Symbol Case: क्या है लिफाफा चुनाव चिह्न का पूरा विवाद?
ISF एक अपंजीकृत राजनीतिक दल है, लेकिन राज्य की राजनीति में वह लिफाफा चिह्न के साथ पहचान बना चुका है। पार्टी का कहना है कि उसने पिछले दो चुनाव इसी चिह्न पर लड़े। इसलिए उपचुनाव में अचानक चिह्न बदलकर अलमारी दे देना और पुराना चिह्न दूसरे दल को सौंप देना उचित नहीं है।
ISF के वकील विकास भट्टाचार्य ने अदालत में कहा कि आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के आंतरिक विवाद का निपटारा करते हुए विपक्ष के नेता रीतब्रत बनर्जी के गुट को लिफाफा चिह्न आवंटित कर दिया। उनका तर्क था कि ISF राज्य में मान्यता प्राप्त राजनीतिक ताकत के रूप में इसी चिह्न से चुनाव लड़ती रही है। इसलिए अब उसी चिह्न को किसी अन्य अपंजीकृत दल को नहीं दिया जाना चाहिए।
पार्टी ने अदालत से यह भी कहा कि लिफाफा चुनाव चिह्न पर दोनों दलों में से किसी को भी इस्तेमाल की अनुमति न दी जाए। यानी चिह्न को फ्रीज कर दिया जाए ताकि नंदीग्राम उपचुनाव में मतदाता भ्रमित न हों।
आयोग की ओर से वकील अनामिका पांडे ने इन दावों का जवाब दिया। उन्होंने कहा कि ISF पंजीकृत और मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय दल नहीं है। भाजपा या कांग्रेस जैसे दलों के विपरीत अपंजीकृत दलों को किसी एक चिह्न पर स्थायी अधिकार नहीं मिलता। आयोग के अनुसार ISF को यह चिह्न केवल पिछले दो चुनावों के लिए आवंटित किया गया था। उसके बाद चिह्न फिर से आवंटित किया जा सकता है।
नंदीग्राम और रेजीनगर उपचुनाव में यह मामला क्यों अहम है?
6 अक्टूबर के उपचुनाव दो महत्वपूर्ण सीटों पर हो रहे हैं। नंदीग्राम पूर्वी मेदिनीपुर में है और रेजीनगर दूसरी सीट है। दोनों जगह प्रचार का समय बहुत सीमित रह गया है। ऐसे में चुनाव चिह्न की पहचान मतदाताओं के लिए सीधे मायने रखती है।
ISF ने नंदीग्राम से उम्मीदवार खड़ा किया है। बागी तृणमूल गुट भी उसी सीट पर मैदान में है। अगर दोनों पक्षों के बीच चिह्न को लेकर अस्पष्टता रही तो मतदान केंद्र पर मतदाता को पुराने परिचय और नए आवंटन के बीच फर्क समझना पड़ सकता है। यही वजह है कि ISF ने चिह्न को दोनों के लिए रोकने की मांग की है।
इससे पहले 17 सितंबर 2026 को आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के दोनों धड़ों को पार्टी के मूल नाम और जोड़ा फूल चिह्न का इस्तेमाल न करने का आदेश दिया था। ममता बनर्जी गुट और रीतब्रत बनर्जी गुट, दोनों को अलग नाम और अलग चिह्न दिए गए। बागी गुट को डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस नाम के साथ लिफाफा चिह्न मिला। ISF को अलमारी चिह्न दिया गया।
अदालत में ISF ने इसी फैसले को चुनौती दी है। पार्टी का कहना है कि आयोग ने तृणमूल के आंतरिक विवाद का समाधान करते समय उस चिह्न का इस्तेमाल किया जो पहले से दूसरे दल के चुनाव प्रचार से जुड़ा हुआ था।
अदालत में दोनों पक्षों ने क्या दलीलें दीं?
बुधवार की सुनवाई में ISF की ओर से कहा गया कि दो दलों को एक ही चुनाव में एक सिंबल नहीं दिया जा सकता। वकील ने आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए और कहा कि अपंजीकृत होने के बावजूद ISF ने राज्य में लगातार इसी चिह्न से चुनाव लड़ा है। इसलिए अचानक बदलाव और दूसरे दल को आवंटन को तर्कसंगत नहीं माना जा सकता।
आयोग का पक्ष यह रहा कि कानून के मुताबिक अपंजीकृत दल के पास चिह्न सुरक्षित रखने का स्थायी अधिकार नहीं होता। चिह्न अस्थायी आवंटन के आधार पर मिलता है। पिछले दो अवसरों पर आवंटन हो चुका था, इसलिए नया आवंटन आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है।
अदालत ने आयोग के वकील के अनुरोध पर मामले की अगली सुनवाई 24 सितंबर तय की। यानी उपचुनाव से पहले ही अदालत को इस सीमित समय में यह तय करना है कि लिफाफा चुनाव चिह्न का इस्तेमाल जारी रहेगा या उस पर रोक लगेगी।
यह विवाद सिर्फ दो दलों के बीच प्रतीक का झगड़ा नहीं है। यह उस प्रक्रिया से भी जुड़ा है जिसमें आयोग आंतरिक विभाजन वाले दल को नया नाम और नया चिह्न देता है और उसी प्रक्रिया में पहले से प्रचलित चिह्न दूसरे दल के हाथ से निकल जाता है।
ISF Court Symbol Case: अब आगे क्या हो सकता है?
गुरुवार की सुनवाई में अदालत आयोग से और स्पष्टीकरण मांग सकती है। ISF चाहता है कि लिफाफा चुनाव चिह्न पर तत्काल रोक लगे और 6 अक्टूबर के उपचुनाव में इसे किसी भी पक्ष को न दिया जाए। आयोग का रुख फिलहाल यह है कि अपंजीकृत दल चिह्न पर स्थायी दावा नहीं कर सकता।
प्रचार 4 अक्टूबर को बंद हो जाएगा। इसलिए अदालत का कोई भी अंतरिम आदेश सीधे मैदान पर असर डाल सकता है। अगर चिह्न फ्रीज होता है तो दोनों पक्षों को नए प्रतीक से प्रचार करना पड़ सकता है। अगर आवंटन यथावत रहता है तो ISF को अलमारी चिह्न पर और बागी तृणमूल गुट को लिफाफा चिह्न पर चुनाव लड़ना होगा।
नंदीग्राम उपचुनाव में कई दल मैदान में हैं। ऐसे में परिचित चुनाव चिह्न मतदाता की पसंद को प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि ISF ने इसे कानूनी प्रश्न बना दिया है। पार्टी का दावा है कि वह चिह्न से जुड़ी अपनी पहचान बचाए रखना चाहती है। आयोग का दावा है कि चिह्न आवंटन उसके नियमों और अस्थायी रियायत के दायरे में है।
कलकत्ता हाईकोर्ट अब इन दोनों दावों के बीच संतुलन बैठाने वाला है। उपचुनाव नजदीक होने के कारण फैसला जितना जल्दी आएगा, मैदान पर उतनी ही स्पष्टता रहेगी। फिलहाल स्थिति यह है कि लिफाफा चुनाव चिह्न विवादित है, ISF ने रोक की मांग की है और अदालत ने मामले को अगले दिन की सुनवाई के लिए रख लिया है।
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