जैसे केंद्र में संसद के दो सदन, लोकसभा और राज्यसभा हैं, वैसे ही कुछ राज्यों में विधानमंडल के भी दो सदन होते हैं: विधानसभा और विधान परिषद। ज्यादातर राज्यों में केवल विधानसभा है, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों में दोनों सदन हैं। जानिए विधानसभा और विधान परिषद में क्या फर्क है।
राज्य विधानमंडल की संरचना
संविधान के अनुच्छेद 168 के अनुसार हर राज्य में एक विधानमंडल होगा, जिसमें राज्यपाल और एक या दो सदन होंगे। जिन राज्यों में दो सदन हैं, वहां निचला सदन विधानसभा और ऊपरी सदन विधान परिषद कहलाता है। इस समय छह राज्यों में विधान परिषद है: उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना।

विधानसभा
विधानसभा के सदस्यों यानी विधायकों को जनता सीधे वोट देकर चुनती है। अनुच्छेद 170 के अनुसार किसी विधानसभा में अधिकतम 500 और न्यूनतम 60 सदस्य हो सकते हैं, हालांकि कुछ छोटे राज्यों को इसमें छूट दी गई है। विधानसभा का सामान्य कार्यकाल पहली बैठक से पांच साल का होता है, लेकिन इसे समय से पहले भंग भी किया जा सकता है। मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद विधानसभा के प्रति जवाबदेह होते हैं, इसलिए सरकार उसी दल या गठबंधन की बनती है, जिसे विधानसभा में बहुमत हो।
विधान परिषद
विधान परिषद एक स्थायी सदन है, जो भंग नहीं होता। इसके सदस्यों का कार्यकाल छह साल होता है और हर दो साल में एक-तिहाई सदस्य रिटायर होते हैं। अनुच्छेद 171 के अनुसार परिषद के सदस्यों की संख्या विधानसभा की कुल संख्या के एक-तिहाई से ज्यादा नहीं हो सकती और कम से कम 40 होनी चाहिए। परिषद के सदस्य अलग-अलग तरीकों से चुने जाते हैं:
- लगभग एक-तिहाई सदस्य नगर निकायों, जिला परिषदों और दूसरे स्थानीय निकायों के सदस्य चुनते हैं
- लगभग एक-तिहाई सदस्य विधायक चुनते हैं
- लगभग बारहवां हिस्सा राज्य के स्नातक मतदाता चुनते हैं
- लगभग बारहवां हिस्सा माध्यमिक और उससे ऊपर के शिक्षक चुनते हैं
- बाकी सदस्य राज्यपाल साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता और समाज सेवा से जुड़े लोगों में से मनोनीत करते हैं
यह भी पढ़ें: लोकसभा चुनाव कैसे होता है: 543 सीटें, 272 का बहुमत, नामांकन से मतगणना और सरकार गठन तक पूरी प्रक्रिया | पंचायती राज व्यवस्था: तीन स्तर, ग्राम सभा के अधिकार और 73वें संविधान संशोधन की अहम बातें
अधिकारों में फर्क
विधानसभा के अधिकार विधान परिषद से ज्यादा हैं। धन विधेयक केवल विधानसभा में पेश हो सकता है और परिषद उसे ज्यादा से ज्यादा 14 दिन तक रोक सकती है। सामान्य विधेयकों पर भी परिषद केवल कुछ समय तक देरी कर सकती है, अंतिम फैसला विधानसभा का ही चलता है। मंत्रिपरिषद केवल विधानसभा के प्रति जवाबदेह है। परिषद का महत्व यह है कि वहां अनुभवी और विशेषज्ञ लोग विधेयकों पर विस्तार से चर्चा कर सकते हैं।
विधान परिषद कैसे बनती या खत्म होती है
अनुच्छेद 169 के अनुसार अगर किसी राज्य की विधानसभा विशेष बहुमत से प्रस्ताव पास करे, तो संसद कानून बनाकर उस राज्य में विधान परिषद बना या खत्म कर सकती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या विधान परिषद का सदस्य मुख्यमंत्री बन सकता है?
हां, विधान परिषद का सदस्य भी मुख्यमंत्री या मंत्री बन सकता है।
स्रोत: भारत का संविधान, विधायी विभाग, विधि एवं न्याय मंत्रालय। जानकारी अक्टूबर 2026 तक की।






टिप्पणियां (2)