भारत संघीय ढांचे वाला देश है, जिसमें केंद्र और राज्यों की अपनी-अपनी चुनी हुई सरकारें होती हैं। लेकिन संविधान में एक ऐसी व्यवस्था भी है जिसके तहत किसी राज्य की सरकार को हटाकर वहां का शासन सीधे केंद्र के हाथ में दिया जा सकता है। इसे राष्ट्रपति शासन कहा जाता है और यह संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत लगाया जाता है। इसका इस्तेमाल आजादी के बाद से सौ से ज्यादा बार हो चुका है और यह हमेशा राजनीतिक बहस का विषय रहा है।
अनुच्छेद 356 क्या कहता है
अनुच्छेद 356 के अनुसार अगर राष्ट्रपति को राज्यपाल की रिपोर्ट मिलने पर या किसी और तरीके से यह संतोष हो जाए कि उस राज्य का शासन संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं चल सकता, तो वह घोषणा करके राज्य सरकार के कार्य अपने हाथ में ले सकते हैं। व्यवहार में राष्ट्रपति यह फैसला केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह पर करते हैं। अनुच्छेद 365 के तहत अगर कोई राज्य केंद्र के दिए निर्देशों का पालन नहीं करता, तब भी यह माना जा सकता है कि वहां संवैधानिक तंत्र विफल हो गया है।

राष्ट्रपति शासन में क्या होता है
- राज्य के मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद को हटा दिया जाता है
- राज्य का प्रशासन राष्ट्रपति के नाम पर राज्यपाल चलाते हैं, जिनकी मदद के लिए सलाहकार और मुख्य सचिव होते हैं
- विधानसभा को या तो भंग कर दिया जाता है या निलंबित रखा जाता है
- राज्य के लिए कानून बनाने का अधिकार संसद के पास आ जाता है, संसद यह अधिकार राष्ट्रपति को सौंप सकती है
- राज्य का बजट भी संसद से पास होता है
- हाईकोर्ट की शक्तियों पर कोई असर नहीं पड़ता
संसद की मंजूरी और अवधि
राष्ट्रपति शासन की घोषणा को दो महीने के भीतर संसद के दोनों सदनों से मंजूरी मिलनी जरूरी है, वरना यह अपने आप खत्म हो जाती है। मंजूरी मिलने के बाद यह छह महीने तक लागू रहता है और हर छह महीने पर संसद की मंजूरी लेकर इसे बढ़ाया जा सकता है, अधिकतम तीन साल तक।
एक साल से आगे बढ़ाने के लिए 44वें संविधान संशोधन, 1978 के तहत दो अतिरिक्त शर्तें पूरी होनी चाहिए:
- पूरे देश या उस राज्य के किसी हिस्से में राष्ट्रीय आपातकाल लागू हो
- चुनाव आयोग यह प्रमाणित करे कि राज्य में विधानसभा चुनाव कराने में कठिनाई है
पंजाब और जम्मू-कश्मीर जैसे मामलों में अलग परिस्थितियों में संविधान संशोधन के जरिए इन शर्तों में छूट भी दी गई थी।
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किन हालात में लगाया जाता रहा है
- चुनाव के बाद कोई दल या गठबंधन बहुमत साबित न कर पाए और सरकार न बन सके
- सत्तारूढ़ गठबंधन टूट जाए और कोई वैकल्पिक सरकार संभव न हो
- मुख्यमंत्री इस्तीफा दे दें और कोई दूसरा नेता सरकार बनाने की स्थिति में न हो
- राज्य में कानून-व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाए
एसआर बोम्मई फैसला
अनुच्छेद 356 के इतिहास में सबसे अहम मोड़ 1994 का एसआर बोम्मई बनाम भारत संघ फैसला है। इससे पहले कई बार राजनीतिक कारणों से विपक्षी दलों की सरकारें बर्खास्त की गईं। सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने इस फैसले में कई सिद्धांत तय किए:
- राष्ट्रपति शासन की घोषणा की न्यायिक समीक्षा हो सकती है और अदालत देख सकती है कि इसके पीछे ठोस आधार था या नहीं
- किसी सरकार के पास बहुमत है या नहीं, इसका फैसला राजभवन में नहीं, विधानसभा के पटल पर शक्ति परीक्षण से होना चाहिए
- संसद की मंजूरी मिलने तक विधानसभा को भंग नहीं, सिर्फ निलंबित किया जा सकता है
- अगर अदालत घोषणा को असंवैधानिक पाती है, तो वह बर्खास्त सरकार और विधानसभा को बहाल कर सकती है
- धर्मनिरपेक्षता संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है
इस फैसले के बाद अनुच्छेद 356 के मनमाने इस्तेमाल पर काफी हद तक रोक लगी। बाद में भी अदालतों ने कुछ मामलों में राष्ट्रपति शासन की घोषणा को रद्द कर सरकारें बहाल कीं।
आयोगों की सिफारिशें
केंद्र-राज्य संबंधों पर बने सरकारिया आयोग ने 1988 में कहा था कि अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल बहुत कम, आखिरी उपाय के रूप में होना चाहिए, जब बाकी सभी विकल्प खत्म हो जाएं। बाद में पुंछी आयोग ने भी इसके संयमित इस्तेमाल और राज्य सरकार को पहले चेतावनी देने जैसी बातों पर जोर दिया। संविधान सभा में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी उम्मीद जताई थी कि यह प्रावधान एक मृत अक्षर बना रहेगा और इसका इस्तेमाल शायद ही कभी करना पड़े।
केंद्र शासित प्रदेशों में
अनुच्छेद 356 राज्यों पर लागू होता है। विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेशों, जैसे जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी, में ऐसी स्थिति के लिए उनके अपने कानूनों में अलग प्रावधान हैं, जैसे जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019।
राष्ट्रपति शासन अधिकतम कितने समय तक रह सकता है
संसद की मंजूरी से हर छह महीने पर बढ़ाकर अधिकतम तीन साल तक, एक साल के बाद 44वें संशोधन की शर्तें लागू होती हैं।
क्या राष्ट्रपति शासन को अदालत में चुनौती दी जा सकती है
हां, एसआर बोम्मई फैसले के बाद राष्ट्रपति शासन की घोषणा न्यायिक समीक्षा के दायरे में है।





