मंदिर में भगवान के दर्शन के बाद गर्भगृह के चारों ओर घूमना यानी परिक्रमा करना भारतीय पूजा परंपरा का अहम हिस्सा है। संस्कृत में इसे प्रदक्षिणा कहा जाता है। ब्रज में गोवर्धन परिक्रमा, उज्जैन में पंचकोशी यात्रा और नर्मदा परिक्रमा जैसी बड़ी परिक्रमाएं भी आस्था का केंद्र हैं। धार्मिक मान्यताओं में परिक्रमा के कुछ नियम बताए गए हैं, जैसे किस दिशा में घूमना है और किस देवता की कितनी परिक्रमा करनी है। इस लेख में प्रचलित मान्यताओं के आधार पर इन्हें समझिए।
परिक्रमा क्यों की जाती है
मान्यता है कि भगवान ब्रह्मांड के केंद्र हैं और जैसे ग्रह सूर्य के चारों ओर घूमते हैं, वैसे ही भक्त भगवान को केंद्र मानकर उनके चारों ओर घूमता है। परिक्रमा को भगवान के प्रति समर्पण और यह स्वीकार करने का प्रतीक माना जाता है कि हमारे जीवन का केंद्र ईश्वर है। एक पौराणिक कथा के अनुसार जब कार्तिकेय और गणेश में पृथ्वी की परिक्रमा की होड़ लगी, तो गणेश जी ने माता-पिता शिव-पार्वती की परिक्रमा कर कहा कि माता-पिता ही उनके लिए संपूर्ण संसार हैं। यह कथा परिक्रमा के भाव को समझाती है।

किस दिशा में करें
परिक्रमा हमेशा घड़ी की सुई की दिशा में, यानी देवता को अपने दाहिने हाथ की ओर रखते हुए की जाती है। प्रदक्षिणा शब्द में भी दक्षिण यानी दाहिने का भाव है। इसलिए परिक्रमा शुरू करते समय भगवान आपके दाहिनी ओर होने चाहिए।
किस देवता की कितनी परिक्रमा
धार्मिक ग्रंथों और लोक परंपराओं में अलग-अलग देवताओं के लिए परिक्रमा की अलग संख्या बताई गई है। प्रचलित मान्यताएं इस प्रकार हैं:
- गणेश जी: एक या तीन परिक्रमा
- भगवान विष्णु और उनके अवतार: चार परिक्रमा
- सूर्य देव: सात परिक्रमा
- देवी दुर्गा और अन्य देवियां: एक या तीन परिक्रमा
- हनुमान जी: तीन परिक्रमा
- शिवलिंग: आधी परिक्रमा
- पीपल का वृक्ष: सात या 108 परिक्रमा, खासकर शनिवार और अमावस्या पर
- तुलसी: तीन या सात परिक्रमा
अलग-अलग क्षेत्रों और संप्रदायों में यह संख्या बदल सकती है। जहां संख्या याद न हो, वहां कम से कम तीन परिक्रमा करने की परंपरा है।
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शिवलिंग की आधी परिक्रमा क्यों
शिवलिंग पर चढ़ाया गया जल जिस नाली से बाहर निकलता है, उसे जलधारी, सोमसूत्र या निर्मली कहा जाता है। मान्यता है कि इस धारा को लांघना नहीं चाहिए। इसलिए शिवलिंग की परिक्रमा जलधारी तक जाकर वापस लौटते हुए की जाती है, जिसे आधी या अर्ध परिक्रमा कहते हैं। श्रद्धालु जलधारी तक पहुंचकर उल्टी दिशा में लौटते हैं और दूसरी ओर से भी जलधारी तक आते हैं।
परिक्रमा के समय क्या करें
- परिक्रमा शुरू करने से पहले भगवान को प्रणाम करें
- मन में भगवान का नाम या मंत्र जपते रहें
- धीरे और शांत चाल से चलें, दौड़ें नहीं
- हर परिक्रमा पूरी होने पर भगवान के सामने रुककर प्रणाम करें
- परिक्रमा पूरी होने के बाद कुछ देर मंदिर में बैठने की परंपरा भी है
किन बातों से बचें
- परिक्रमा के बीच बातचीत, हंसी-मजाक या मोबाइल पर बात करने से बचें
- परिक्रमा अधूरी छोड़कर बीच में न रुकें
- दूसरे श्रद्धालुओं को धक्का न दें, भीड़ हो तो धैर्य रखें
- मंदिर के नियमों का पालन करें, कई मंदिरों में गर्भगृह के आसपास परिक्रमा की अनुमति नहीं होती
परिक्रमा का वैज्ञानिक और सामाजिक पहलू
कई लोग परिक्रमा को ध्यान का एक रूप भी मानते हैं। धीमी चाल से चलते हुए मंत्र जपने से मन एकाग्र होता है और रोजमर्रा की चिंताओं से कुछ देर के लिए दूरी बनती है। बड़ी तीर्थ परिक्रमाओं में अलग-अलग इलाकों और वर्गों के लोग साथ चलते हैं, रास्ते में भंडारे और सेवा शिविर लगते हैं। इस तरह परिक्रमा आस्था के साथ सामाजिक मेलजोल और सेवा भाव का अवसर भी बनती है। कार्तिक मास में कई तीर्थों पर परिक्रमा करने वालों की संख्या खास तौर पर बढ़ जाती है।
घर पर परिक्रमा
जिन घरों में मंदिर के चारों ओर घूमने की जगह नहीं होती, वहां अपनी जगह पर खड़े होकर दाहिनी ओर घूमते हुए परिक्रमा करने की परंपरा है। इसे आत्म प्रदक्षिणा कहा जाता है। पूजा के अंत में आरती के बाद ऐसा किया जाता है।
बड़ी परिक्रमाएं
भारत में कई प्रसिद्ध तीर्थ परिक्रमाएं हैं। मथुरा के पास गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा लगभग 21 किलोमीटर की मानी जाती है। अयोध्या में कार्तिक मास में चौदह कोसी और पंचकोसी परिक्रमा होती है। नर्मदा नदी की परिक्रमा कई महीनों में पूरी होती है। इन परिक्रमाओं में शामिल होने से पहले मौसम, स्वास्थ्य और स्थानीय प्रशासन के निर्देशों की जानकारी जरूर लें।
परिक्रमा किस दिशा में करनी चाहिए
घड़ी की सुई की दिशा में, यानी भगवान को अपने दाहिने हाथ की ओर रखते हुए।
शिवलिंग की पूरी परिक्रमा क्यों नहीं करते
मान्यता है कि शिवलिंग की जलधारी को लांघना नहीं चाहिए, इसलिए जलधारी तक जाकर लौटते हुए आधी परिक्रमा की जाती है।
यह लेख धार्मिक मान्यताओं और लोक परंपराओं पर आधारित है। डेमोक्रेटिक भारत लाइव इनकी पुष्टि नहीं करता।






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