लोकसभा में अध्यक्ष यानी स्पीकर का नाम लगभग हर कोई जानता है, लेकिन उपाध्यक्ष यानी डिप्टी स्पीकर के पद पर कम चर्चा होती है। यह पद भी संविधान में लिखा हुआ है और सदन के कामकाज में इसकी अहम भूमिका है। पिछले कुछ वर्षों में यह पद इसलिए चर्चा में रहा है क्योंकि 17वीं लोकसभा के पूरे कार्यकाल में, यानी जून 2019 से, कोई डिप्टी स्पीकर नहीं चुना गया और 18वीं लोकसभा में भी यह मुद्दा बहस का विषय बना रहा। आइए समझते हैं कि संविधान इस बारे में क्या कहता है।
संविधान में डिप्टी स्पीकर का प्रावधान
संविधान का अनुच्छेद 93 कहता है कि लोकसभा, जितनी जल्दी हो सके, अपने दो सदस्यों को क्रमशः अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनेगी। जब भी इनमें से कोई पद खाली होगा, सदन किसी अन्य सदस्य को उस पद पर चुनेगा। यानी संविधान डिप्टी स्पीकर के पद को सिर्फ वैकल्पिक नहीं मानता, बल्कि इसके चुनाव की बात करता है। हालांकि इसमें कोई निश्चित समयसीमा नहीं लिखी गई है, सिर्फ जितनी जल्दी हो सके शब्दों का इस्तेमाल हुआ है। इसी कारण यह बहस होती है कि चुनाव में देरी संवैधानिक भावना के अनुरूप है या नहीं।
अनुच्छेद 95 के अनुसार जब अध्यक्ष का पद खाली हो, तब उपाध्यक्ष उस पद के कर्तव्यों का पालन करते हैं। जब अध्यक्ष किसी बैठक से अनुपस्थित हों, तब भी उपाध्यक्ष सदन की अध्यक्षता करते हैं। इस तरह डिप्टी स्पीकर सदन के कामकाज की निरंतरता बनाए रखने की कड़ी हैं।

डिप्टी स्पीकर का चुनाव कैसे होता है
लोकसभा की प्रक्रिया एवं कार्य संचालन नियमों के तहत डिप्टी स्पीकर के चुनाव की तारीख अध्यक्ष तय करते हैं। सदस्य किसी उम्मीदवार के नाम का प्रस्ताव रखते हैं और उसका समर्थन किया जाता है। अगर एक से ज्यादा प्रस्ताव आएं तो सदन में मतदान होता है। व्यवहार में अक्सर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सहमति बनाकर उम्मीदवार चुना जाता रहा है।
चुने जाने के बाद डिप्टी स्पीकर तब तक पद पर रहते हैं जब तक वे सदन के सदस्य रहें, या इस्तीफा न दें, या सदन के तत्कालीन सदस्यों के बहुमत से पारित प्रस्ताव द्वारा हटाए न जाएं। ऐसे प्रस्ताव के लिए कम से कम 14 दिन पहले सूचना देना जरूरी होता है। डिप्टी स्पीकर अपना इस्तीफा अध्यक्ष को सौंपते हैं।
डिप्टी स्पीकर की भूमिका और अधिकार
अध्यक्ष की गैरमौजूदगी में डिप्टी स्पीकर के पास वही अधिकार होते हैं जो अध्यक्ष के पास होते हैं। वे सदन की कार्यवाही चलाते हैं, व्यवस्था बनाए रखते हैं और सदस्यों के व्यवस्था के प्रश्नों पर फैसला देते हैं। जब वे अध्यक्षता कर रहे होते हैं तो सामान्य परिस्थितियों में मतदान नहीं करते, केवल बराबर मत होने पर निर्णायक मत दे सकते हैं।
जब अध्यक्ष सदन में मौजूद हों, तब डिप्टी स्पीकर एक सामान्य सदस्य की तरह कार्यवाही में भाग ले सकते हैं, बोल सकते हैं और मतदान भी कर सकते हैं। डिप्टी स्पीकर को अक्सर संसदीय समितियों से जुड़ी जिम्मेदारियां भी दी जाती रही हैं।
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विपक्ष को पद देने की परंपरा
संविधान या नियमों में यह कहीं नहीं लिखा कि डिप्टी स्पीकर विपक्ष का होगा। लेकिन लंबे समय तक यह संसदीय परंपरा रही कि अध्यक्ष सत्ता पक्ष से और उपाध्यक्ष विपक्ष या किसी गैर-सत्ताधारी दल से चुना जाए। इसे सदन में संतुलन और सबकी भागीदारी का प्रतीक माना जाता रहा है। यह परंपरा हर बार एक जैसी नहीं रही, लेकिन कई लोकसभाओं में इसका पालन हुआ।
पद खाली रहने पर बहस क्यों
17वीं लोकसभा में डिप्टी स्पीकर का चुनाव नहीं हुआ और यह पूरे कार्यकाल खाली रहा। इसे लेकर संवैधानिक विशेषज्ञों और विपक्षी दलों ने सवाल उठाए, जबकि सरकार का पक्ष रहा कि सदन का कामकाज सुचारु रूप से चल रहा है और अध्यक्ष की गैरमौजूदगी में पीठासीन सभापतियों का पैनल अध्यक्षता करता है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा था। अध्यक्ष हर सत्र के लिए सदस्यों में से सभापतियों का एक पैनल नामित करते हैं, जो जरूरत पड़ने पर सदन चलाते हैं। लेकिन आलोचकों का तर्क है कि यह पैनल डिप्टी स्पीकर जैसे संवैधानिक पद का विकल्प नहीं है, क्योंकि अध्यक्ष का पद खाली होने की स्थिति में अनुच्छेद 95 उपाध्यक्ष को ही जिम्मेदारी देता है।
राज्यों की विधानसभाओं में भी यही व्यवस्था
संविधान का अनुच्छेद 178 राज्यों की विधानसभाओं के लिए भी अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव की ऐसी ही व्यवस्था करता है। कई राज्यों में भी उपाध्यक्ष का पद लंबे समय तक खाली रहने पर ऐसी ही बहस होती रही है।
राज्यसभा में कौन होता है
राज्यसभा में यह व्यवस्था अलग है। वहां सभापति देश के उपराष्ट्रपति होते हैं और सदन अपने सदस्यों में से एक उपसभापति चुनता है। उपसभापति, सभापति की गैरमौजूदगी में राज्यसभा की कार्यवाही चलाते हैं।
क्या डिप्टी स्पीकर का चुनाव जरूरी है
अनुच्छेद 93 कहता है कि लोकसभा जितनी जल्दी हो सके अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनेगी, लेकिन इसके लिए कोई तय समयसीमा नहीं दी गई है।
डिप्टी स्पीकर इस्तीफा किसे देते हैं
डिप्टी स्पीकर अपना इस्तीफा लोकसभा अध्यक्ष को लिखित रूप में सौंपते हैं।
स्रोत: Constitution of India (Legislative Department), The Hindu: Deputy Speaker of Lok Sabha explained





