असम की राज्य सरकार ने बहुविवाह का अभ्यास करने वाले सरकारी कर्मचारियों के विरुद्ध एक अत्यंत कड़ा और ऐतिहासिक प्रशासनिक निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में हुई कैबिनेट की बैठक में यह स्पष्ट किया गया है कि जो भी सरकारी कर्मचारी एक से अधिक विवाह करेंगे, उन्हें उनके पद से तत्काल प्रभाव से हटा दिया जाएगा। यह निर्णय राज्य में प्रशासनिक अनुशासन को सुदृढ़ करने और सामाजिक सुधारों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लिया गया है। सरकार ने इसके लिए दशकों पुराने सेवा नियमों में आवश्यक बदलाव करने की प्रक्रिया को पूर्ण कर लिया है, जिससे अब कर्मचारियों के लिए बहुविवाह करना सेवा की शर्तों का सीधा उल्लंघन माना जाएगा।

असम सेवा नियमों में महत्वपूर्ण संशोधन और कैबिनेट की मंजूरी
असम कैबिनेट ने मंगलवार को हुई अपनी महत्वपूर्ण बैठक में असम सेवा (अनुशासन एवं अपील) नियम, 1964 में संशोधन के प्रस्ताव को आधिकारिक रूप से अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी है। इस संशोधन के माध्यम से सरकार ने मौजूदा नियमों के ढांचे में व्यापक बदलाव किए हैं ताकि बहुविवाह जैसी प्रथाओं पर अंकुश लगाया जा सके। कैबिनेट के इस निर्णय के अनुसार, अब राज्य सरकार के अधीन कार्यरत कोई भी कर्मचारी यदि एक से अधिक जीवित जीवनसाथी रखता है, तो उसे गंभीर अनुशासनहीनता माना जाएगा। इस संशोधन का प्राथमिक उद्देश्य सरकारी सेवाओं में पारदर्शिता और नैतिक मानकों को उच्च बनाए रखना है।
नियम 7 में नए खंड 6 का समावेश और इसके कानूनी प्रभाव
राज्य सरकार ने कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए असम सेवा एवं अनुशासन नियमों की धारा 7 में एक नया खंड 6 जोड़ने का निर्णय लिया है। यह नया खंड विशेष रूप से बहुविवाह के मामलों से निपटने के लिए तैयार किया गया है। इस नए प्रावधान के लागू होने के बाद, यदि कोई कर्मचारी बहुविवाह का दोषी पाया जाता है, तो उसे न केवल वर्तमान नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा, बल्कि उसे भविष्य में किसी भी प्रकार की सरकारी नौकरी प्राप्त करने के लिए भी स्थायी रूप से अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा। सरकार का यह कदम यह सुनिश्चित करने के लिए है कि राज्य के प्रशासनिक ढांचे में केवल वे ही लोग रहें जो निर्धारित कानूनी और सामाजिक मानदंडों का पालन करते हैं।
कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित होने का प्रावधान
कैबिनेट के इस फैसले का प्रभाव केवल नौकरी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका दायरा और भी विस्तृत रखा गया है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया है कि बहुविवाह करने वाले कर्मचारी राज्य सरकार द्वारा संचालित किसी भी कल्याणकारी योजना का लाभ उठाने के पात्र नहीं रहेंगे। इसका अर्थ है कि सरकार द्वारा जनता के हित में चलाई जा रही विभिन्न आर्थिक और सामाजिक सहायता योजनाओं से ऐसे व्यक्तियों को बाहर कर दिया जाएगा। यह प्रतिबंध उन सभी कर्मचारियों पर लागू होगा जो सेवा नियमों के इस नए संशोधन के दायरे में आएंगे। सरकार का मानना है कि इस तरह के कड़े प्रतिबंधों से समाज में एक स्पष्ट संदेश जाएगा।
महिला सशक्तिकरण और लैंगिक न्याय की दिशा में कदम
इस निर्णय की पृष्ठभूमि में महिला सशक्तिकरण और लैंगिक न्याय की अवधारणा को प्रमुखता दी गई है। राज्य के वित्त मंत्री जयंत मल्ला बरुआ ने इस संबंध में पूर्व में जानकारी साझा की थी। उन्होंने उल्लेख किया था कि एक से अधिक विवाह करने की प्रथा महिलाओं के अधिकारों और उनके सम्मान के विरुद्ध है। लैंगिक न्याय को बढ़ावा देने के लिए यह आवश्यक है कि सरकारी तंत्र के भीतर से ही इसकी शुरुआत की जाए। वित्त मंत्री के अनुसार, कोई भी पुरुष जो एक से अधिक पत्नियां रखता है, वह सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने का नैतिक या कानूनी अधिकार नहीं रखता है। यह नीति महिलाओं को समाज में अधिक सुरक्षित और सम्मानित स्थान दिलाने के सरकार के व्यापक विजन का हिस्सा है।
सभी समुदायों पर समान रूप से लागू होंगे नए नियम
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस नीति की व्यापकता पर जोर देते हुए कहा कि यह नियम किसी विशेष धर्म या समुदाय तक सीमित नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह संशोधन समान नागरिक संहिता के सिद्धांतों के अनुरूप है और इसे सभी समुदायों पर समान रूप से लागू किया जाएगा। चाहे कर्मचारी हिंदू हो, मुस्लिम हो या ईसाई, यदि वह सरकारी सेवा में है और बहुविवाह करता है, तो उस पर ये नियम समान रूप से प्रभावी होंगे। मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया के माध्यम से भी इस फैसले की पुष्टि की और बताया कि कैबिनेट ने असम सेवा एवं अनुशासन नियमों में बदलाव कर इसे अंतिम रूप दे दिया है।
बजट घोषणा से कार्यान्वयन तक की प्रक्रिया
उल्लेखनीय है कि इस कड़े कानून का प्रस्ताव सबसे पहले जुलाई के महीने में असम के राज्य बजट के दौरान रखा गया था। बजट सत्र के दौरान सरकार ने अपनी मंशा स्पष्ट कर दी थी कि वह बहुविवाह के विरुद्ध सख्त रुख अपनाने जा रही है। जुलाई में की गई उस घोषणा को अब कैबिनेट की औपचारिक मंजूरी के साथ धरातल पर उतार दिया गया है। सरकार ने इस पूरी प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से पूरा किया है, जिसमें पहले नीतिगत घोषणा की गई और अब नियमों में विधिवत संशोधन कर इसे लागू करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया गया है। यह निर्णय असम सरकार की उस नीति का हिस्सा है जिसके तहत वह राज्य में सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने का प्रयास कर रही है।
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स्रोत: Aaj Tak





