दूध उत्पादन में हरे चारे की बड़ी भूमिका है। सर्दियों में उत्तर भारत के पशुपालकों के लिए बरसीम सबसे लोकप्रिय हरा चारा है। यह फलीदार फसल है, इसलिए इसमें प्रोटीन अच्छी मात्रा में होता है और पशु इसे बड़े चाव से खाते हैं। एक बार बोने पर नवंबर से अप्रैल तक कई बार कटाई मिलती है। फलीदार होने के कारण यह मिट्टी में नाइट्रोजन भी बढ़ाती है। इस लेख में जानिए बरसीम की खेती का पूरा तरीका।
बरसीम क्यों खास है
बरसीम को चारे की रानी भी कहा जाता है। इसका चारा मुलायम, रसीला और जल्दी पचने वाला होता है। इसे खिलाने से दुधारू पशुओं के दाने का खर्च कुछ हद तक कम हो सकता है। बरसीम के बाद बोई गई फसल को भी मिट्टी में बढ़ी नाइट्रोजन का फायदा मिलता है।

बुवाई का सही समय
उत्तर भारत में बरसीम की बुवाई का सबसे अच्छा समय अक्टूबर का पहला पखवाड़ा माना जाता है। बुवाई मध्य नवंबर तक की जा सकती है, लेकिन देर से बोने पर कटाइयों की संख्या घट जाती है। बहुत जल्दी, यानी सितंबर की गर्मी में बोने पर पौधे कमजोर रहते हैं।
मिट्टी और खेत की तैयारी
बरसीम दोमट और भारी दोमट मिट्टी में अच्छी होती है, जिसमें पानी रोकने की क्षमता हो। हल्की क्षारीय मिट्टी में भी यह उग जाती है। खेत की अच्छी जुताई करें और पाटा लगाकर समतल करें, ताकि सिंचाई का पानी हर जगह बराबर पहुंचे। खेत को छोटी क्यारियों में बांटना फायदेमंद रहता है।
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बीज और उपचार
आम तौर पर 25 से 30 किलो बीज प्रति हेक्टेयर की जरूरत होती है। जिस खेत में पहली बार बरसीम बोई जा रही हो, वहां राइजोबियम कल्चर से बीज उपचार करना बहुत जरूरी है। इससे जड़ों पर गांठें बनती हैं, जो हवा से नाइट्रोजन लेकर पौधे को देती हैं। उपचारित बीज को छाया में सुखाकर उसी दिन बोएं।
कासनी से बचाव
बरसीम के बीज में अक्सर कासनी नाम के खरपतवार के बीज मिले होते हैं। कासनी तेजी से फैलती है और चारे की गुणवत्ता खराब करती है। बीज को पानी में डालने पर कासनी और हल्के बीज ऊपर तैर आते हैं, जिन्हें निकालकर फेंक दें। हमेशा भरोसेमंद स्रोत से साफ और प्रमाणित बीज ही खरीदें।
बुवाई का तरीका
बरसीम की बुवाई का पारंपरिक तरीका है क्यारी में पानी भरकर उसके ऊपर बीज छिटकना। पानी भरे खेत में हल्का पाटा या लकड़ी चलाकर मिट्टी को गंदला कर दिया जाता है, फिर बीज छिटके जाते हैं। पानी सूखने पर बीज मिट्टी में बैठ जाते हैं और अंकुरित होते हैं। सूखे खेत में बीज छिटककर तुरंत हल्की सिंचाई करने का तरीका भी अपनाया जाता है।
सिंचाई
शुरुआत में हल्की और जल्दी जल्दी सिंचाई की जरूरत होती है, ताकि पौधे ठीक से जम जाएं। इसके बाद सर्दियों में 10 से 15 दिन और गर्मी बढ़ने पर 7 से 10 दिन के अंतर पर सिंचाई करें। हर कटाई के बाद सिंचाई करने से पौधे जल्दी दोबारा बढ़ते हैं।
कटाई
पहली कटाई बुवाई के लगभग 45 से 50 दिन बाद करें। इसके बाद हर 25 से 30 दिन पर कटाई की जा सकती है। कटाई जमीन से 5 से 7 सेंटीमीटर ऊपर करें, ताकि पौधे दोबारा फुटाव ले सकें। आम तौर पर 4 से 6 कटाइयां मिल जाती हैं। अगर बीज लेना हो, तो मार्च के बाद कटाई बंद कर फसल को फूल और बीज बनने के लिए छोड़ दें।
पशुओं को खिलाते समय सावधानी
केवल बरसीम खिलाने से पशुओं में अफारा यानी पेट फूलने की समस्या हो सकती है। इसलिए इसे सूखे भूसे या दूसरे चारे के साथ मिलाकर खिलाएं। ओस या पानी से भीगा ताजा चारा तुरंत न खिलाएं, थोड़ा मुरझाने दें।
उपज और बाजार
अच्छे प्रबंधन से बरसीम से बड़ी मात्रा में हरा चारा मिलता है, जिसकी सटीक उपज किस्म, मिट्टी और कटाइयों पर निर्भर करती है। कई गांवों में पशुपालक हरा चारा खरीदते हैं, इसलिए जिन किसानों के पास पशु कम हैं, वे चारा बेचकर भी कमाई कर सकते हैं। बरसीम के बीज की भी अच्छी मांग रहती है। बीज और चारे के ताजा भाव जानने के लिए नजदीकी मंडी या Agmarknet पोर्टल देखें।
बरसीम की प्रमुख किस्में
बरसीम की कई उन्नत किस्में उपलब्ध हैं, जैसे वरदान और मेस्कावी, जो लंबे समय से उत्तर भारत में उगाई जा रही हैं। अलग अलग राज्यों के कृषि विश्वविद्यालयों ने अपने इलाके के लिए और किस्में भी विकसित की हैं, जिनमें ज्यादा कटाइयां और रोग प्रतिरोध की क्षमता होती है। अपने इलाके के लिए किस्म चुनने में कृषि विज्ञान केंद्र की मदद लें।
बरसीम के साथ दूसरी फसल
बरसीम के साथ थोड़ी मात्रा में जई या सरसों मिलाकर बोने से पहली कटाई में ज्यादा चारा मिलता है और चारे का पोषण संतुलित रहता है। इसे मिश्रित बुवाई कहते हैं।
बरसीम की बुवाई कब करें
अक्टूबर के पहले पखवाड़े से मध्य नवंबर तक।
बरसीम का बीज दर कितना है
लगभग 25 से 30 किलो प्रति हेक्टेयर।
पहली कटाई कब करें
बुवाई के 45 से 50 दिन बाद।
कासनी खरपतवार से कैसे बचें
बीज को पानी में डालकर ऊपर तैरते बीज निकाल दें और प्रमाणित बीज लें।
स्रोत: ICAR-भारतीय चरागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान, झांसी, पशुपालन एवं डेयरी विभाग, Agmarknet मंडी भाव





