दस साल पहले जितने पैसे में महीने भर का राशन आता था, आज उतने में शायद आधा भी न आए। चीजों और सेवाओं की कीमतों में समय के साथ होने वाली इसी बढ़ोतरी को महंगाई या मुद्रास्फीति कहा जाता है। महंगाई का असर हर किसी की जेब पर पड़ता है, चाहे वह नौकरीपेशा हो, किसान हो या पेंशनभोगी। जानिए महंगाई क्या है और इसे कैसे मापा जाता है।
महंगाई का मतलब
महंगाई का मतलब है कि समय के साथ पैसे की खरीदने की ताकत कम हो जाती है। अगर किसी साल महंगाई दर 5 प्रतिशत है, तो इसका सामान्य मतलब है कि पिछले साल जो चीजें 100 रुपये में मिलती थीं, उनकी औसत कीमत लगभग 105 रुपये हो गई। थोड़ी महंगाई को अर्थव्यवस्था के बढ़ने का सामान्य हिस्सा माना जाता है, लेकिन बहुत ज्यादा महंगाई आम लोगों के लिए मुश्किल पैदा करती है।

महंगाई क्यों बढ़ती है
- मांग ज्यादा और आपूर्ति कम होना, जैसे त्योहार या खराब फसल के समय
- कच्चे तेल, खाद या कच्चे माल की कीमतें बढ़ना, जिससे उत्पादन की लागत बढ़ती है
- बाजार में पैसे की उपलब्धता बहुत ज्यादा होना
- रुपये का कमजोर होना, जिससे आयात महंगा होता है
- मौसम, युद्ध या वैश्विक संकट जैसे कारणों से आपूर्ति में रुकावट
CPI और WPI क्या हैं
भारत में महंगाई मुख्य रूप से दो सूचकांकों से मापी जाती है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी CPI बताता है कि आम उपभोक्ता जो सामान और सेवाएं खरीदते हैं, जैसे अनाज, सब्जी, कपड़े, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य, उनकी खुदरा कीमतों में कितना बदलाव हुआ। CPI के आंकड़े सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) का राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय हर महीने जारी करता है। थोक मूल्य सूचकांक यानी WPI थोक स्तर पर कीमतों का बदलाव दिखाता है, जिसे वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय जारी करता है।
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RBI महंगाई को कैसे काबू करता है
भारत में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को महंगाई को एक लक्ष्य के भीतर रखने की जिम्मेदारी दी गई है। मौजूदा व्यवस्था में यह लक्ष्य CPI महंगाई का 4 प्रतिशत है, जिसमें 2 प्रतिशत ऊपर-नीचे की गुंजाइश है। इसके लिए RBI की मौद्रिक नीति समिति रेपो रेट तय करती है, यानी वह दर जिस पर RBI बैंकों को छोटी अवधि का कर्ज देता है। महंगाई ज्यादा होने पर रेपो रेट बढ़ाया जा सकता है, जिससे कर्ज महंगे होते हैं और मांग कुछ कम होती है। महंगाई काबू में हो, तो विकास को सहारा देने के लिए दरें घटाई जा सकती हैं।
आपकी बचत पर असर
अगर आपकी बचत पर मिलने वाला ब्याज महंगाई दर से कम है, तो असल में आपके पैसे की कीमत घट रही है। इसे वास्तविक रिटर्न कहते हैं, यानी ब्याज दर में से महंगाई दर घटाकर बचा हिस्सा। इसलिए लंबे समय के लक्ष्यों, जैसे रिटायरमेंट या बच्चों की पढ़ाई, की योजना बनाते समय महंगाई को ध्यान में रखना जरूरी है। जोखिम और जरूरत के हिसाब से अलग-अलग बचत और निवेश विकल्पों में संतुलन बनाना समझदारी है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
महंगाई दर घटने का मतलब क्या कीमतें घट गईं?
नहीं, महंगाई दर घटने का मतलब है कि कीमतें पहले से धीमी रफ्तार से बढ़ रही हैं। कीमतें घटने को अपस्फीति कहते हैं।
स्रोत: सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI), भारतीय रिज़र्व बैंक। जानकारी अक्टूबर 2026 तक की।






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