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NOTA क्या है: सुप्रीम कोर्ट के फैसले से 2013 में मिला विकल्प, सबसे ज्यादा वोट NOTA को मिलें तो भी क्यों नहीं बदलता नतीजा

EVM पर सबसे नीचे दिखने वाला NOTA बटन मतदाता को किसी भी उम्मीदवार को न चुनने का विकल्प देता है। जानिए यह कैसे आया और इसका असर क्या है।

मतदान और EVM पर NOTA विकल्प का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

सारांश

  • मतदान केंद्र पर EVM के सबसे आखिरी बटन पर लिखा होता है, इनमें से कोई नहीं, यानी NOTA।
  • फैसले के कुछ ही हफ्तों बाद 2013 के आखिर में हुए पांच राज्यों, छत्तीसगढ़, मिजोरम, राजस्थान, दिल्ली और मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों में पहली बार NOTA का विकल्प दिया गया।
  • कुछ राज्य चुनाव आयोगों ने स्थानीय निकाय चुनावों में NOTA को ज्यादा असरदार बनाने के प्रयोग किए हैं।
  • 21 अगस्त 2018 को शैलेश मनुभाई परमार बनाम चुनाव आयोग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि राज्यसभा जैसे अप्रत्यक्ष चुनावों में NOTA का विकल्प नहीं दिया जा सकता, क्योंकि वहां खुली मतदान…

मतदान केंद्र पर EVM के सबसे आखिरी बटन पर लिखा होता है, इनमें से कोई नहीं, यानी NOTA। यह विकल्प उन मतदाताओं के लिए है जो मतदान तो करना चाहते हैं, लेकिन मैदान में उतरे किसी भी उम्मीदवार को पसंद नहीं करते। हर चुनाव के बाद यह आंकड़ा भी चर्चा में रहता है कि किसी सीट पर NOTA को कितने वोट मिले। लेकिन बहुत से लोगों के मन में सवाल रहता है कि अगर NOTA को सबसे ज्यादा वोट मिल जाएं तो क्या होगा।

NOTA कैसे आया

NOTA का विकल्प सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से आया। पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज यानी PUCL ने याचिका दायर कर कहा था कि जो मतदाता किसी उम्मीदवार को वोट नहीं देना चाहता, उसकी पहचान गुप्त नहीं रह पाती, क्योंकि पुराने नियमों में ऐसे मतदाता को अलग से फॉर्म भरना पड़ता था। 27 सितंबर 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने PUCL बनाम भारत संघ मामले में चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि बैलेट पेपर और EVM पर इनमें से कोई नहीं का विकल्प दिया जाए, ताकि ऐसे मतदाता की गोपनीयता बनी रहे।

अदालत ने कहा कि किसी उम्मीदवार को नकारने का अधिकार भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है और इससे राजनीतिक दलों पर साफ छवि वाले उम्मीदवार उतारने का दबाव बनेगा।

मुख्य बातें: मतदान और EVM पर NOTA विकल्प का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

पहली बार कब इस्तेमाल हुआ

फैसले के कुछ ही हफ्तों बाद 2013 के आखिर में हुए पांच राज्यों, छत्तीसगढ़, मिजोरम, राजस्थान, दिल्ली और मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों में पहली बार NOTA का विकल्प दिया गया। 2014 के लोकसभा चुनाव में यह पहली बार पूरे देश में इस्तेमाल हुआ। NOTA के लिए एक अलग चिह्न भी बनाया गया, जिसमें एक मतपत्र पर क्रॉस का निशान है।

NOTA को सबसे ज्यादा वोट मिलें तो

यही सबसे अहम सवाल है। चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार NOTA को मिले वोटों का चुनावी मूल्य नहीं होता। यानी अगर किसी सीट पर NOTA को सभी उम्मीदवारों से ज्यादा वोट मिल जाएं, तब भी जिस उम्मीदवार को सबसे ज्यादा वोट मिले हैं, वही विजेता घोषित होगा। NOTA की वजह से न तो दोबारा चुनाव होता है और न ही नतीजा बदलता है।

उदाहरण के लिए, किसी सीट पर NOTA को 40 हजार वोट मिले, उम्मीदवार A को 35 हजार और उम्मीदवार B को 30 हजार, तो उम्मीदवार A जीतेगा।

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राज्य चुनाव आयोगों का प्रयोग

कुछ राज्य चुनाव आयोगों ने स्थानीय निकाय चुनावों में NOTA को ज्यादा असरदार बनाने के प्रयोग किए हैं। 2018 में महाराष्ट्र के राज्य चुनाव आयोग ने आदेश दिया कि अगर किसी स्थानीय निकाय चुनाव में NOTA को सबसे ज्यादा वैध वोट मिलें, तो वह चुनाव रद्द कर दोबारा कराया जाएगा। हरियाणा के राज्य चुनाव आयोग ने उसी साल नगर निकाय चुनावों में NOTA को एक काल्पनिक उम्मीदवार माना। वहां नियम बना कि NOTA से कम वोट पाने वाले उम्मीदवार दोबारा होने वाले चुनाव में नहीं लड़ सकेंगे, और अगर दोबारा भी NOTA आगे रहे तो सबसे ज्यादा वोट पाने वाला असली उम्मीदवार विजेता होगा। ये नियम सिर्फ उन्हीं राज्यों के स्थानीय चुनावों पर लागू होते हैं, लोकसभा और विधानसभा चुनावों पर नहीं।

NOTA का इस्तेमाल कैसे करें

EVM पर उम्मीदवारों की सूची के बाद सबसे नीचे NOTA का बटन होता है। इसे दबाने पर बाकी वोट की तरह VVPAT मशीन की खिड़की में कुछ सेकंड के लिए NOTA की पर्ची दिखती है। वोट पूरी तरह गुप्त रहता है और मतदान अधिकारी को पता नहीं चलता कि आपने किसे वोट दिया। NOTA दबाना भी मतदान माना जाता है, इसलिए मतदाता सूची में आपके नाम के आगे मतदान का निशान लगता है।

बहस क्या है

  • समर्थकों का कहना है कि NOTA मतदाता को नाराजगी जताने का शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीका देता है
  • आलोचकों का कहना है कि नतीजे पर असर न होने के कारण यह सिर्फ प्रतीकात्मक है, इसलिए इसे राइट टू रिजेक्ट का दर्जा मिलना चाहिए
  • कुछ विशेषज्ञों का सुझाव है कि NOTA के जीतने पर दोबारा चुनाव हो और पिछले सभी उम्मीदवारों पर दोबारा लड़ने की रोक लगे
  • दूसरी ओर, बार-बार चुनाव के खर्च और प्रशासनिक बोझ को लेकर भी चिंता जताई जाती है

इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में भी याचिकाएं दायर की गई हैं, जिनमें NOTA को ज्यादा असरदार बनाने की मांग की गई है।

राज्यसभा चुनाव में NOTA नहीं

21 अगस्त 2018 को शैलेश मनुभाई परमार बनाम चुनाव आयोग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि राज्यसभा जैसे अप्रत्यक्ष चुनावों में NOTA का विकल्प नहीं दिया जा सकता, क्योंकि वहां खुली मतदान प्रणाली है और NOTA से दल-बदल रोकने की व्यवस्था कमजोर हो सकती है। NOTA सिर्फ सीधे चुनावों, जैसे लोकसभा, विधानसभा और जहां लागू हो वहां स्थानीय निकाय चुनावों में मिलता है।

NOTA कब शुरू हुआ

सुप्रीम कोर्ट के 27 सितंबर 2013 के फैसले के बाद 2013 के आखिर में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में NOTA पहली बार इस्तेमाल हुआ।

क्या NOTA की वजह से चुनाव रद्द हो सकता है

लोकसभा और विधानसभा चुनावों में नहीं। NOTA को सबसे ज्यादा वोट मिलने पर भी सबसे ज्यादा वोट वाला उम्मीदवार ही जीतता है।

स्रोत: भारत निर्वाचन आयोग, सुप्रीम कोर्ट: PUCL बनाम भारत संघ (2013)

लेखक

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी डेमोक्रेटिक भारत लाइव के संस्थापक, मालिक और संपादक हैं। डिजिटल मीडिया में 6 साल से अधिक के अनुभव के साथ वे मुख्य रूप से राजनीति और चुनाव की खबरें कवर करते हैं, साथ ही देश, कारोबार और खेल से जुड़ी अहम खबरों का संपादन करते हैं। वेबसाइट की संपादकीय नीति, तथ्य-जांच और प्रकाशित सामग्री की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की है।

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