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BREAKING: पूर्व सीजेआई वाईके सभरवाल के बेटों के खिलाफ आयकर पुनर्मूल्यांकन को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी

सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सीजेआई वाईके सभरवाल के बेटों के खिलाफ आयकर पुनर्मूल्यांकन नोटिस को सही ठहराते हुए उनकी अपीलें खारिज कर दी हैं।

BREAKING: पूर्व सीजेआई वाईके सभरवाल के बेटों के खिलाफ आयकर पुनर्मूल्यांकन को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

सारांश

  • सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश वाईके सभरवाल के बेटों चेतन और नितिन सभरवाल की आयकर विभाग के नोटिस के खिलाफ दायर अपीलों को खारिज कर दिया है।
  • भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश वाईके सभरवाल के पुत्रों, चेतन सभरवाल और नितिन सभरवाल के आयकर मूल्यांकन से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
  • इस मामले की जड़ें अक्टूबर 2007 में हुई एक शेयर बिक्री समझौते में छिपी हैं।
  • सुप्रीम कोर्ट के फैसले का एक मुख्य हिस्सा आयकर अधिनियम की धारा 147 और 148 में प्रयुक्त वाक्यांश 'रीजन टू बिलीव' की व्याख्या करना था।

सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश वाईके सभरवाल के बेटों चेतन और नितिन सभरवाल की आयकर विभाग के नोटिस के खिलाफ दायर अपीलों को खारिज कर दिया है। यह मामला 2007 के शेयर सौदों और दिल्ली में एक महंगी संपत्ति की खरीद से होने वाली आय के पुनर्मूल्यांकन से संबंधित है। अदालत ने माना कि विभाग के पास जांच रिपोर्ट के आधार पर मामले को दोबारा खोलने के पर्याप्त कारण मौजूद थे।

मामले के मुख्य बिंदु
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश वाईके सभरवाल के पुत्रों, चेतन सभरवाल और नितिन सभरवाल के आयकर मूल्यांकन से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने दोनों भाइयों द्वारा दायर की गई चार अपीलों को खारिज कर दिया है। इस अदालती आदेश के बाद आयकर विभाग के लिए वित्त वर्ष 2008-09 और 2009-10 के वित्तीय रिकॉर्ड का पुनर्मूल्यांकन करने का रास्ता साफ हो गया है। यह पूरा कानूनी विवाद दो कंपनियों के शेयरों की बिक्री और उसके बाद उन पैसों का उपयोग नई दिल्ली के सिकंदरा रोड पर एक कीमती संपत्ति खरीदने के लिए किए जाने से जुड़ा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कर अधिकारियों द्वारा की गई कार्रवाई कानून के दायरे में थी और इसके लिए उनके पास पर्याप्त आधार मौजूद थे।

सुप्रीम कोर्ट का आयकर मामले में महत्वपूर्ण निर्णय

28 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया यह निर्णय सभरवाल भाइयों और कर अधिकारियों के बीच लंबे समय से चल रही कानूनी लड़ाई में एक बड़ा मोड़ है। 31 मार्च 2015 को जारी किए गए पुनर्मूल्यांकन नोटिसों को बरकरार रखते हुए, अदालत ने आयकर विभाग के उस अधिकार की पुष्टि की है जिसके तहत नई और प्रासंगिक जानकारी मिलने पर पुराने मामलों को दोबारा खोला जा सकता है। न्यायाधीशों ने अपने फैसले में उल्लेख किया कि विभाग के पास यह मानने के उचित कारण थे कि प्रारंभिक फाइलिंग के दौरान कुछ आय का सही मूल्यांकन नहीं हो पाया था। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि आयकर अधिनियम 1961 के तहत मूल्यांकन को फिर से खोलना एक प्रक्रियात्मक कदम है जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी कर योग्य आय का सही हिसाब रखा जाए, बशर्ते इसके लिए एक तर्कसंगत आधार हो।

शेयर सौदों और कंपनियों के ट्रांजैक्शन का विवरण

इस मामले की जड़ें अक्टूबर 2007 में हुई एक शेयर बिक्री समझौते में छिपी हैं। उस समय चेतन सभरवाल, नितिन सभरवाल और दो अन्य शेयरधारकों ने पवन इम्पेक्स प्राइवेट लिमिटेड और एसवीआईआईटी सॉफ्टवेयर प्राइवेट लिमिटेड में अपनी हिस्सेदारी बेचने के लिए एक समझौता किया था। इन शेयरों को जीवाईएस रियल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड को बेचा जाना था। समझौते के अनुसार, पवन इम्पेक्स प्राइवेट लिमिटेड के शेयरों की कीमत 195 करोड़ रुपये तय की गई थी, जबकि एसवीआईआईटी सॉफ्टवेयर प्राइवेट लिमिटेड के शेयरों का मूल्य 60 करोड़ रुपये निर्धारित किया गया था। इस सौदे की शर्तों के तहत, प्रत्येक शेयरधारक को कुल बिक्री राशि का एक चौथाई हिस्सा मिलना था। बाद में आयकर विभाग ने इस पूरे ट्रांजैक्शन की गहन जांच की और पाया कि शेयरों की बिक्री से प्राप्त राशि उन कंपनियों की संपत्तियों के वास्तविक मूल्य की तुलना में बहुत अधिक थी।

सिकंदरा रोड प्रॉपर्टी और टैक्स छूट का दावा

शेयरों की बिक्री के बाद हुई जांच में यह बात सामने आई कि इस राशि का एक बड़ा हिस्सा अप्रैल 2010 में दिल्ली के सिकंदरा रोड पर एक प्रमुख आवासीय संपत्ति खरीदने के लिए उपयोग किया गया था। इसके बाद सभरवाल भाइयों ने आयकर अधिनियम की धारा 54F के तहत पूंजीगत लाभ कर से छूट का दावा किया। यह धारा करदाताओं को कुछ शर्तों के साथ आवासीय संपत्ति में निवेश करने पर कर राहत प्रदान करती है। हालांकि, आयकर विभाग ने 2007 में बेचे गए शेयरों के मूल्यांकन पर सवाल उठाए। विभाग को संदेह था कि शेयरों की बिक्री की कीमत उन कंपनियों की वास्तविक संपत्ति, जिसमें मुख्य रूप से जमीन और इमारतें शामिल थीं, के मूल्य से काफी अधिक दिखाई गई थी। विभाग का मानना था कि इस उच्च मूल्यांकन का उपयोग कर लाभ प्राप्त करने के लिए किया गया हो सकता है।

कानूनी प्रावधान और रीजन टू बिलीव की व्याख्या

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का एक मुख्य हिस्सा आयकर अधिनियम की धारा 147 और 148 में प्रयुक्त वाक्यांश ‘रीजन टू बिलीव’ की व्याख्या करना था। अदालत ने स्पष्ट किया कि नोटिस जारी करते समय निर्धारण अधिकारी के पास कर चोरी का अंतिम प्रमाण होना आवश्यक नहीं है। इसके बजाय, अधिकारी के पास ऐसी प्रासंगिक सामग्री होनी चाहिए जो किसी भी तर्कसंगत व्यक्ति को यह निष्कर्ष निकालने के लिए प्रेरित करे कि आय का मूल्यांकन छूट गया है। पीठ ने कहा कि आयकर महानिदेशक की रिपोर्ट ने अधिकारी को ऐसी ठोस सामग्री उपलब्ध कराई थी। अदालत ने यह भी कहा कि न्यायपालिका को यह नहीं देखना चाहिए कि कारण पर्याप्त हैं या नहीं, बल्कि यह देखना चाहिए कि क्या वे कारण मामले से संबंधित हैं। इस स्तर पर केवल जांच की आवश्यकता का आधार होना ही पर्याप्त माना जाता है।

आयकर विभाग की जांच रिपोर्ट और अदालती निष्कर्ष

पुनर्मूल्यांकन की अनुमति देने में जांच रिपोर्ट ने एक निर्णायक भूमिका निभाई। इस रिपोर्ट में शेयरों की बिक्री मूल्य और संपत्तियों के बुक वैल्यू के बीच के बड़े अंतर को उजागर किया गया था। आयकर विभाग का तर्क था कि शेयरों का उच्च मूल्यांकन फंड ट्रांसफर करने का एक तरीका हो सकता है ताकि बाद में कर लाभ प्राप्त किया जा सके। हालांकि चेतन सभरवाल का 2008-09 का प्रारंभिक मूल्यांकन दिसंबर 2010 में पूरा हो गया था और उस समय विभाग ने उनकी घोषित आय को स्वीकार भी कर लिया था, लेकिन महानिदेशक की रिपोर्ट से नए तथ्य सामने आने के बाद मामले की दोबारा जांच जरूरी हो गई। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि शेयर लेनदेन और संपत्ति निवेश के बीच के संबंध की गहन जांच आवश्यक है। अदालत ने यह भी साफ किया कि शेयरों की कीमत अधिक दिखाए जाने की संभावना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और इसकी सच्चाई जानना विभाग का अधिकार है।

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स्रोत: Aaj Tak

लेखक

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी डेमोक्रेटिक भारत लाइव के संस्थापक, मालिक और संपादक हैं। डिजिटल मीडिया में 6 साल से अधिक के अनुभव के साथ वे मुख्य रूप से राजनीति और चुनाव की खबरें कवर करते हैं, साथ ही देश, कारोबार और खेल से जुड़ी अहम खबरों का संपादन करते हैं। वेबसाइट की संपादकीय नीति, तथ्य-जांच और प्रकाशित सामग्री की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की है।

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