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ILO क्या है: 1919 में बना अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन, त्रिपक्षीय ढांचा, नोबेल पुरस्कार और भारत की भूमिका

काम के घंटे, मजदूरी और कामगारों के अधिकारों पर दुनिया भर के नियम बनाने वाली संस्था ILO के बारे में जानिए।

कारखाने और दफ्तर में काम करते कामगारों का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

सारांश

  • दुनिया भर में करोड़ों लोग कारखानों, खेतों, दफ्तरों और घरों में काम करते हैं।
  • ILO की सबसे बड़ी खासियत इसका त्रिपक्षीय ढांचा है। यह संयुक्त राष्ट्र की इकलौती ऐसी त्रिपक्षीय एजेंसी है, जिसमें सरकारें, नियोक्ता और कामगार, तीनों के प्रतिनिधि मिलकर फैसले लेते हैं।
  • ILO के इतिहास के अनुसार अपनी 50वीं वर्षगांठ के साल 1969 में ILO को नोबेल शांति पुरस्कार मिला।
  • ILO के इतिहास के अनुसार संगठन 1920 की गर्मियों में जिनेवा पहुंचा और फ्रांस के अल्बर्ट थॉमस इसके पहले निदेशक बने।

दुनिया भर में करोड़ों लोग कारखानों, खेतों, दफ्तरों और घरों में काम करते हैं। उनके काम के घंटे, मजदूरी, सुरक्षा और अधिकारों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मानक तय करने वाली संस्था का नाम है अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन यानी ILO। यह संयुक्त राष्ट्र से भी पुरानी संस्था है। इस लेख में जानिए ILO क्या है, यह कैसे काम करता है और भारत का इससे क्या रिश्ता है।

ILO की स्थापना

ILO की आधिकारिक जानकारी के अनुसार इसकी स्थापना 1919 में पहले विश्व युद्ध के बाद वर्साय संधि के तहत हुई। संधि के भाग 13 में इसका संविधान शामिल था। सोच यह थी कि स्थायी शांति तभी संभव है जब वह सामाजिक न्याय पर आधारित हो। ILO के इतिहास के अनुसार 1946 में यह नए बने संयुक्त राष्ट्र की विशेष एजेंसी बना।

मुख्य बातें: कारखाने और दफ्तर में काम करते कामगारों का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

मुख्यालय और सदस्य

ILO का मुख्यालय स्विट्जरलैंड के जिनेवा में है। ILO के अनुसार इसके 187 सदस्य देश हैं। दुनिया के कई क्षेत्रों में इसके क्षेत्रीय और देश कार्यालय हैं, जिनमें नई दिल्ली का कार्यालय भी शामिल है।

त्रिपक्षीय ढांचा

ILO की सबसे बड़ी खासियत इसका त्रिपक्षीय ढांचा है। यह संयुक्त राष्ट्र की इकलौती ऐसी त्रिपक्षीय एजेंसी है, जिसमें सरकारें, नियोक्ता और कामगार, तीनों के प्रतिनिधि मिलकर फैसले लेते हैं। इससे श्रम मानक तय करते समय सभी पक्षों की बात सुनी जाती है।

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ILO के मुख्य अंग

  1. अंतरराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन: हर साल जून में जिनेवा में होता है और अंतरराष्ट्रीय श्रम मानक तय करता है।
  2. गवर्निंग बॉडी: ILO की कार्यकारी परिषद, जो नीतियों और बजट पर फैसले लेती है।
  3. अंतरराष्ट्रीय श्रम कार्यालय: ILO का स्थायी सचिवालय, जिसके प्रमुख महानिदेशक होते हैं।

कन्वेंशन और सिफारिशें

ILO दो तरह के अंतरराष्ट्रीय श्रम मानक बनाता है। कन्वेंशन ऐसी अंतरराष्ट्रीय संधियां हैं, जिन्हें कोई देश अनुमोदित करे तो वह उसके लिए बाध्यकारी हो जाती हैं। सिफारिशें गैर बाध्यकारी दिशा निर्देश होती हैं। काम के घंटे, बाल श्रम, जबरन मजदूरी, समान वेतन और काम की जगह पर सुरक्षा जैसे विषयों पर ILO के कन्वेंशन हैं।

मूल सिद्धांत

ILO काम से जुड़े कुछ मूल सिद्धांतों और अधिकारों पर खास जोर देता है। इनमें संगठन बनाने और सामूहिक सौदेबाजी की आजादी, जबरन मजदूरी का खात्मा, बाल श्रम का खात्मा, भेदभाव का खात्मा और सुरक्षित तथा स्वस्थ कार्यस्थल शामिल हैं।

नोबेल शांति पुरस्कार

ILO के इतिहास के अनुसार अपनी 50वीं वर्षगांठ के साल 1969 में ILO को नोबेल शांति पुरस्कार मिला। यह संगठन के 50 साल के काम की बड़ी अंतरराष्ट्रीय मान्यता थी।

भारत और ILO

भारत ILO के संस्थापक सदस्यों में से एक है। ILO की जानकारी के अनुसार भारत 1922 से ILO की गवर्निंग बॉडी का स्थायी सदस्य है, क्योंकि उसे प्रमुख औद्योगिक देशों में गिना जाता है। भारत ने ILO के कई कन्वेंशन अनुमोदित किए हैं और नई दिल्ली में ILO का कार्यालय है।

आम कामगार के लिए क्यों अहम

ILO सीधे किसी देश में कानून लागू नहीं करता, लेकिन उसके कन्वेंशन और सिफारिशें देशों के श्रम कानूनों की दिशा तय करने में मदद करते हैं। रिपोर्टों और निगरानी व्यवस्था के जरिए यह देखा जाता है कि देश अनुमोदित कन्वेंशन का पालन कर रहे हैं या नहीं। इस तरह दुनिया भर के कामगारों के अधिकारों की रक्षा में ILO की अहम भूमिका है।

जिनेवा से मॉन्ट्रियल तक

ILO के इतिहास के अनुसार संगठन 1920 की गर्मियों में जिनेवा पहुंचा और फ्रांस के अल्बर्ट थॉमस इसके पहले निदेशक बने। दो साल से भी कम समय में 9 अंतरराष्ट्रीय श्रम कन्वेंशन और 10 सिफारिशें अपनाई गईं, जिनमें काम के घंटे, बेरोजगारी, मातृत्व सुरक्षा और न्यूनतम उम्र जैसे विषय थे। 1926 में मानकों के पालन की निगरानी के लिए विशेषज्ञों की समिति बनी, जो आज भी काम करती है। दूसरे विश्व युद्ध के खतरे को देखते हुए मई 1940 में ILO का मुख्यालय कुछ समय के लिए कनाडा के मॉन्ट्रियल ले जाया गया।

फिलाडेल्फिया घोषणा

युद्ध के दौरान 41 देशों के सरकारी, नियोक्ता और कामगार प्रतिनिधियों ने फिलाडेल्फिया घोषणा अपनाई, जिसे ILO के संविधान के साथ जोड़ा गया। ILO के अनुसार यह घोषणा आज भी संगठन के लक्ष्यों का चार्टर है। इसमें कहा गया कि श्रम कोई वस्तु नहीं है और हर इंसान को आजादी, सम्मान, आर्थिक सुरक्षा और समान अवसर की स्थिति में अपनी भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति का अधिकार है।

संगठन का विस्तार

ILO के इतिहास के अनुसार 1948 से 1970 तक अमेरिका के डेविड मोर्स महानिदेशक रहे। इस दौरान सदस्य देशों की संख्या दोगुनी हो गई और विकासशील देश बहुमत में आ गए। 1960 में जिनेवा में अंतरराष्ट्रीय श्रम अध्ययन संस्थान और 1965 में इटली के तूरिन में अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण केंद्र बना।

ILO का पूरा नाम क्या है

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन, अंग्रेजी में International Labour Organization।

ILO की स्थापना कब हुई

1919 में वर्साय संधि के तहत।

ILO का मुख्यालय कहां है

जिनेवा, स्विट्जरलैंड।

ILO को नोबेल पुरस्कार कब मिला

1969 में नोबेल शांति पुरस्कार।

स्रोत: ILO: About the ILO, ILO: History of the ILO, ILO: India and the ILO

लेखक

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी डेमोक्रेटिक भारत लाइव के संस्थापक, मालिक और संपादक हैं। डिजिटल मीडिया में 6 साल से अधिक के अनुभव के साथ वे मुख्य रूप से राजनीति और चुनाव की खबरें कवर करते हैं, साथ ही देश, कारोबार और खेल से जुड़ी अहम खबरों का संपादन करते हैं। वेबसाइट की संपादकीय नीति, तथ्य-जांच और प्रकाशित सामग्री की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की है।

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