केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत की ऊर्जा भंडारण क्षमताओं को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाने के लिए 14,500 करोड़ रुपये के वित्तीय पैकेज को अपनी स्वीकृति दे दी है। यह व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण योजना पांच वर्षों की अवधि में 92 गीगावाट ऑवर की ग्रिड-स्केल भंडारण क्षमता स्थापित करने के लक्ष्य के साथ तैयार की गई है। इस पहल के माध्यम से सरकार का उद्देश्य तीन अलग-अलग तकनीकी श्रेणियों में भंडारण बुनियादी ढांचे का विकास करना है ताकि देश के नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों को समय पर पूरा किया जा सके।

कैबिनेट का निर्णय और वित्तीय आवंटन का विवरण
प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में बुधवार, 4 नवंबर, 2026 को हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में ऊर्जा क्षेत्र के लिए एक बड़े वित्तीय प्रोत्साहन को मंजूरी दी गई। सरकार ने ग्रिड-स्केल ऊर्जा भंडारण प्रणालियों के विकास के लिए 14,500 करोड़ रुपये की व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण योजना को हरी झंडी दिखाई है। यह योजना विशेष रूप से उन परियोजनाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए बनाई गई है जो तकनीकी रूप से आवश्यक हैं लेकिन जिन्हें शुरू करने में भारी निवेश की आवश्यकता होती है। इस वित्तीय सहायता का मुख्य उद्देश्य 92 गीगावाट ऑवर की कुल भंडारण क्षमता का निर्माण करना है। यह निर्णय भारत की ऊर्जा सुरक्षा और हरित ऊर्जा की ओर बढ़ते कदमों को मजबूती प्रदान करने के लिए लिया गया है।
योजना के कार्यान्वयन की समय सीमा और लक्ष्य
सूचना और प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने नई दिल्ली में आयोजित एक मीडिया ब्रीफिंग के दौरान इस योजना के विवरण साझा किए। उन्होंने बताया कि इस योजना का कार्यान्वयन पांच वर्षों की अवधि के लिए किया जाएगा। योजना की समय सीमा वित्त वर्ष 2026-27 से शुरू होकर वित्त वर्ष 2030-31 तक निर्धारित की गई है। पांच साल का यह रोडमैप ऊर्जा क्षेत्र के हितधारकों को एक स्पष्ट दिशा प्रदान करता है। यह समय सीमा भारत के उस बड़े लक्ष्य के साथ मेल खाती है जिसके तहत देश ने वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता हासिल करने का संकल्प लिया है। इस अवधि के दौरान भंडारण प्रणालियों का विकास ग्रिड की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक होगा।
विभिन्न प्रौद्योगिकियों के बीच क्षमता का विभाजन
कैबिनेट द्वारा स्वीकृत 92 गीगावाट ऑवर की कुल क्षमता को तीन प्रमुख तकनीकी श्रेणियों में विभाजित किया गया है ताकि संतुलित विकास सुनिश्चित हो सके। पहली श्रेणी बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली की है, जिसके लिए 30 गीगावाट ऑवर की क्षमता आवंटित की गई है। बैटरी भंडारण प्रणालियां ग्रिड में बिजली की आपूर्ति और मांग के बीच तत्काल संतुलन बनाने के लिए जानी जाती हैं। दूसरी श्रेणी पंप्ड स्टोरेज प्रोजेक्ट्स की है, जो इस योजना का सबसे बड़ा हिस्सा है और इसके लिए 60 गीगावाट ऑवर की क्षमता तय की गई है। यह तकनीक बड़े पैमाने पर ऊर्जा संचय करने का एक विश्वसनीय माध्यम है। तीसरी श्रेणी में उभरती हुई भंडारण प्रौद्योगिकियों को शामिल किया गया है, जिसके लिए 2 गीगावाट की क्षमता निर्धारित की गई है। यह विभाजन भविष्य की नई तकनीकों को अपनाने की सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों के लिए रणनीतिक आवश्यकता
भारत ने वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन का एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। चूंकि सौर और पवन ऊर्जा जैसे स्रोत निरंतर बिजली उत्पादन नहीं करते हैं, इसलिए ग्रिड-स्केल भंडारण प्रणालियों की भूमिका अनिवार्य हो जाती है। जब नवीकरणीय स्रोतों से बिजली का उत्पादन अधिक होता है, तो यह प्रणालियां उस अतिरिक्त ऊर्जा को स्टोर कर लेती हैं। बाद में, जब मांग अधिक होती है या उत्पादन कम होता है, तो इस संग्रहीत बिजली का उपयोग किया जा सकता है। 14,500 करोड़ रुपये की यह योजना इसी आवश्यकता को पूरा करने की दिशा में एक रणनीतिक कदम है। यह सुनिश्चित करेगा कि नवीकरणीय ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा बर्बाद न हो और ग्रिड पर दबाव कम रहे।
व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण का महत्व और प्रभाव
व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण एक ऐसा तंत्र है जो उन बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को सहारा देता है जो आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकती हैं। ऊर्जा भंडारण के क्षेत्र में उच्च प्रारंभिक लागत अक्सर निवेशकों के लिए एक बाधा बनती है। सरकार द्वारा प्रदान किया जाने वाला यह 14,500 करोड़ रुपये का फंड इस वित्तीय अंतर को कम करेगा, जिससे निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के लिए इन परियोजनाओं में निवेश करना आसान हो जाएगा। मंत्री अश्विनी वैष्णव ने स्पष्ट किया कि यह योजना न केवल भंडारण क्षमता बढ़ाएगी बल्कि देश में नई ऊर्जा तकनीकों के विकास को भी गति देगी। इससे आने वाले वर्षों में भारत की ऊर्जा प्रणाली अधिक लचीली और टिकाऊ बनेगी, जो अंततः उपभोक्ताओं को विश्वसनीय बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करेगी।
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स्रोत: The Hindu





