आलू भारत की सबसे ज्यादा उगाई और खाई जाने वाली सब्जी फसलों में से एक है। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, गुजरात, पंजाब और मध्य प्रदेश इसके बड़े उत्पादक राज्य हैं। उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में अक्टूबर और नवंबर आलू की बुवाई का मुख्य समय होता है। सही समय पर बुवाई, स्वस्थ बीज और रोगों से बचाव पर ध्यान दिया जाए तो किसान अच्छी पैदावार और बेहतर दाम पा सकते हैं। इस लेख में ICAR के केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान की सलाह के आधार पर आलू की खेती की पूरी जानकारी दी गई है।
बुवाई का सही समय
उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में अगेती फसल की बुवाई सितंबर के आखिर से अक्टूबर की शुरुआत तक होती है। मुख्य फसल की बुवाई मध्य अक्टूबर से मध्य नवंबर तक की जाती है। बुवाई के समय दिन का तापमान लगभग 30 डिग्री से कम और रात का तापमान ठंडा होना चाहिए। बहुत गर्मी में बोने से बीज सड़ने का खतरा रहता है, जबकि देर से बोने पर फसल पाले और पछेती झुलसा की चपेट में ज्यादा आती है।

मिट्टी और खेत की तैयारी
आलू के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है। मिट्टी भुरभुरी होनी चाहिए ताकि कंद आसानी से बढ़ सकें। खेत की दो तीन बार जुताई कर पाटा लगाएं। आखिरी जुताई से पहले अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाएं। खाद की मात्रा मिट्टी जांच के आधार पर तय करना सबसे अच्छा रहता है।
उन्नत किस्में
केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान ने कई कुफरी किस्में विकसित की हैं।
- कुफरी ज्योति: मैदानी और पहाड़ी दोनों इलाकों के लिए
- कुफरी बहार: उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में लोकप्रिय
- कुफरी पुखराज: जल्दी तैयार होने वाली, अच्छी पैदावार
- कुफरी बादशाह: बड़े कंद वाली किस्म
- कुफरी चिप्सोना: चिप्स और प्रोसेसिंग उद्योग के लिए
अपने इलाके के लिए किस्म चुनने से पहले कृषि विज्ञान केंद्र या जिला कृषि अधिकारी से सलाह जरूर लें।
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बीज और बुवाई
बीज के लिए 30 से 50 ग्राम वजन वाले स्वस्थ, रोगमुक्त और अंकुरित कंद चुनें। आम तौर पर 25 से 30 क्विंटल बीज प्रति हेक्टेयर की जरूरत होती है, जो कंद के आकार पर निर्भर करता है। कोल्ड स्टोरेज से निकाले बीज को बुवाई से पहले 8 से 10 दिन छायादार और हवादार जगह पर फैलाकर रखें, ताकि अंकुर निकल आएं। कतार से कतार की दूरी लगभग 60 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी लगभग 20 सेंटीमीटर रखें। बीज उपचार के लिए कृषि विभाग की सलाह के अनुसार फफूंदनाशक का इस्तेमाल करें।
मेड़ चढ़ाना और सिंचाई
बुवाई के 25 से 30 दिन बाद, जब पौधे 15 से 20 सेंटीमीटर के हो जाएं, तो निराई कर पौधों पर मिट्टी चढ़ाएं। इससे कंद धूप में हरे नहीं होते और बढ़ने के लिए जगह मिलती है। पहली हल्की सिंचाई बुवाई के 8 से 10 दिन बाद की जाती है। इसके बाद मिट्टी की नमी के अनुसार 10 से 12 दिन के अंतर पर सिंचाई करें। ध्यान रहे कि मेड़ें पानी में पूरी न डूबें। खुदाई से लगभग 10 दिन पहले सिंचाई बंद कर दें।
पछेती झुलसा से बचाव
पछेती झुलसा आलू का सबसे खतरनाक रोग है, जो फाइटोफ्थोरा इन्फेस्टान्स नाम के रोगजनक से फैलता है। ठंडे, नम और बादल वाले मौसम में यह तेजी से फैलता है। पत्तियों पर पानी से भीगे जैसे भूरे काले धब्बे बनते हैं और कुछ ही दिनों में पूरा खेत झुलस सकता है। ऐसे मौसम में कृषि विशेषज्ञों की सलाह पर सुरक्षात्मक फफूंदनाशक का छिड़काव करें। रोगरोधी किस्में और स्वस्थ बीज इस रोग से बचाव का सबसे अच्छा तरीका हैं।
खुदाई और भंडारण
आलू की फसल किस्म के अनुसार 70 से 120 दिन में तैयार हो जाती है। पत्तियां पीली होकर सूखने लगें तो खुदाई से 10 से 15 दिन पहले डंठल काट दें, ताकि छिलका सख्त हो जाए। खुदाई के बाद कंदों को छाया में सुखाकर छंटाई करें। लंबे समय तक रखने के लिए कोल्ड स्टोरेज में भंडारण किया जाता है।
मंडी भाव पर नजर
आलू के दाम हर साल काफी ऊपर नीचे होते हैं। बुवाई और बिक्री का फैसला करते समय किसान Agmarknet और e-NAM पोर्टल पर अपनी मंडी के ताजा भाव देख सकते हैं। कई किसान खुदाई के तुरंत बाद बेचने के बजाय कोल्ड स्टोरेज में रखकर बेहतर दाम का इंतजार करते हैं, लेकिन इसमें भंडारण का खर्च भी जोड़ना चाहिए।
आलू की बुवाई कब करें
मैदानी इलाकों में मुख्य फसल मध्य अक्टूबर से मध्य नवंबर तक।
एक हेक्टेयर में कितना बीज लगता है
लगभग 25 से 30 क्विंटल।
आलू की प्रमुख किस्में कौन सी हैं
कुफरी ज्योति, कुफरी बहार, कुफरी पुखराज, कुफरी बादशाह और कुफरी चिप्सोना।
पछेती झुलसा कब फैलता है
ठंडे, नम और बादल वाले मौसम में।
स्रोत: ICAR-केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला, ICAR, Agmarknet मंडी भाव





