भारत में चुनाव की बात आते ही ज्यादातर लोगों के मन में भारत निर्वाचन आयोग का नाम आता है। लेकिन गांव के प्रधान, जिला पंचायत सदस्य, नगर निगम के पार्षद और मेयर के चुनाव भारत निर्वाचन आयोग नहीं कराता। यह काम हर राज्य का अपना राज्य निर्वाचन आयोग करता है। यह भी एक संवैधानिक संस्था है, जिसे स्थानीय लोकतंत्र की रीढ़ कहा जाता है। इस एक्सप्लेनर में समझिए राज्य निर्वाचन आयोग क्या है, कैसे बनता है और इसकी शक्तियां क्या हैं।
संविधान में कहां है
1992 में संसद ने 73वां और 74वां संविधान संशोधन पारित किया, जो 1993 में लागू हुए। 73वें संशोधन ने पंचायतों को और 74वें संशोधन ने नगर पालिकाओं को संवैधानिक दर्जा दिया। इसी के साथ अनुच्छेद 243K जोड़ा गया, जो पंचायत चुनावों के लिए राज्य निर्वाचन आयोग की व्यवस्था करता है। अनुच्छेद 243ZA कहता है कि नगर पालिकाओं के चुनाव भी यही आयोग कराएगा।

नियुक्ति और कार्यकाल
राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं। सेवा की शर्तें और कार्यकाल राज्य विधानमंडल के कानून के अनुसार तय होते हैं। ज्यादातर राज्यों में किसी वरिष्ठ सेवानिवृत्त या कार्यरत अधिकारी को यह पद दिया जाता है। आयोग में आमतौर पर एक ही आयुक्त होता है, हालांकि कुछ राज्यों में व्यवस्था अलग हो सकती है।
हटाने की प्रक्रिया
आयोग की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए संविधान ने एक खास सुरक्षा दी है। राज्य निर्वाचन आयुक्त को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन पर हाईकोर्ट के जज को हटाया जाता है। यानी उन्हें आसानी से पद से नहीं हटाया जा सकता। साथ ही नियुक्ति के बाद उनकी सेवा शर्तों में ऐसा बदलाव नहीं किया जा सकता, जो उनके खिलाफ हो।
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आयोग के काम
- पंचायत चुनाव: ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत या पंचायत समिति और जिला पंचायत के चुनाव कराना
- नगर निकाय चुनाव: नगर पंचायत, नगर पालिका परिषद और नगर निगम के चुनाव कराना
- मतदाता सूची: स्थानीय चुनावों के लिए मतदाता सूची तैयार करवाना और उसे अपडेट कराना
- आचार संहिता: स्थानीय चुनावों के दौरान आदर्श आचार संहिता लागू करना
- चुनाव कार्यक्रम: नामांकन, जांच, नाम वापसी, मतदान और मतगणना का कार्यक्रम तय करना
भारत निर्वाचन आयोग से अंतर
भारत निर्वाचन आयोग का आधार अनुच्छेद 324 है। यह लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, विधान परिषद, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव कराता है। राज्य निर्वाचन आयोग का दायरा सिर्फ पंचायत और नगर निकाय तक है। दोनों संस्थाएं एक दूसरे से स्वतंत्र हैं और एक का दूसरे पर नियंत्रण नहीं है। कई राज्य स्थानीय चुनावों की मतदाता सूची बनाने में विधानसभा की मतदाता सूची को आधार के रूप में इस्तेमाल करते हैं।
आरक्षण और सीटें
पंचायत और नगर निकायों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित होती हैं। संविधान महिलाओं के लिए कम से कम एक तिहाई सीटें आरक्षित करता है और कई राज्यों ने इसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया है। सीटों का आरक्षण और वार्ड की सीमाएं आमतौर पर राज्य सरकार या उसके तय किए प्राधिकारी राज्य कानून के तहत तय करते हैं, जबकि चुनाव कराने का काम आयोग का होता है।
समय पर चुनाव
संविधान के अनुसार पंचायत और नगर निकाय का कार्यकाल पांच साल का होता है और कार्यकाल खत्म होने से पहले नए चुनाव हो जाने चाहिए। भंग होने की स्थिति में छह महीने के भीतर चुनाव कराना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि स्थानीय निकायों के चुनाव टालना संविधान की भावना के खिलाफ है। फिर भी कई बार आरक्षण या परिसीमन से जुड़े विवादों के कारण चुनाव में देरी होती है।
स्थानीय चुनाव की प्रक्रिया
राज्य निर्वाचन आयोग चुनाव की अधिसूचना जारी करता है और जिलों में जिलाधिकारी को आमतौर पर जिला निर्वाचन अधिकारी की जिम्मेदारी दी जाती है। इसके बाद नामांकन, नामांकन पत्रों की जांच, नाम वापसी, चुनाव चिह्न आवंटन, मतदान और मतगणना होती है। ग्राम पंचायत चुनाव कई राज्यों में बिना पार्टी चिह्न के होते हैं, जबकि नगर निगम और कई जगह जिला पंचायत चुनाव पार्टी चिह्न पर लड़े जाते हैं। कुछ राज्यों में स्थानीय चुनाव बैलेट पेपर से और कुछ में EVM से कराए जाते हैं। यह फैसला राज्य के कानून और आयोग की व्यवस्था पर निर्भर करता है।
आयोग की स्वतंत्रता पर बहस
कई बार राज्य निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता पर सवाल उठते रहे हैं, क्योंकि आयुक्त की नियुक्ति राज्य सरकार की सलाह पर राज्यपाल करते हैं और आयोग को कर्मचारियों और संसाधनों के लिए राज्य सरकार पर निर्भर रहना पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्थानीय लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए आयोग को ज्यादा प्रशासनिक और वित्तीय स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि राज्य निर्वाचन आयोग को चुनाव कराने में भारत निर्वाचन आयोग जैसी ही स्वतंत्रता होनी चाहिए।
मतदाता के लिए जरूरी बातें
स्थानीय चुनाव में वोट डालने के लिए नाम संबंधित वार्ड या पंचायत की मतदाता सूची में होना चाहिए। विधानसभा की सूची में नाम होने के बावजूद कई बार स्थानीय सूची में नाम छूट जाता है। इसलिए चुनाव से पहले अपने राज्य निर्वाचन आयोग की वेबसाइट या ब्लॉक कार्यालय में अपना नाम जरूर जांच लें।
राज्य निर्वाचन आयोग किस अनुच्छेद में है
अनुच्छेद 243K, और नगर निकायों के लिए 243ZA।
राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति कौन करता है
राज्यपाल।
क्या राज्य निर्वाचन आयोग विधानसभा चुनाव कराता है
नहीं, वह भारत निर्वाचन आयोग का काम है।
आयुक्त को कैसे हटाया जाता है
हाईकोर्ट जज को हटाने जैसी प्रक्रिया से।
स्रोत: भारत का संविधान, विधायी विभाग, पंचायती राज मंत्रालय, भारत निर्वाचन आयोग





