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चुनाव चिह्न कैसे मिलता है: चिह्न आदेश 1968, आरक्षित और मुक्त चिह्न, पार्टी में फूट पर पैरा 15 और निर्दलीयों को चिह्न

ईवीएम पर उम्मीदवार के नाम के साथ दिखने वाला चुनाव चिह्न कैसे तय होता है और पार्टी टूटने पर किसे मिलता है? आसान भाषा में समझिए।

मतदान केंद्र पर ईवीएम और चुनाव चिह्नों का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

सारांश

  • भारत में चुनाव के दौरान ईवीएम पर उम्मीदवार के नाम और फोटो के साथ एक चुनाव चिह्न भी दिखता है, जैसे कमल, हाथ, साइकिल, हाथी या झाड़ू।
  • जिन पार्टियों को राष्ट्रीय या राज्य स्तर की मान्यता मिली होती है, उन्हें एक आरक्षित चिह्न दिया जाता है।
  • पंजीकृत लेकिन गैर मान्यता प्राप्त दल चुनाव आयोग से अनुरोध कर सकते हैं कि किसी राज्य के चुनाव में उनके सभी उम्मीदवारों को एक ही मुक्त चिह्न दिया जाए।
  • विवाद का अंतिम फैसला होने तक अगर कोई चुनाव आ जाए, तो आयोग विवादित चिह्न पर अस्थायी रोक लगा सकता है और दोनों गुटों को अलग अलग नाम और अस्थायी चिह्न दे सकता है।

भारत में चुनाव के दौरान ईवीएम पर उम्मीदवार के नाम और फोटो के साथ एक चुनाव चिह्न भी दिखता है, जैसे कमल, हाथ, साइकिल, हाथी या झाड़ू। देश में करोड़ों ऐसे मतदाता रहे हैं जो पढ़ नहीं सकते थे, इसलिए पहले आम चुनाव से ही चिह्नों की व्यवस्था रखी गई, ताकि मतदाता अपनी पसंद के उम्मीदवार को पहचान सके। आज भी चिह्न किसी पार्टी की सबसे बड़ी पहचान है और पार्टी में फूट पड़ने पर सबसे बड़ा झगड़ा इसी को लेकर होता है। यह लेख एक व्याख्या है, जिसमें बताया गया है कि चुनाव चिह्न कैसे दिए जाते हैं और इससे जुड़े विवाद कैसे सुलझते हैं।

कानूनी आधार

संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को चुनाव की निगरानी, निर्देशन और नियंत्रण का अधिकार देता है। इसी के तहत चुनाव आयोग ने चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश 1968 जारी किया। यही आदेश तय करता है कि पार्टियों को मान्यता कैसे मिलेगी, किसे कौन सा चिह्न मिलेगा और विवाद होने पर क्या होगा। इसके अलावा चुनाव संचालन नियम 1961 में भी चिह्नों के आवंटन से जुड़े प्रावधान हैं।

मुख्य बातें: मतदान केंद्र पर ईवीएम और चुनाव चिह्नों का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

आरक्षित चिह्न

जिन पार्टियों को राष्ट्रीय या राज्य स्तर की मान्यता मिली होती है, उन्हें एक आरक्षित चिह्न दिया जाता है। राष्ट्रीय दल का चिह्न पूरे देश में और राज्य स्तरीय दल का चिह्न उस राज्य में सिर्फ उसी पार्टी के उम्मीदवारों के लिए होता है। कोई दूसरा उम्मीदवार उस चिह्न पर चुनाव नहीं लड़ सकता। मान्यता के लिए वोट प्रतिशत और सीटों की तय शर्तें पूरी करनी होती हैं, और हर चुनाव के बाद आयोग इसकी समीक्षा करता है। शर्तें पूरी न होने पर मान्यता और आरक्षित चिह्न दोनों जा सकते हैं।

मुक्त चिह्न

चुनाव आयोग हर चुनाव से पहले मुक्त चिह्नों की एक सूची जारी करता है। इनमें रोजमर्रा की चीजें होती हैं, जैसे बल्ला, बाल्टी, गैस सिलेंडर, अलमारी, टेलीफोन, फूलगोभी या टॉर्च। पंजीकृत लेकिन गैर मान्यता प्राप्त दल और निर्दलीय उम्मीदवार इन्हीं में से चिह्न चुनते हैं। नामांकन के समय उम्मीदवार अपनी पसंद के तीन चिह्न बता सकता है। अगर एक ही सीट पर दो लोग एक ही चिह्न मांगें, तो रिटर्निंग अधिकारी नियमों के अनुसार फैसला करता है, जिसमें कई बार लॉटरी भी होती है।

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गैर मान्यता प्राप्त दलों के लिए साझा चिह्न

पंजीकृत लेकिन गैर मान्यता प्राप्त दल चुनाव आयोग से अनुरोध कर सकते हैं कि किसी राज्य के चुनाव में उनके सभी उम्मीदवारों को एक ही मुक्त चिह्न दिया जाए। इसके लिए तय शर्त है कि वे उस चुनाव में एक तय संख्या में सीटों पर उम्मीदवार उतारें। इससे छोटे दलों को भी अपनी पहचान बनाने में मदद मिलती है।

पार्टी में फूट और पैरा 15

जब किसी मान्यता प्राप्त दल में फूट पड़ जाती है और दो गुट दोनों ही असली पार्टी होने का दावा करते हैं, तो चिह्न आदेश का पैरा 15 लागू होता है। इसके तहत चुनाव आयोग दोनों पक्षों की सुनवाई करता है और तय करता है कि कौन सा गुट असली पार्टी है। सुप्रीम कोर्ट ने 1971 के सादिक अली मामले में इस अधिकार को सही माना। आयोग आम तौर पर तीन बातों को देखता है: पार्टी के लक्ष्य और उद्देश्य, पार्टी संविधान और संगठन में बहुमत, और विधायकों व सांसदों में बहुमत।

अस्थायी फैसला और चिह्न पर रोक

विवाद का अंतिम फैसला होने तक अगर कोई चुनाव आ जाए, तो आयोग विवादित चिह्न पर अस्थायी रोक लगा सकता है और दोनों गुटों को अलग अलग नाम और अस्थायी चिह्न दे सकता है। भारत के राजनीतिक इतिहास में कई बड़े दलों के मामलों में ऐसा हुआ है। 1969 में कांग्रेस के बंटवारे के समय भी चिह्न का विवाद चुनाव आयोग पहुंचा था। हाल के वर्षों में महाराष्ट्र के दो प्रमुख दलों में फूट के बाद भी आयोग ने पैरा 15 के तहत फैसले दिए, जिन्हें अदालत में चुनौती दी गई।

चिह्न किन चीजों का नहीं हो सकता

चुनाव आयोग धार्मिक प्रतीकों, जानवरों और पक्षियों से जुड़े कुछ चिह्नों को मुक्त सूची में शामिल करने से बचता है। पशु क्रूरता की आशंका के कारण आयोग ने पार्टियों से कहा है कि वे प्रचार में जानवरों का इस्तेमाल न करें। हालांकि कुछ पुराने दलों के आरक्षित चिह्न, जैसे हाथी, पहले से चले आ रहे हैं।

ईवीएम पर चिह्न

ईवीएम की बैलेट यूनिट पर हर उम्मीदवार का नाम, फोटो और चिह्न एक क्रम में होता है। पहले मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय और राज्य दलों के उम्मीदवार, फिर पंजीकृत गैर मान्यता प्राप्त दलों के और आखिर में निर्दलीय उम्मीदवार, हर समूह के भीतर नाम वर्णमाला के क्रम में रखे जाते हैं। सबसे आखिर में नोटा का बटन होता है, जिसका अपना चिह्न है।

चुनाव चिह्न कौन देता है

भारत का चुनाव आयोग।

चिह्न आदेश कब बना

1968 में।

पार्टी टूटने पर चिह्न का फैसला किस प्रावधान से होता है

चिह्न आदेश के पैरा 15 से।

निर्दलीय उम्मीदवार को चिह्न कहां से मिलता है

आयोग की मुक्त चिह्नों की सूची से।

स्रोत: Election Commission of India: Symbols Order, ECI: Political Parties and Symbols, Legislative Department: Representation of People Act

लेखक

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी डेमोक्रेटिक भारत लाइव के संस्थापक, मालिक और संपादक हैं। डिजिटल मीडिया में 6 साल से अधिक के अनुभव के साथ वे मुख्य रूप से राजनीति और चुनाव की खबरें कवर करते हैं, साथ ही देश, कारोबार और खेल से जुड़ी अहम खबरों का संपादन करते हैं। वेबसाइट की संपादकीय नीति, तथ्य-जांच और प्रकाशित सामग्री की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की है।

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