अहोई अष्टमी का व्रत माताएं अपनी संतान की लंबी आयु और सुख के लिए रखती हैं। द्रिक पंचांग के अनुसार 2026 में अहोई अष्टमी का व्रत रविवार, 1 नवंबर को है। यह करवा चौथ के कुछ दिन बाद कार्तिक कृष्ण अष्टमी को आता है। शाम को अहोई माता की पूजा के समय व्रत कथा सुनी जाती है। यहां पढ़िए अहोई अष्टमी व्रत कथा का सबसे प्रचलित रूप, जो उत्तर भारत के घरों में सुनाया जाता है।
अहोई अष्टमी व्रत कथा
प्राचीन समय में एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसके सात बेटे और सात बहुएं थीं। दिवाली से पहले घर लीपने के लिए साहूकार की बेटी अपनी भाभियों के साथ जंगल में मिट्टी लेने गई। मिट्टी खोदते समय उसकी खुरपी से अनजाने में स्याहु यानी साही के एक बच्चे की मृत्यु हो गई।
दुखी स्याहु माता ने क्रोध में कहा कि जिस तरह तुमने मेरे बच्चे को मारा है, उसी तरह मैं तुम्हारी कोख बांध दूंगी। यह सुनकर साहूकार की बेटी डर गई और उसने अपनी भाभियों से विनती की कि कोई उसकी जगह यह शाप अपने ऊपर ले ले। सबसे छोटी भाभी ने ननद के लिए यह शाप स्वीकार कर लिया।
इसके बाद छोटी बहू की जो भी संतान होती, वह सात दिन के भीतर मर जाती। बहुत दुखी होकर उसने एक पंडित से उपाय पूछा। पंडित ने उसे सुरही गाय की सेवा करने को कहा। छोटी बहू ने पूरी श्रद्धा से गाय की सेवा की। प्रसन्न होकर सुरही गाय उसे स्याहु माता के पास ले चली।
रास्ते में थककर दोनों एक पेड़ के नीचे आराम करने लगीं। तभी छोटी बहू ने देखा कि एक सांप गरुड़ पंखनी के बच्चे को डसने जा रहा है। उसने सांप को मारकर बच्चे को बचा लिया। गरुड़ पंखनी ने पहले उसे दोषी समझा, लेकिन सच जानकर प्रसन्न हुई और दोनों को स्याहु माता के पास पहुंचा दिया।
स्याहु माता छोटी बहू की सेवा और परोपकार से प्रसन्न हुईं और उसे सात पुत्र और सात बहुओं का आशीर्वाद दिया। घर लौटने पर उसका परिवार फिर से संतान के सुख से भर गया। तभी से माताएं संतान के कल्याण के लिए अहोई माता और स्याहु की पूजा करती हैं।

कथा सुनने का पारंपरिक तरीका
शाम को दीवार पर या कागज पर अहोई माता का चित्र बनाया या लगाया जाता है। उसके सामने जल से भरा कलश रखा जाता है। व्रत रखने वाली महिलाएं हाथ में थोड़े गेहूं या चावल के दाने लेकर कथा सुनती हैं। कथा के बाद ये दाने और कुछ भेंट घर की बुजुर्ग महिला या सास को दी जाती है। कई परिवारों में चांदी की स्याहु माला पहनने की भी परंपरा है।
व्रत कब खोला जाता है
ज्यादातर परिवारों में अहोई अष्टमी का व्रत शाम को तारे देखकर और उन्हें अर्घ्य देकर खोला जाता है। कुछ परिवार चंद्रोदय के बाद व्रत खोलते हैं, लेकिन अहोई अष्टमी पर चंद्रोदय काफी देर रात होता है। इसलिए अपने परिवार की परंपरा के अनुसार ही नियम अपनाएं।
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कथा का संदेश
यह कथा बताती है कि अनजाने में हुई गलती का भी असर होता है और उसका प्रायश्चित सेवा और करुणा से किया जा सकता है। छोटी बहू ने न केवल ननद का साथ दिया, बल्कि रास्ते में एक अनजान जीव के बच्चे को भी बचाया। प्रकृति और सभी जीवों के प्रति दया इस व्रत का मूल भाव माना जाता है।
ध्यान रखने योग्य बातें
पूजा का शुभ समय अपने शहर के पंचांग से देखें, क्योंकि समय स्थान के अनुसार बदलता है। गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग या किसी बीमारी से जूझ रही महिलाएं निर्जला व्रत रखने से पहले डॉक्टर से सलाह लें। व्रत श्रद्धा का विषय है, इसे अपनी क्षमता के अनुसार ही रखें।
स्रोत: द्रिक पंचांग। जानकारी अक्टूबर 2026 तक की।





