भारतीय खेल इतिहास में कुछ कहानियां ऐसी हैं जो सिर्फ खेल की नहीं, बल्कि हिम्मत और संघर्ष की मिसाल हैं। मिल्खा सिंह की कहानी उन्हीं में से एक है। बंटवारे के दौरान परिवार को खोने वाला एक लड़का सेना में भर्ती हुआ, दौड़ना सीखा और फिर एशिया और कॉमनवेल्थ का चैंपियन बना। 1960 के रोम ओलंपिक में 400 मीटर दौड़ में वे बहुत कम अंतर से पदक से चूक गए, लेकिन उस दौड़ ने उन्हें अमर बना दिया। उन्हें फ्लाइंग सिख के नाम से जाना जाता है। इस लेख में जानिए उनके जीवन और उपलब्धियों के बारे में।
जन्म और बंटवारा
मिल्खा सिंह का जन्म अविभाजित पंजाब के गोविंदपुरा गांव में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। उनकी जन्मतिथि को लेकर अलग अलग रिकॉर्ड हैं, आम तौर पर 20 नवंबर 1929 बताई जाती है। 1947 के बंटवारे की हिंसा में उनके माता पिता और कई परिजन मारे गए। किशोर मिल्खा किसी तरह भारत पहुंचे और दिल्ली में शरणार्थी शिविरों में मुश्किल दिन गुजारे। यह दर्द उनके जीवन भर साथ रहा।

सेना में दौड़ की शुरुआत
कई कोशिशों के बाद मिल्खा सिंह भारतीय सेना में भर्ती हुए। सेना में एक दौड़ प्रतियोगिता में अच्छा प्रदर्शन करने पर उन्हें एथलेटिक्स की खास ट्रेनिंग के लिए चुना गया। यहीं से उनकी असली यात्रा शुरू हुई। वे कड़ी मेहनत के लिए जाने जाते थे और कई बार ट्रेनिंग में खुद को थकान की आखिरी हद तक ले जाते थे।
1956 मेलबर्न ओलंपिक
1956 के मेलबर्न ओलंपिक में मिल्खा सिंह ने पहली बार अंतरराष्ट्रीय मंच पर हिस्सा लिया। अनुभव की कमी के कारण वे शुरुआती दौर में ही बाहर हो गए। लेकिन वहां उन्होंने दुनिया के बड़े धावकों को देखा और उनसे सीखा। उस समय के 400 मीटर ओलंपिक चैंपियन चार्ल्स जेनकिंस से मुलाकात ने उन्हें काफी प्रेरित किया।
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1958: स्वर्णिम साल
1958 मिल्खा सिंह के करियर का सबसे सफल साल रहा। टोक्यो एशियाई खेलों में उन्होंने 200 मीटर और 400 मीटर, दोनों में स्वर्ण पदक जीते। उसी साल कार्डिफ में हुए ब्रिटिश एम्पायर और कॉमनवेल्थ खेलों में उन्होंने 440 गज की दौड़ में स्वर्ण पदक जीता। यह कॉमनवेल्थ खेलों के एथलेटिक्स में आजाद भारत का पहला स्वर्ण था। इन उपलब्धियों के बाद 1959 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
फ्लाइंग सिख नाम कैसे मिला
1960 में पाकिस्तान के लाहौर में भारत पाकिस्तान खेल मुकाबले में मिल्खा सिंह ने पाकिस्तान के मशहूर धावक अब्दुल खालिक को हराया। कहा जाता है कि उस समय पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने उन्हें फ्लाइंग सिख कहा था। यह नाम हमेशा के लिए उनकी पहचान बन गया। बंटवारे की यादों के कारण मिल्खा पहले पाकिस्तान जाने से हिचक रहे थे, लेकिन प्रधानमंत्री नेहरू के कहने पर वे गए।
1960 रोम ओलंपिक
रोम ओलंपिक के 400 मीटर फाइनल में मिल्खा सिंह पदक के बड़े दावेदार माने जा रहे थे। दौड़ में वे शुरुआत में आगे थे, लेकिन आखिरी हिस्से में बेहद करीबी मुकाबले में चौथे स्थान पर रहे। उनका समय करीब 45.6 सेकंड दर्ज हुआ, जो दशकों तक भारत का राष्ट्रीय रिकॉर्ड रहा। मिल्खा सिंह ने कई बार कहा कि इस दौड़ में पदक से चूकने का दुख उन्हें जीवन भर रहा।
आगे का करियर
1962 के जकार्ता एशियाई खेलों में मिल्खा सिंह ने 400 मीटर और 4 गुणा 400 मीटर रिले में स्वर्ण पदक जीते। 1964 के टोक्यो ओलंपिक में भी उन्होंने हिस्सा लिया। खेल से संन्यास के बाद वे पंजाब सरकार में खेल विभाग से जुड़े रहे और युवा खिलाड़ियों को आगे बढ़ाने का काम किया।
परिवार
मिल्खा सिंह की पत्नी निर्मल कौर भारतीय महिला वॉलीबॉल टीम की कप्तान रही थीं। उनके बेटे जीव मिल्खा सिंह अंतरराष्ट्रीय स्तर के गोल्फर हैं। मिल्खा सिंह ने अपने मेडल देश को समर्पित कर दिए थे और उनकी इच्छा थी कि कोई भारतीय एथलीट ओलंपिक में एथलेटिक्स का पदक जीते।
फिल्म और किताब
उनके जीवन पर 2013 में फिल्म भाग मिल्खा भाग बनी, जिसमें फरहान अख्तर ने उनका किरदार निभाया। उनकी आत्मकथा द रेस ऑफ माई लाइफ के नाम से प्रकाशित हुई। फिल्म के बाद नई पीढ़ी ने उनकी कहानी को और करीब से जाना।
निधन
जून 2021 में कोविड से जुड़ी परेशानियों के कारण चंडीगढ़ में उनका निधन हुआ। कुछ ही दिन पहले उनकी पत्नी निर्मल कौर का भी निधन हो गया था। देश भर के खिलाड़ियों और नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।
मिल्खा सिंह को फ्लाइंग सिख किसने कहा
कहा जाता है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने, 1960 में।
रोम ओलंपिक में वे किस स्थान पर रहे
400 मीटर में चौथे स्थान पर।
उन पर कौन सी फिल्म बनी
भाग मिल्खा भाग, 2013 में।
स्रोत: Olympics.com: Milkha Singh, World Athletics, Wikipedia: Milkha Singh





