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पीटी उषा: पय्योली एक्सप्रेस का सफर, 1984 ओलंपिक में सेकंड के सौवें हिस्से से चूका पदक, सियोल एशियाड के चार स्वर्ण और IOA की पहली महिला अध्यक्ष

केरल के छोटे से गांव से निकलकर भारत की सबसे मशहूर धाविका बनीं पीटी उषा की कहानी आज भी लाखों खिलाड़ियों को प्रेरित करती है।

एथलेटिक्स ट्रैक पर दौड़ती धाविका का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

सारांश

  • भारतीय एथलेटिक्स के इतिहास में पीटी उषा का नाम सबसे सम्मान के साथ लिया जाता है।
  • 1980 में मॉस्को ओलंपिक में सिर्फ 16 साल की उम्र में उषा ने 100 मीटर दौड़ में हिस्सा लिया।
  • 1988 के सियोल ओलंपिक में चोट के कारण वे अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकीं।
  • पीटी उषा को 1984 में अर्जुन पुरस्कार और 1985 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया।

भारतीय एथलेटिक्स के इतिहास में पीटी उषा का नाम सबसे सम्मान के साथ लिया जाता है। 1980 के दशक में जब भारत में एथलेटिक्स के लिए सुविधाएं बहुत कम थीं, तब केरल की इस धाविका ने एशिया की सबसे तेज महिला का खिताब हासिल किया। 1984 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक में वे सेकंड के सौवें हिस्से से कांस्य पदक से चूक गईं, लेकिन यह हार भी उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गई। बाद में वे कोच, राज्यसभा सदस्य और भारतीय ओलंपिक संघ की पहली महिला अध्यक्ष भी बनीं। इस लेख में जानिए पय्योली एक्सप्रेस के नाम से मशहूर पीटी उषा का सफर।

बचपन और शुरुआत

पिलावुल्लकंडी थेक्केपरंबिल उषा का जन्म 27 जून 1964 को केरल के कोझिकोड जिले के पय्योली के पास एक साधारण परिवार में हुआ। बचपन में उनकी सेहत कमजोर रहती थी, लेकिन स्कूल में दौड़ प्रतियोगिताओं में वे बड़ी लड़कियों को भी हरा देती थीं। 1976 में केरल सरकार ने कन्नूर में महिलाओं के लिए खेल प्रभाग शुरू किया, जहां उनका चयन हुआ। यहीं उनकी मुलाकात कोच ओएम नांबियार से हुई, जिन्होंने उनकी प्रतिभा को पहचाना और पूरे करियर में उन्हें प्रशिक्षित किया।

मुख्य बातें: एथलेटिक्स ट्रैक पर दौड़ती धाविका का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

अंतरराष्ट्रीय पहचान

1980 में मॉस्को ओलंपिक में सिर्फ 16 साल की उम्र में उषा ने 100 मीटर दौड़ में हिस्सा लिया। 1982 के दिल्ली एशियाई खेलों में उन्होंने 100 और 200 मीटर में रजत पदक जीते। 1983 में कुवैत में हुई एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उन्होंने 400 मीटर में स्वर्ण जीता। इसके बाद नांबियार ने उन्हें 400 मीटर बाधा दौड़ के लिए तैयार करना शुरू किया।

लॉस एंजिल्स 1984

1984 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक में पीटी उषा 400 मीटर बाधा दौड़ के फाइनल में पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। फाइनल में उन्होंने 55.42 सेकंड का समय निकाला, लेकिन वे चौथे स्थान पर रहीं। कांस्य पदक जीतने वाली रोमानिया की क्रिस्टियाना कोजोकारू से वे सिर्फ सेकंड के सौवें हिस्से से पीछे थीं। यह समय कई साल तक भारत का राष्ट्रीय रिकॉर्ड रहा। भले ही पदक नहीं मिला, लेकिन इस दौड़ ने पूरे देश में एथलेटिक्स के प्रति लोगों का नजरिया बदल दिया।

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सियोल एशियाड का जादू

1986 में दक्षिण कोरिया के सियोल में हुए एशियाई खेलों में पीटी उषा ने कमाल कर दिया। उन्होंने 200 मीटर, 400 मीटर, 400 मीटर बाधा दौड़ और 4×400 मीटर रिले में स्वर्ण पदक जीते और 100 मीटर में रजत। यानी एक ही एशियाड में चार स्वर्ण और एक रजत। इससे पहले 1985 में जकार्ता में हुई एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उन्होंने पांच स्वर्ण और एक कांस्य जीता था। उन्हें एशिया की गोल्डन गर्ल कहा जाने लगा।

करियर के बाद के साल

1988 के सियोल ओलंपिक में चोट के कारण वे अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकीं। 1990 के बीजिंग एशियाई खेलों में उन्होंने तीन रजत पदक जीते। इसके बाद उन्होंने कुछ समय के लिए संन्यास लिया और शादी के बाद फिर से वापसी की। 1998 में जापान में हुई एशियाई चैंपियनशिप में उन्होंने कांस्य पदक जीते। 2000 में उन्होंने आखिरकार प्रतिस्पर्धी एथलेटिक्स से संन्यास ले लिया। अपने करियर में उन्होंने एशियाई खेलों और एशियाई चैंपियनशिप में कुल मिलाकर 100 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय पदक जीते।

उषा स्कूल ऑफ एथलेटिक्स

संन्यास के बाद 2002 में पीटी उषा ने कोझिकोड के पास उषा स्कूल ऑफ एथलेटिक्स शुरू किया। यहां गरीब परिवारों की प्रतिभाशाली लड़कियों को मुफ्त प्रशिक्षण, रहना और पढ़ाई की सुविधा दी जाती है। इस स्कूल से निकली कई धाविकाओं ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीते हैं, जिनमें टिंटू लुका का नाम खास है।

राज्यसभा और IOA

जुलाई 2022 में राष्ट्रपति ने पीटी उषा को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया। दिसंबर 2022 में वे भारतीय ओलंपिक संघ यानी IOA की अध्यक्ष चुनी गईं। वे इस पद तक पहुंचने वाली पहली महिला और पहली ओलंपियन खिलाड़ी हैं। उनके कार्यकाल में भारत की ओलंपिक मेजबानी की दावेदारी पर भी चर्चा हुई है।

सम्मान

पीटी उषा को 1984 में अर्जुन पुरस्कार और 1985 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया। 1985 में जकार्ता एशियाई चैंपियनशिप में उन्हें सर्वश्रेष्ठ एथलीट चुना गया। अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स संघ ने भी उन्हें सम्मानित किया है। उनके नाम पर केरल और देश के कई हिस्सों में खेल आयोजन होते हैं।

कोच ओएम नांबियार की भूमिका

पीटी उषा की सफलता में कोच ओएम नांबियार का योगदान बहुत बड़ा था। वे भारतीय वायुसेना से जुड़े रहे थे और उन्होंने सीमित संसाधनों में उषा को समुद्र तट की रेत पर दौड़ाकर प्रशिक्षण दिया। 1984 के ओलंपिक के बाद उन्होंने कहा था कि चौथा स्थान उनके लिए सबसे बड़ा दुख था। नांबियार को बाद में द्रोणाचार्य पुरस्कार और पद्म श्री से सम्मानित किया गया। उषा ने हमेशा कहा कि नांबियार के बिना उनका करियर संभव नहीं था।

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा

पीटी उषा की कहानी ने भारत में खासकर लड़कियों को एथलेटिक्स में आने का हौसला दिया। आज भारत के कई धावक और धाविकाएं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीत रहे हैं, और कई उनकी कहानी से प्रेरित होने की बात कहते हैं। उनका मानना है कि गांवों में छिपी प्रतिभा को सही समय पर पहचानकर सुविधाएं देना सबसे जरूरी है।

पीटी उषा का जन्म कब हुआ

27 जून 1964 को, केरल के पय्योली के पास।

1984 ओलंपिक में पीटी उषा का समय क्या था

400 मीटर बाधा दौड़ में 55.42 सेकंड।

सियोल एशियाड में उन्होंने कितने स्वर्ण जीते

चार स्वर्ण और एक रजत।

पीटी उषा IOA अध्यक्ष कब बनीं

दिसंबर 2022 में।

स्रोत: World Athletics: P.T. Usha, Indian Olympic Association, Olympics.com: PT Usha

लेखक

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी डेमोक्रेटिक भारत लाइव के संस्थापक, मालिक और संपादक हैं। डिजिटल मीडिया में 6 साल से अधिक के अनुभव के साथ वे मुख्य रूप से राजनीति और चुनाव की खबरें कवर करते हैं, साथ ही देश, कारोबार और खेल से जुड़ी अहम खबरों का संपादन करते हैं। वेबसाइट की संपादकीय नीति, तथ्य-जांच और प्रकाशित सामग्री की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की है।

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